योगी आदित्यनाथ ने अपराध के आंकड़ों पर पर्दा डालने के अलावा किया ही क्या : प्रियंका !    इन्फोसिस के अमेरिका में फंसे 200 से अधिक कर्मचारी, उनके परिवार चार्टर्ड विमान से पहुंचे भारत !    आइडाहो झील के ऊपर 2 विमानों की टक्कर, 8 की मौत !    देश में कोविड-19 के मामलों की संख्या 7 लाख पार! !    राम मंदिर कार्यशाला में पत्थरों को चमकाने का काम जोरों पर, 3 माह में होगा पूरा !    पुलवामा में मुठभेड़ में आतंकी ढेर, एक जवान शहीद !    सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के लिए केंद्र को मिला एक माह का समय !    कांवड़ियों को रोकने के लिए हरियाणा, उत्तराखंड से लगती सीमाएं सील ! !    नये दिशा-निर्देश : कक्षाएं ऑनलाइन होने पर विदेशी छात्रों को छोड़ना होगा अमेरिका! !    दुनिया के सबसे अधिक उम्र के शरीर से जुड़े जुड़वा भाइयों का निधन !    

आये तुम याद मुझे

Posted On June - 6 - 2020

स्मृति शेष

श्रीगोपाल नारसन

जिन गीतों को सुनकर श्रोता कल्पनाओं की उड़ान भरने लगते थे ,वे गीत अब दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। इसे गीतों के मरने का युग कहे तो गलत नही होगा। करीब एक दशक पहले नई दिल्ली में डॉ इंद्रजीत के संयोजन में आयोजित एक समारोह में शैलेन्द्र सम्मान प्राप्त करने आए बॉलीवुड के गीतकार से साक्षात्कार हुआ था,तब उनके मन की पीड़ा अनायास ही निकल गई। अपने ज़माने के सुपर स्टार राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती की फ़िल्म टोली के सदस्य रहे योगेश ने रजनीगंधा, मंजिल, दिल्लगी, आनन्द जैसी फिल्मों में जहां अमर गीत देकर शोहरत हासिल की वहीं प्रसिद्ध धारावाहिक चन्द्रकान्ता, रजनी, कर्मभूमि के शीर्षक गीत भी उन्हीं की कलम से निकले थे। योगेश फ़िल्म गीतकार शंकर सिंह शैलेंद्र के खास प्रशंसकों में से एक थे।
उन्होंने बातचीत में कहा कि शैलेंद्र के गीतों के कारण ही राजकपूर की फिल्में अमर हुई है और उन्ही के कारण स्वयं राजकपूर ‘मैं आवारा हूं’ रूप में महानायक बने थे।योगेश ने बताया था कि सलिल चौधरी अपनी फिल्मों में शैलेंद्र के गीत ही लेते थे किंतु जब शैलेंद्र की दुखद मृत्यु हो गई तो उन्हें सलिल दा ने गीत लिखने का अवसर दिया और यही से उनके फिल्मी कैरियर की शुरुआत भी हुई। फिल्मी गीतों में साहित्य की गंगा प्रवाहित करने वाले गीतकार योगेश ने स्तरीय गीत लिखकर अपनी कलम का लोहा मनवाया। “कहीं दूर जब दिन ढल जाए , सांझ की दुल्हन बदन चुराए/ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय ,(फ़िल्म आनंद), रजनीगंधा फूल तुम्हारे यूं ही महके जीवन में ( रजनीगंधा), आए तुम याद मुझे , गाने लगी हर धड़कन खुशबू लाई पवन (मिली) , रिमझिम गिरे सावन सुलग -सुलग जाए मन (मंजिल) कई बार यूं ही देखा है यह जो मन की सीमा रेखा है ( रजनीगंधा) न जाने क्यों , अचानक ये मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद ‘(छोटी छोटी बातें) ‘ जैसे अर्थपूर्ण ,कर्णप्रिय मन को छूने वाले मधुर गीतों को सुनकर लगता है जैसे उनके गीतों में गंगा कल-कल करके बह रही हो ।
गीतों में सामाजिक सरोकार की बात
वे कहते थे कि फिल्मी गीत केवल तुकबंदी या मनोरंजन मात्र नहीं होते बल्कि सामाजिक सरोकार और साहित्यिक प्रतिबद्धता के भाव को गीतों में लाकर रचनात्मकता का निर्वाह किया जा सकता है’। शंकर सिंह शैलेन्द्र के निधन के बाद गीतकार योगेश को सलिल चौधरी ,एस डी बर्मन ,मदन मोहन ,आर डी बर्मन जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम करने का अवसर मिला। सन 1962 में उन्होंने ‘रोबिन सखी’ फ़िल्म में 6 गीत लिखकर बतौर गीतकार अपनी पारी की शुरुआत की थी। इस फ़िल्म का एक गीत सुमन कल्याण पुर और मन्ना डे के स्वर में “तुम जो आओ तो प्यार आ जाये ज़िन्दगी में बहार आ जाये । इन छह गीतों के लिए उन्हें एक सौ पचास रुपये का पारिश्रमिक मिला था। यह गीत रेडियो सीलोन पर बहुत बार प्रसारित किया गया लेकिन उन्हें प्रसिद्धि मिली फ़िल्म ‘आनंद’ के दो गीतों के कारण ही जिनमें, ‘ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाय , कभी तो हंसाय कभी ये रुलाये’, तथा ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ है। योगेश ने बताया कि अमिताभ बच्चन और राजेश।खन्ना उन्हें कविराज कहकर बुलाने लगे। सबसे बड़ा सम्मान तब मिला जब गुलज़ार की बहन ने कहा ‘आनंद फ़िल्म के सभी गीत अच्छे है लेकिन मेरे भाई गुलज़ार के गीतों से अधिक मुझे आपके गीत अच्छे लगते हैं। ‘ इसी तरह सलिल चौधरी साहब के संगीत से सजा एक गीत’ कोई पिया से कहो ,अभी जाए न’ जब लता ने गाया और उन्होंने सलिल दा से पूछा ‘सलिल दा यह गीत शैलेन्द्र ने अपने निधन से पूर्व आपको लिखकर दिया था क्या,बड़ा सुंदर गीत है’। सलिल दा ने कहा कि ‘नहीं यह गीत शैलेन्द्र का नहीं बल्कि एक नए गीतकार योगेश ने लिखा है। लता दीदी के मुंह से यह सुनकर मन मयूर की तरह नाचने लगा। यह तारीफ किसी भी अवॉर्ड से बढ़कर थी। इसी तरह फ़िल्म ‘एक रात’ के मो रफी के गाये एक गीत -’सौ बार बनाकर मालिक ने सौ बार मिटाया होगा, यह हुस्न मुज़्ज़सिम तब तेरा इस रंग पे आया होगा’ को सुनकर मजरूह सुल्तानपुरी ने कहा ‘सुंदरता का ऐसा गीत फ़िल्म में किसी ने नहीं लिखा, यह सुंदरता का बेमिसाल गीत है’ । मजरूह साहब से तारीफ के ऐसे शब्द सुनकर कौन खुश नहीं होगा। 19 मार्च 1943 में लखनऊ में जन्मे योगेश 29 मई सन 2020 को इस दुनिया को अलविदा कह गए । योगेश के मधुर , अर्थपूर्ण , मन को भाने वाले सदाबहार कालजयी गीत उन्हें गीत संगीत प्रेमियों के दिलों में सदा ज़िंदा रखेंगे। लता मंगेशकर के शब्दों में,’ योगेशी जी के लिखे कई गीत मैंने गाए। योगेश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे।’
‘फिल्मों में मरते गीतों को बचाने की ज़रूरत’
योगेश मानते थे कि जिस प्रकार गांधी जी ने देश की आजादी के लिए आंदोलन किया वैसा ही आंदोलन फिल्मों में मरते हुए गीतों को बचाने के लिए करने की जरूरत है। वे मौजूदा गीतों पर सवाल उठाते थे कि कुछ गीत तो समझ से ही परे है और कुछ गीत सुनने के बजाए देखने की चीज हो गए है,जो चिंता का विषय है। योगेश ने क्षेत्रीय फिल्मों के लिए भी सेंसर बोर्ड बनाने की वकालत की थी,वे कहते थे कि भोजपुरी, हरियाणवी,पंजाबी आदि क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में भोंडापन हावी हो गया है। जिस पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। उन्होंने माना कि पेट की खातिर उन्हें भी हालात से समझौता करना पड़ा।
उन्हीं के शब्दों में,
‘वक्त का यह परिंदा रुका है कहां
गांव मेरा मेरे याद आता है।’
योगेश का कहना था कि बेहूदे गीतों से तंग आकर इत्तेफाक, कानून व ब्लैक जैसी कई फिल्में बिना गीतों के बनी है परंतु गीत ही फ़िल्म का श्रृंगार है। तभी तो आज भी पुराने फिल्मी गीत लोगों की जुबान पर चढ़े हैं और पुराने गीतों के ही रीमिक्स तक आ रहे हैं। जब उनसे पूछा था कि वे जीवन से कितना सन्तुष्ट है, तो उन्होंने कहा था ,’मेरा न मन भरा है,न तन भरा है। लगता है यह मुर्दों की बस्ती है , जिसमें जिंदगी सूनी- सूनी सी हो गई है। अब तो यह जान घर के तोते व कुत्ते में अटकी है क्योंकि बच्चे शादी के बाद बाहर चले गए अपने हिस्से में एकाकी जीवन ही आया।’ अब यह एकाकी जीवन छोड़ कर नग़मों का जादूगर सदा के लिए सो गया है। लेकिन उनके अमर गीतों की गूंज दुनिया हमेशा सुनती रहेगी।


Comments Off on आये तुम याद मुझे
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.