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अम्मा जरा देख तो ऊपर

Posted On June - 27 - 2020

कालजयी बाल कविता

बच्चो! आप कई कविताएं पढ़ते होंगे। यूट्यूब या टीवी पर भी कविताओं को सुनते होंगे। कभी-कभी आपके माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी आपको अपने दौर की कहानी या कविता सुनाते होंगे। आइये आज हम आपको एक बहुत पुरानी कविता पढ़ाते हैं जो बारिश पर लिखी गयी है। यह कविता कई दशकों तक स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल रही। बरसात के मौसम में इसका फिर से आनंद लीजिए-
अम्मा जरा देख तो ऊपर, चले आ रहे हैं बादल।
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं, दीख रहा है जल ही जल।
हवा चल रही क्या पुरवाई, झूम रही है डाली-डाली,
ऊपर काली घटा घिरी है, नीचे फैली हरियाली।
भीग रहे हैं खेत, बाग, वन, भीग रहे हैं घर आंगन।
बाहर निकलूं मैं भी भीगूं, चाह रहा है मेरा मन।
मां
मेरी मां बड़ी प्यारी, जग सारे से न्यारी।
हंसती जैसे हो मां, लगती तुम फुलवारी।
मैंने सीखा मां से, चलना क़दम मिला के।
तेज़ दौड़ना सीख गया, मां की दुआ पा के।
रोता तो मां रोने लगती, हंसता तो ख़ुश होती।
मै जागूं मां जागे, सोता तो वो सोती।
बिना बताए बच्चो के, मन की जाने
मां ही प्रभु का रूप, दुनिया सब जाने
हरि कृष्ण मायर


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