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सिंडिकेट 30 को, 24 घंटे बाद फाइल को हाथ लगा रहे कुलपति

Posted On May - 22 - 2020

जोगिंद्र सिंह/ट्रिन्यू
चंडीगढ़, 21 मई
पंजाब विश्वविद्यालय सिंडिकेट की मीटिंग 30 मई को होने जा रही है। कोरोना महामारी के चलते 8 मार्च के बाद अब 30 मई को मीटिंग होने जा रही है जिस कारण पीयू के कई काम रुके हैं। सिंडिक सदस्यों के पास अभी तक एजेंडा नहीं पहुंचा है। बताया जाता है कि अभी एजेंडा तैयार हो रहा है। कुलपति प्रो. राज कुमार ने अपने दफ्तर में फाइलें तो मंगा ली हैं मगर उन्हें अभी छुआ नहीं है। सूत्रों की मानें तो कुलपति कोरोना से इतने डरे हुए हैं कि वे 24 घंटे से पहले किसी फाइल को हाथ तक नहीं लगाते। आज जो फाइलें उनकी टेबल पर पहुंची हैं, कल उन्हें देखने के बाद ही एजेंडा आइटम के तौर पर शामिल किया जा सकेगा। वैसे सिंडिकेट की बैठक में सबसे बड़ा मसला तो नये डीएसडब्ल्यू की नियुक्ति का ही है।
लॉकडाउन के चलते करिअर एडवांस्मेंट स्कीम (कैस) के तहत हुई फैकल्टी मैंबर्स की प्रमोशन का मामला भी सिंडिकेट में आयेगा। इसके अलावा एडहॉक, अनुबंध और टेम्परेरी तौर पर लगे टीचिंग व नॉन-टीचिंग स्टाफ को 5 मई को हटाने और अगले दिन फैसले को वापस लेने का मुद्दा भी बैठक में आयेगा। पीयू के एकेडमिक कैलेंडर को भी बैठक में हरी झंडी मिल सकती है जिसमें अगले सत्र में कोरोना के चलते कार्यदिवस घटने पर सर्द अवकाश सहित कई छुट्टियां रद्द करना व शनिवार को भी पढ़ाई कराने संबंधी कई बिंदु शामिल हैं। वैसे पीयू को अभी इस संबंध में मानव संसाधन मंत्रालय और यूजीसी के विस्तृत दिशा-निर्देश आने का भी इंतजार है। इसके अतिरिक्त बैठक में मल्टीपर्पज टॉस्किंग स्टाफ को एक्सटेंशन का मामला भी लाया जा रहा है।

डीएसडब्ल्यू को लेकर हंगामे के आसार
डीएसडब्ल्यू को लेकर दोनों गुटों में हंगामा हो सकता है, क्योंकि जो नाम कुलपति की पसंद के हैं, उन पर सिंडिकेट में बहुमत वाला ग्रुप रजामंद नहीं है जिसमें प्रो. देविंदर सिंह, प्रो. हरीश कुमार, प्रो. प्रशांत गौतम का नाम शामिल है। प्रो. सिंह व प्रशांत तो कभी वार्डन भी नहीं रहे जबकि हरीश कुमार पहले ही इस पद के लिये अपनी अनिच्छा जाहिर कर चुके हैं। प्रशांत गौतम भी व्यस्तता का बहाना बनाकर किसी विवाद से बचने के प्रयास में हैं जबकि प्रो. देविंदर अपने विरोधियों के निशाने पर पहले से ही हैं। गोयल ग्रुप की ओर से भी अगर प्रो. जेके गोस्वामी या प्रो. जतिंदर ग्रोवर का नाम बढ़ाया तो उस पर कुलपति खेमे की मुहर लग पाना मुश्किल है। प्रो. रजत संधीर और प्रो. जगत भूषण हालांकि ऐसे नाम हैं जिन पर थोड़े से अगर मगर के साथ दोनों धड़ों की सहमति बन सकती है। जगत भूषण तो प्रो. नाहर को हटाये जाने के कार्यकाल के दौरान कुलपति की पसंद भी रहे हैं जबकि रजत संधीर पर शायद ही किसी को एतराज हो।


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