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ज़िंदगी हैरान हूं मैं…

Posted On June - 21 - 2020

चित्रांकन : संदीप जोशी

चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया को बाहर से देखने पर तो लगता है कि यहां सबकुछ ‘शानदार’ है, लेकिन छन-छनकर आई जानकारियों और सुशांत सिंह राजपूत सरीखे कई कलाकारों के खुद को खत्म कर लेने की भयावह खबरों से ‘हकीकत’ कुछ और ही लगती है। अवसाद भयानक बीमारी के रूप में बढ़ रहा है। ऐसे में जरूरत है उतार-चढ़ाव से सामंजस्य बिठाने का। सफलता को ‘सेलिब्रेट’ करने का पल हो या असफलता के दौर से उबरने की योजना, हमें अपनों का साथ चाहिए होता है। इसी मुद्दे पर प्रकाश डाल रहे हैं संजय वर्मा
आधे बीत रहे इस साल को भविष्य में किस रूप में दर्ज किया जाएगा-इसे लेकर शायद ही किसी को कोई संदेह हो। कोरोना वायरस की बेहद आक्रामकता भरे संक्रमण के साथ शुरू हुए, चौतरफा लॉकडाउन झेलते, चौपट होती अर्थव्यवस्था के बीच प्रवासी मजदूरों की पीड़ादायक कहानियों को देखते-सुनते गुजरे ये तकरीबन छह महीने तब और दर्दनाक हो गए, जब वक्त के इस अरसे ने उन हस्तियों को भी हमसे छीन लिया, जिन्हें हम दिलोजान से प्यार करते थे। बात अगर सिर्फ फिल्मी हस्तियों की जाए तो अलग-अलग बीमारियों के शिकार हुए इरफान, ऋषि कपूर, वाजिद खान का अचानक दुनिया से जाना खल ही रहा था कि अचानक युवा, प्रतिभाशाली अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध हालात में मौत ने कई और सवाल खड़े कर दिए। यह एक सोची-समझी हत्या है-जैसा कि सुशांत के कुछ परिजनों ने दावा किया है या महज आत्महत्या, यह तो पुलिस जांच से ही साफ हो सकेगा।
फिलहाल हालात का इशारा यही है कि निजी जीवन की कुछ नाकामियों के कारण अवसाद में फंसकर सुशांत ने अपनी जान ली है। बीते कुछ समय से मनोचिकित्सक से डिप्रेशन का इलाज करवा रहे सुशांत ने सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम) पर अपनी दिवंगत मां को याद करते हुए जो कुछ लिखा है, उनका संकेत यही है कि कुछ नाकामियों ने सुशांत को अंदर से तोड़ दिया था और इस टूटन से बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा था। पर अगर असफलताएं (निजी जीवन और प्रोफेशनल) ही सुशांत के अवसाद और फिर आत्महत्या का कारण बनीं, तो उनके कॅरिअर ग्राफ को देखकर इन नाकामियों पर भी सवाल उठता है। पिछले साल की फिल्म ‘छिछोरे’ में सुशांत ने एक ऐसे पिता की भूमिका निभाई थी जो परीक्षा में नाकाम होने पर आत्महत्या की कोशिश के बाद अपने बेटे को जिंदगी में लौटा लाने का फलसफा पढ़ाता है। यह फिल्म प्रेरणा देती है कि जिंदगी उतार-चढ़ाव का ही नाम है, इसमें किसी तात्कालिक असफलता से घबराना और टूटना नहीं चाहिए। विडंबना है कि जब खुद पर आई तो ऊपर से ऊर्जावान, सक्रिय और जिंदादिल दिखने वाले सुशांत के बारे में यही अंदाजा लगाया जा रहा है कि उन्होंने घबराकर मौत को गले लगा लिया। ग्लैमर की चकाचौंध भरी सिनेमा या टीवी की जिंदगी में चर्चित और सफल कलाकारों का कुछ समय की असफलताओं के दबाव में आकर अवसाद में फंस जाना और आत्महत्या कर लेना कोई नयी बात नहीं है। ये असफलताएं निजी जीवन में रिश्तों की किसी टूट से जुड़ी हो सकती हैं या कॅरिअर से जुड़ी भी हो सकती हैं।

दिव्या भारती

प्यार में मिली कोई टीस अक्सर कामयाब सितारों को भी अंदर ही अंदर सालती रहती है और वह किसी रोज अचानक कोई विस्फोटक रूप धर लेती है। कुछ ऐसा ही किस्सा सफलता का भी है। लंबे संघर्ष और दिनरात की कड़ी मेहनत के बाद टीवी या सिनेमा की दुनिया में मिली कामयाबी कलाकारों को जो रातोंरात मशहूरियत दिलाती है, उसके मंद पड़ जाने या बुझ जाने का खतरा भी उतना ही बड़ा होता है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़कर मायानगरी मुंबई में किस्मत आजमाने पहुंचे सुशांत का किस्सा उन कलाकारों से अलग नहीं है जिन्होंने अपनी प्रतिभा, लगन और मेहनत से चंद वर्षों में वह मुकाम हासिल कर लिया जिसका खुद उन्होंने ख्वाब देखा था। कुछ टीवी शो और करीब आधा दर्जन फिल्मों ने ही सुशांत को कामयाबी के उस आसमान पर पहुंचा दिया जिसके वह हकदार थे। लेकिन उनके डिप्रेशन की खबरों को सच मानें तो कह सकते हैं कि उन्हें भी चमक-दमक भरी मायानगरी के उन अंधेरे पहलुओं का जल्दी ही अहसास हो गया और इस अहसास ने उन्हें सच के इस क्रूर धरातल पर ला छोड़ा कि यह ग्लैमरस पेशा जितनी जल्दी किसी को कामयाब बनाता है, उतनी ही जल्दी नाकामी और गुमनामी के अंधेरों में भी धकेल देता है।
सही मायने में फिल्म ‘छिछोरे’ के बाद उनके हाथ में कोई ऐसी फिल्म नहीं थी, जिसे उल्लेखनीय माना जाए। इस बीच फिल्म ‘चंदा मामा दूर के’ में उनकी भूमिका और इसके पीछे उनकी मेहनत की खबरें जिस मीडिया में आ रही थीं, वहीं इस फिल्म के ठंडे बस्ते में चले जाने की निराशाजनक खबरें भी चर्चा में थीं। लॉकडाउन के दौरान ठप पड़े सिनेमा जगत के अलावा निजी जिंदगी का अकेलापन और रिश्तों में हुई कोई टूट आदि में से किस कारण ने सुशांत को और ज्यादा अवसाद में धकेला होगा-कहा नहीं जा सकता। पर इतना तय है कि उनकी आत्महत्या फिल्म, टीवी और फैशन जगत के अंधेरों का एक और उदाहरण है।

सेजल शर्मा

चकाचौंध जिंदगी और घुटन का माहौल
फिल्म और फैशन जगत में हुई ऐसी अनहोनियों के पीछे अक्सर जो एक कॉमन चीज़ नज़र आती है, वह एक शीर्ष पर पहुंचने के बाद वहां से गिरने की परिणति है जो अनेक सितारों को पहले भी इसी तरह आत्महत्याओं की तरफ धकेल चुकी है। काफी पहले युवा दिव्या भारती की आत्महत्या सुशांत जैसे हश्र के कारण चर्चा में आई थी। वर्ष 2016 में टीवी एक्टर प्रत्यूषा बनर्जी के सुसाइड केस ने हमारा ध्यान मायानगरी के घटाटोप की तरफ खींचा था। फिल्म ‘निशब्द’ से अचानक ख्याति के शीर्ष पर पहुंची जिया खान एक और उदाहरण है। हाल के अरसे में सेजल शर्मा, कुशल पंजाबी जैसे टीवी कलाकारों की आत्महत्याएं भी मुंबई की चकाचौंध भरे जीवन के पीछे कायम घुटन का संकेत देती हैं। कलाकारों की अपनी महत्वाकांक्षाएं इसमें मुश्किलें पैदा करती हैं क्योंकि वे यह समझ नहीं पाते हैं कि जिस तरह इस इंडस्ट्री ने उन्हें रातोंरात स्टार बनाया है, उसी तरह नये उभरते कलाकार भी किसी रोज स्टार बनकर उनकी जगह ले सकते हैं। यही नहीं, यहां जितनी ऊंची सफलताएं हैं, उतने ही बड़े खतरे गिरने के भी हैं। अगर आपकी चार फिल्में खूब चली हैं, तो बहुत संभव है कि आगे की दर्जन भर फिल्में पिट जाएं और आप गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिए जाएं। युवा सितारों की समस्या निजी जीवन और कॅरिअर में मिलने वाली इस नाकामी के साथ संतुलन नहीं बिठा पाने की है। यह जिम्मेदारी सिर्फ सिनेमा, टीवी और फैशन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों और उनके समाज की है कि वे यह देखें कि उनका कोई दोस्त हताशा के भंवर में क्यों फंसता जा रहा है और उसे वे कैसे बाहर निकाल सकते हैं और उम्मीदों व जीवन की तरफ मोड़
सकते हैं।

प्रत्यूषा बनर्जी

सबमें नहीं होता विकल्प तलाशने का हुनर
बॉलीवुड में सफलता का नशा कितना संहारक होता है-इसका अंदाजा इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को हमेशा रहा है। काफी अरसा पहले कॉमेडियन जॉनी लीवर ने कहा था कि एक बार एवरेस्ट पर चढ़ जाने का मतलब यह नहीं है कि आप वहां अपना घर बना लें। अगर आपने वहां कामयाबी का झंडा गाड़ दिया, तो शांतिपूर्वक वहां से उतर कर अपने लिए कोई और सम्मानजनक काम ढूंढ़ लेना चाहिए और एवरेस्ट को नये लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए। दिक्कत यह है कि युवा सितारों को शीर्ष से उतरना मंजूर नहीं होता। उन्हें यह प्रतीत होता है कि एक बार यहां से उतरे तो वे दुनिया की नज़रों से ओझल ही हो जाएंगे। इस उद्योग में यह स्कोप कम है कि अगर आप एक्टर हैं, तो कुछ फिल्में करने के बाद रिटायरमेंट लेने पर आपको कोई दूसरा सम्मानजनक काम मिल जाएगा। क्रिकेट में खिलाड़ी जब रिटायर होते हैं, तो कमेंट्री करने, खेल अकादमी चलाने, टूर्नामेंट आयोजित करने और किताब लिखने से लेकर दर्जनों विकल्प उनके लिए होते हैं। सुनील गावस्कर, कपिल देव, रवि शास्त्री, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग आदि ढेरों नाम हैं, जो गेंद-बल्ले की सक्रियता से दूर रहकर भी लगातार चर्चा में रहते हैं और उनकी कमाई के स्रोत भी बने हुए हैं। टीवी या सिने जगत में ऐसे सपोर्ट सिस्टम का स्कोप नाममात्र को ही है। कुछेक अपवाद अवश्य हैं। माधुरी दीक्षित, शिल्पा शेट्टी और अमिताभ बच्चन आदि ने उम्र के हिसाब से अपने लिए नए क्षेत्र चुनकर खुद को सक्रिय रखने का हुनर साबित किया है। लेकिन हर किसी के पास वापसी का इतना धैर्य और इतने स्किल नहीं होते।

कुशल पंजाबी

कोई थाम ले आकर बांह
युवाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारी और प्रेम में असफलता से पैदा होने वाला अवसाद है। युवा अपनी नौकरियों से असंतुष्ट हैं, भूमंडलीकरण के दबावों में पहले ही कंपनियों के लिए मुनाफा कमाना महत्वपूर्ण बन गया है, अब तो कोरोना वायरस के प्रकोप से अर्थव्यवस्थाएं और भी ज्यादा डगमगा गई हैं। ऐसे में वेतन कटौती और छंटनी से बचे लोगों पर काम का बोझ और अच्छे प्रदर्शन का दबाव भी बढ़ रहा है। परिवारों में कमाई को लेकर असंतुष्टि भी अवसाद पैदा करने की वजह बन जाती है। पांच साल पहले 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी रिपोर्ट में कह चुका है कि डिप्रेशन यानी अवसाद दुनिया की सबसे बड़ी मानसिक बीमारी बनने जा रहा है।
हमारे देश में वर्ष 2014 में रोजगार संबंधी समस्याओं के चलते प्रत्येक दिन करीब 3 लोगों ने आत्महत्या की, 4,168 युवाओं ने प्रेम में असफल होने के बाद अपनी जान दी थी। चिकित्सा और मनोविज्ञान की नजर से अवसाद एक बेहद गंभीर समस्या है, लेकिन कठिनाई यह है कि कैसे पता किया जाए कि किसी के मन में क्या चल रहा है? यह काम मुश्किल जरूर है, लेकिन रिश्तेदारों और दोस्तों को इसकी जानकारी हो ही जाती है कि उनका कोई करीबी हताशा के भंवर में डूबता जा रहा है। अवसाद में डूबे व्यक्ति को अपने किसी दोस्त का सहारा ऐसे नाजुक वक्त में मिल जाए तो कहानियां अक्सर एक नया सुखद मोड़ ले लेती हैं। इधर सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर कवि कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे ही उदगार लिखे जो दोस्त से मिलने वाली मदद की उपयोगिता ही जाहिर करते हैं-
बात करो रूठे यारों से सन्नाटे से डर जाते हैं,
इश्क़ अकेला जी सकता है, दोस्त अकेले मर जाते हैं।
सुशांत का कोई दोस्त ऐसी कोई मदद कर पाता तो क्या पता वह अपने किसी नए सपने को पूरा करने की मुहिम में लगे होते।


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