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चातुर्मास में भी विवाह के मुहूर्त!

Posted On June - 28 - 2020

मदन गुप्ता सपाटू
पहली जुलाई को देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास शुरू हो रहा है। शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु का एक स्वरूप राजा बलि के यहां और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करने चला जाता है। इसके चार महीने बाद प्रबोधिनी व देवउठनी एकादशी के दिन उनका यह शयन पूरा होता है। इन दोनों एकादशियों के बीच 4 महीनों के दौरान विवाह जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। लेकिन, मुहूर्त चिंतामणि और पीयूषधारा जैसे ग्रंथों के अनुसार, उत्तर भारत में, लोकमान्यता अनुसार विवाहादि के मुहूर्त स्वीकार किए गए हैं। अतः चातुर्मास में विवाह बंद नहीं होंगे, न ही मांगलिक कार्य वर्जित होंगे। केवल श्राद्ध, आश्विन, कार्तिक और पौष महीनों के कुछ दिन छोड़कर विवाह के मुहूर्त प्रबल हैं। पहले ही कोरोना और लॉकडाउन के कारण जनसाधारण के अधिकांश कार्य रुके पड़े हैं, इसलिए हम यहां क्रियात्मक रूप से होने वाली धार्मिक परंपराओं के पौराणिक और आधुनिक संदर्भों का विवेचन कर रहे हैं।
यदि आपको किसी कारण विवाह का अनुकूल मुहूर्त नहीं मिल रहा है, तो आप शुभ दिनों में किसी रविवार को चुन सकते हैं और दिन में अभिजीत मुहूर्त में लगभग दोपहर 12 बजे के आसपास पाणिग्रहण संस्कार, आनंद कारज आदि संपन्न कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अभिजीत मुहूर्त दिन का सर्वाधिक शुभ मुहूर्त माना जाता है। सामान्यत: यह 40 मिनट का होता है। यदि अभिजीत मुहूर्त में पूजन कर कोई भी शुभ मनोकामना की जाए तो वह निश्चित रूप से पूरी होती है। नारदपुराण के अनुसार अभिजीत मुहूर्त यात्रा या शुभ काम के लिए घर से निकलने का शुभ काल होता है। हालांकि, अभिजीत मुहूर्त के दौरान दक्षिण दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए।
जप-तप के महीने
देवशयनी एकादशी को हरिशयनी, पद्मा, पद्मनाभा एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन से गृहस्थ लोगों के लिए चातुर्मास नियम प्रारंभ हो जाते हैं। चातुर्मास का यह समय वर्षा ऋतु का होता है, ऐसे में साधु, संन्यासी यात्रा करने के बजाय एक ही स्थान पर रुककर तप व ध्यान करते हैं। समाज का मार्गदर्शन करते हैं। जैन धर्म में भी संत इस दौरान एक जगह रुककर तप करते हैं। इन चार महीनों में गृह प्रवेश, विवाह जैसे मंगल कार्य न करने के पीछे एक कारण यह है कि इस दौरान लोग ईश्वर की भक्ति से जुड़े रहें, धर्म का आचरण करें। धर्म आचरण सिर्फ कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन आचरण से भी जुड़ा है। बदलते मौसम में जब शरीर में रोगों का मुकाबला करने की क्षमता यानी प्रतिरोधक शक्ति कम होती है, तब आध्यात्मिक शक्ति प्राप्ति के लिए व्रत, उपवास और ईश्वर की आराधना करना बेहद लाभदायक माना जाता है। यह चार महीने का आत्मसंयम काल है। मान्यता है कि इस दौरान नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने लगता है। ऐसे में जरूरी होता है कि देव पूजन द्वारा शुभ शक्तियों को जाग्रत रखा जाए।
चातुर्मास इस बार 5 माह का
इस बार लीप वर्ष है और मलमास व अधिकमास भी। इसके कारण आश्विन माह दो बार आएगा और चातुर्मास 4 के बजाय 5 माह का होगा। अकसर श्राद्ध समाप्त होते ही अगले दिन नवरात्र शुरू हो जाते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा। श्राद्ध 17 सितंबर को खत्म होंगे और नवरात्र 17 अक्तूबर से शुरू होंगे।
दशमी की रात से व्रत
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत रखने का विशेष महत्व है। इस व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात से ही हो जाती है। व्रत का पारण एकादशी की अगली सुबह किया जाता है। दशमी की रात्रि के भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पद्मपुराण के अनुसार यह व्रत सब पापों को हरने वाला है। यह व्रत रखने वाले को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है।


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