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धर्म-अध्यात्म का योग

Posted On June - 21 - 2020

घनश्याम बादल
योग, धर्म और अध्यात्म को अक्सर अलग-अलग माना जाता है। योग का संबंध भौतिक शरीर को पुष्ट करने अथवा शारीरिक व्याधियों के उपचार तक सीमित मान लिया जाता है। वहीं, धर्म को प्राय: किसी विशेष पद्धति से पूजा-पाठ अथवा कर्मकांड मान लिया गया है और अध्यात्म को दूसरे लोक की रहस्यात्मक वस्तु। लेकिन, वास्तव में धर्म, अध्यात्म और योग अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
शरीर मात्र हाड़-मांस का नहीं बना है। भौतिक शरीर के अतिरिक्त अन्य शरीर भी इसमें समाहित हैं। मोटे तौर पर शरीर को तीन भागों में बांटा गया है- स्थूल शरीर अथवा भौतिक शरीर, मानसिक शरीर अथवा मन या कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर या चेतना अथवा आत्मा। इन तीनों को जानना और मन के माध्यम से चेतना में स्थित होना ही आध्यात्मिकता है। इसके लिए चित्त की शुद्धता अनिवार्य है। चित्त की शुद्धता योग द्वारा ही संभव है, अत: योग धर्म और आध्यात्मिकता से पृथक नहीं कहा जा सकता।
योग शुद्ध धर्म का पर्याय है। शरीर और मन के बीच सेतु बनता है श्वास। इसी तरह मन और चेतना के मध्य सेतु है ध्यान एवं एकाग्रता। श्वास का सही अभ्यास और ध्यान, योग के ही अंग हैं। अत: योग ही आध्यात्मिकता है, योग ही शुद्ध धर्म है।
योगसूत्र में योग की परिभाषा भी शुद्ध धर्म की परिभाषा से मिलती है। ‘योग: चित्तवृत्ति निरोध:’ चित्तवृत्तियों का निरोध अर्थात‍् मन को स्थिर करना ही योग है।
कुछ व्यक्ति मात्र योगासन और प्राणायाम को ही योग समझ लेते हैं। वास्तव में अष्टांग योग के आठों अंगों और सभी उपांगों का अभ्यास ही सम्पूर्ण योग है। यम-नियम से लेकर ध्यान और समाधि तक की यात्रा ही पूर्ण योग है। यदि यम-नियम का पालन नहीं किया जाता, तो यह धर्म के बाह्य तत्व की तरह अधूरा रह जाता है। धर्म के जितने भी लक्षण गिनवाए गये हैं, वे सभी यम और नियम में आ जाते हैं। इन सभी को धारण करने के लिए ध्यान की आवश्यकता पड़ती है। ध्यानावस्था में पहुंचने के लिए आसन और प्राणायाम सहायक होते हैं। इस प्रकार अष्टांग योग का अभ्यास धर्म की ओर ले जाता है, यही मानव धर्म है। जीवन को धर्ममय बनाने के लिए जीवन को योगमय बनाने की ओर अग्रसर हों। यही सच्ची आध्यात्मिकता है।
कैसे-कैसे योग : योग प्रदीप में इसके दस प्रकार बताए गये हैं- राज योग, अष्टांग योग, हठ योग, लय योग, ध्यान योग, भक्ति योग, क्रिया योग, मंत्र योग, कर्म योग और ज्ञान योग। इसके अलावा धर्म योग, तंत्र योग, नाद योग का भी जिक्र कई ग्रंथों में आता है। अब आज के संदर्भ में हम जिस योग की बात करते हैं उसे अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग अर्थात‍् योग के आठ अंग धर्म का सार माने जाते हैं। ये आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
शिव से शुरू
योग परंपरा का विस्तृत इतिहास रहा है। आदिदेव शिव और गुरु दत्तात्रेय को योग का जनक माना गया है। हालांकि, अधिकतर विद्वान मानते हैं कि योग के जनक महर्षि पतंजलि पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने योग को आस्था, अंधविश्वास और धर्म से बाहर निकालकर एक सुव्यवस्थित रूप दिया। लेकिन, श्रीकृष्ण, महावीर और महात्मा बुद्ध ने भी इसे अपनी तरह से विस्तार दिया। पतंजलि ने वेदों में बिखरी योग विद्या का वर्गीकरण किया। इसके बाद योग का प्रचलन बढ़ा और यौगिक संस्थानों, पीठों तथा आश्रमों का निर्माण होने लगा, जिसमें केवल राजयोग की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी।
आध्यात्मिक प्रक्रिया
भारत में योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसमें तन, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम किया जाता है। ईश्वर की आराधना से लेकर गीता के उपदेश तक, शरीर को स्वस्थ और स्फूर्तिवान रखने से लेकर तमाम बीमारियों के समाधान तक, आत्मा से लेकर शरीर और मस्तिष्क की शुद्धि तक हर जगह योग है। योग क्रियाओं का मूल उद्देश्य है हमें प्रकृति से जोड़ना, ध्यान की आदत बनाना, स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रही बीमारियों को घटाना। लोगों को शारीरिक और मानसिक बीमारियों से बचाना और स्वस्थ जीवन-शैली द्वारा बेहतर मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करना।


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