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सस्ते में नहीं मिलती राष्ट्रीय सुरक्षा

Posted On May - 22 - 2020

ले. जनरल हरवंत सिंह (से.नि.)

पिछले दिनों खबर आई थी कि सेना एक प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसके तहत सिविलियन लोगों को तीन साल के लिए सेना में काम करने का मौका दिया जाएगा ताकि प्रतिभावान युवा आकर्षित हो पाएं, यह सोच हास्यास्पद है। केवल तीन वर्षीय सेवाकाल वाली इस पेशकश के साथ कोई किस तरह अच्छी प्रतिभाओं को अपनी ओर खींच पाएगा? इतने कम समय के लिए आए किसी अफसर की उपयोगिता क्या हो पाएगी, इस सवाल का उत्तर सेना के हाई कमान को पहले खोजना होगा।
उक्त प्रस्ताव को 13 लाख संख्या वाली भारतीय सेना में सुधार प्रयासों का एक हिस्सा बताया जा रहा है। लगता है सेना पर दबाव है कि वह हरसंभव तरीके से अपने खर्च में कटौती करे। यह विचार देश के रक्षा बजट में कटौती करने के लिए दिए जाते प्रस्तावों की लीक पर है। सेना हाई कमान ने सरकार की मांग पर जिस तरह से यह नया ढंग सोचा है, लगता है न तो सही तरीके से दिमाग लगाया है और न ही मजबूती से वह अपनी बात रख पाया है कि देश की सुरक्षा की खातिर जरूरी तौर-तरीकों और खर्च से बचना संभव नहीं है।
देश की सैन्य संरचना का पुनर्गठन करने के लिए कई कमेटियों का गठन हो चुका है, इनका मंतव्य था : खर्च में कटौती कैसे हो सके, अफसर-सिपाही संख्यानुपात क्या हो, सैनिक संख्या में कटौती के बावजूद सेना को और ज्यादा कार्यकुशल कैसे बनाया जाए और अफसर वर्ग में तरक्की संबंधी संभावनाओं में सुधार कैसे हो सके। लगता है सेना पर अपने खर्च में और आगे कटौती करने का दबाव जारी है। ऐसा कहने वालों को यह अहसास कम ही है कि आम जिंदगी की तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय में कुछ चीज़ें सस्ते में नहीं मिला करतीं।
तथापि सरकार ने विभिन्न कमेटियों द्वारा दी गई सिफारिशों में केवल उन्हीं को चुनना पसंद किया है जो इसकी सोच और योजना पर फिट बैठती है। इसीलिए अजय विक्रम सिंह कमेटी के अनेक सुझावों को नजरअंदाज किया गया है, इसी तरह पिछले दिनों शेकतकर कमेटी द्वारा सुझाए उपायों को भी दरकिनार कर दिया गया है। चूंकि ज्यादातर उपरोक्त सिफारिशें आपस में जुड़ी हुई हैं, इसलिए अगर कोई चुनींदा पर ही विचार करेगा तो इससे गतिरोध और जटिलताएं पैदा होनी स्वाभाविक हैं, ऐसे में अंतिम नतीजा अक्सर उससे उलट निकलता है जैसा आरंभ में सोचा गया था।
सेना में लगभग 3.75 लाख सिविलियन स्टाफ भी काम करता है, जिनका वेतन रक्षा बजट से दिया जाता है। ये लोग अधिकांशतः डीआरडीओ, आयुध उद्योग, सेना इंजीनियर कोर, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों, मंत्रालय इत्यादि में हैं। इनकी गिनती कुल सेना संख्याबल का 25 प्रतिशत है, लेकिन वास्तविक फौजियों की तुलना में वेतन, भत्ते और पेंशन के रूप में इनके हाथ आया पैसा उनसे ज्यादा होता है।
इसके पीछे कारण है इन सिविलियन कर्मियों पर नॉन-फंक्शनल फाइनेंशल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) प्रावधान लागू होना। सेना में उच्च वेतन वाली श्रेणी में फौजी वर्ग की अपेक्षा सिविलियन श्रेणी में नौकरियों की उपलब्धता कहीं ज्यादा है। एनएफएफयू की वजह से नौकरी में ऊंचे वेतनमान पर पहुंचने की संभावना सैनिक श्रेणी वालों से ज्यादा है। उदाहरणार्थ, सेना में क्लास-ए सेवा का एक सिविलियन अफसर का (3.75 लाख में अधिकांशतः इसी श्रेणी में आते हैं) वेतनमान 19 साल की सेवा के बाद भारत सरकार के संयुक्त सचिव के समकक्ष पहुंच जाता है, जबकि इसकी बनिस्बत एक मेजर जनरल को इस वेतन तक पहुंचने में 29 साल की नौकरी करनी पड़ती है। वैसे भी मेजर जनरल के पद को भारत सरकार के संयुक्त सचिव के समकक्ष मानना सही नहीं है।
इसलिए अगर छंटाई करनी बनती है तो वह सेना के इन पौने चार लाख वर्ग में की जाए, लेकिन इनको कभी छुआ तक नहीं गया। सेना में फौजी वर्ग से शीर्षस्थ वेतनमान पर महज 20 अफसर ही पहंुच पाते हैं जबकि सिविलियन श्रेणी, जिसकी गिनती फौजियों से कहीं कम है, उनमें यह संख्या 100 से ज्यादा है!
सेना के कुल बजट का लगभग 70 फीसदी भाग खर्च राजस्व व्यय मद (ऐसा खर्च, जिससे न तो कोई परिसंपत्ति बन पाए न ही सरकार की देयता घटे) में रखा जा रहा है, जिससे फौज के लिए अत्यधिक जरूरी अवयवों और आधुनिकीकरण के लिए पैसा बहुत कम बचता है। चीफ ऑफ स्टाफ के पूर्व प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रि.) ने एक लेख में इस पक्ष को अच्छे ढंग से समझाया है। उन्होंने कहा : ‘इस बात को नजरअंदाज किया जा रहा है कि आज रक्षा बजट का 70 प्रतिशत राजस्व व्यय में चला जाता है क्योंकि रक्षा बजट सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 1.46 फीसदी है। लेकिन अगर इस मद को रक्षा विभाग पर संसदीय कार्य समिति की सिफारिश के अनुसार जीडीपी का 3 प्रतिशत कर दिया जाए तो राजस्व व्यय खुद-ब-खुद घटकर लगभग 40 प्रतिशत रह जाएगा।
रक्षा विभाग में विभिन्न नियुक्तियों पर सामान्य कार्यावधि वाली नौकरी और अल्पकालीन सेवाकर्मियों के बीच अनुपात की भी पुनः समीक्षा की जानी चाहिए। विगत में अजय विक्रम सिंह कमेटी ने अपनी सिफारिश में सामान्य और अल्पकालीन कर्मियों का अनुपात 1:1.1 प्रतिशत रखने की सिफारिश की थी। हालांकि, ज्यादा माकूल अनुपात 60:40 रहेगा (60 सामान्य, 40 अल्पकालीन)।
सेना में अफसरों की अधिकृत मंजूरशुदा पद संख्या लगभग 40,000 है। मौजूदा समय में 12,000 अधिकारियों की कमी है और यह लंबे समय से चली आ रही है, इससे सैन्य बल की कार्यक्षमता पर फर्क पड़ता है। मौजूदा समय में अल्पकालीन सेवा के तहत एक अधिकारी 10 साल तक काम कर सकता है, जिसे 14 साल तक बढ़ाया जा सकता है। इस अवधि वाले सेवाकाल की अपनी कमियां तो हैं ही, इसके अलावा सिविल जिंदगी में फिर से स्थापित होने और रोजगार पाने की समस्याएं अलग से हैं। यही वजह है कि फौज की ओर अच्छी प्रतिभाएं आने में कतराती हैं।
बेशक इस नई व्यवस्था के तहत हमें कैप्टन रैंक के अधिकारी बड़ी संख्या मिलने लगेंगे, लेकिन जल्द ही फौज से निवृत्ति के बाद उन्हें सिविल जिंदगी में अपने भरण-पोषण के लिए छोटा-मोटा काम करते देखा जाएगा, इससे सिविल सोसायटी में सेना की अरसे से बनी छवि पर असर पड़ेगा।
सुरक्षा बलों में मानदंडों पर खरा उतरने वाला जिस किस्म का मानव संसाधन हमें चाहिए होता है उसको पाने के लिए अल्पकालीन सेवा को यथेष्ट रूप में आकर्षित बनाना होगा। इसलिए यह अवधि 3 की बजाय 5 साल की जाए, जिसमें प्रशिक्षण के लिए 4 महीने अलग से रखे जाएं। जहां तक सेना उपरांत सिविल जिंदगी में उनके पुनर्वास की बात है, तो इन लोगों में कुछ को सामान्य कमीशन रैंक में समाहित किया जा सकता है तो बाकियों को अगर अपने रोजगार के सिलसिले में उच्च शिक्षा लेनी पड़े तो संस्थानों में भर्ती कोटा एवं वजीफा देना सुनिश्चित किया जा सकता है। कुछेक को योग्यता मुताबिक केंद्रीय सार्वजनिक संस्थानों और केंद्रीय सिविल सेवा में भी लगाया जा सकता है। जो लोग फौज में अल्पकालीन सेवा चुनना पसंद करें उन्हें कार्यकाल समाप्ति उपरांत एकमुश्त आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। इन अफसरों को केंद्रीय सुरक्षा बल कैंटीन से रियायती दर पर वस्तु खरीद की सुविधा भी दी जानी चाहिए।
संभवतः हम लोग उसी स्थिति में लौट रहे हैं जो 1962 से पहले थी। सेना के उच्च कमान में बैठने वाले देश को सुरक्षित रखने के लिए जिम्मेवार होते हैं और वतन को महफूज रखने एवं राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की खातिर उन्हें मजबूती से अपनी बात रखनी होगी।

लेखक सैन्य मामलों के कमेंटेटर हैं।


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