रिसर्च से पुष्टि, पशुओं में नहीं फैलता कोरोना !    हल्दीयुक्त दूध कोरोना रोकने में कारगर !    ऑनलाइन पाठशाला में मुक्केबाजों के अभिभावक भी शामिल !    फेसबुक ने घृणा फैलाने वाले 200 अकाउंट हटाए !    अश्लीलता फैलाने और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान में एकता कपूर पर केस दर्ज !    भारत के लिए आयुष्मान भारत को आगे बढ़ाने का अवसर : डब्ल्यूएचओ !    पाक सेना ने एलओसी के पास ‘भारतीय जासूसी ड्रोन' को मार गिराने का किया दावा !    भारत-चीन अधिक जांच करें तो महामारी के ज्यादा मामले आएंगे : ट्रंप !    5 कर्मियों को कोरोना, ईडी का मुख्यालय सील !    भारत-चीन सीमा विवाद : दोनों देशों में हुई लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत !    

सत्ता-समाज को बेनकाब करता उनका जाना

Posted On May - 23 - 2020

तिरछी नज़र

सहीराम

देखो जी, मजदूर अच्छे हैं, वे सच्चे हैं, भले हैं। पर चाहिए नहीं। वे गरीब हैं, मजबूर हैं, हमारी सहानुभूति भी है। पर वे हमें चाहिए नहीं। वे भूखे हैं, प्यासे हैं, उनके पास न रहने का कोई ठिकाना है, न खाने का पैसा है। हम उन्हें खाना खिला सकते हैं। पर वे हमें चाहिए नहीं। वे तपती गर्मी में पैदल चल रहे हैं, वे गर्मी से तप रहे हैं, पसीना-पसीना हैं, उनके पांवों में छाले पड़ गए हैं, जख्म हो गए हैं, वे लहूलुहान हैं। टीवी में उनकी तस्वीरें देखकर ही मन कच्चा हो रहा है। पर वे हमें चाहिए नहीं। छोटे-छोटे बच्चे गर्मी में बिलबिला रहे हैं, वे पैदल नहीं चल सकते हैं, कोई उन्हें सूटकेस पर बिठाकर घसीट रहा है, कोई उन्हें साइकिल पर ले जा रहा है, कोई उन्हें रिक्शे में ले जा रहा है। देखकर ही कलेजा मुंह को आ रहा है। पर वे हमें चाहिए नहीं। वे हाईवे से नहीं चल सकते, वे रेल की पटरी से नहीं चल सकते, वे खेतों की पगडंडियों से नहीं चल सकते, फिर भी देखो वे चल रहे हैं, अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हैं। अफसोस है। पर वे हमें चाहिए नहीं। हम चैरिटी कर सकते हैं, हम उन्हें खाना खिला सकते हैं, हम उन्हें पानी दे सकते हैं, हम उनके साथ सहानुभूति प्रकट कर सकते हैं, हम अफसोस जता सकते हैं। पर वे हमें चाहिए नहीं।
वे ट्रकों की टक्कर से मर रहे हैं, वे ट्रैक्टरों की टक्कर से मर रहे हैं, वे बसों की टक्कर से मर रहे हैं, वे रेल से कटकर मर रहे हैं। उनके मरने पर रोना आ रहा है। पर वे हमें चाहिए नहीं। कोई ट्रकवाला उन्हें घर पहुंचाने के लिए लूट रहा है, कोई बिचौलिया उन्हें घर पहुंचाने के लिए लूट रहा है। वे घर पहुंचने की आस में खुशी-खुशी लुट रहे हैं। हमें गुस्सा आ रहा है लूटने वालों पर। लेकिन वे हमें चाहिए नहीं। सरकार कह रही है थोड़ा धीरज धरो, यूं भीड़ न करो, हम तुम्हें खाना दे रहे हैं, हमने तुम्हारे ठहरने की व्यवस्था कर दी है न। फिर भी उन्हें क्यों जाना है घर, कुछ समझ में नहीं आ रहा। पता नहीं वे भोले हैं या हम भोले हैं। जो भी हो, पर वे हमें चाहिए नहीं।
सरकार कह रही है कि हम बसें चलाएंगे, हम ट्रेनें चलाएंगे। हम तुम्हें घर भेजेंगे। पर जो बसें चला रहे हैं, उनकी बसें हम नहीं चलने देंगे। हमें मजदूरों से कोई दुश्मनी थोड़े ही है। बस वे हमें चाहिए नहीं। सरकार कहती है कि अरे इस तरह हाईवे पर चलकर जान जोखिम में मत डालो, कोर्ट कहता है कि कोई पटरी पर सोएगा तो मरेगा ही। पर असल बात है कि वे हमें चाहिए ही नहीं। हमें पता है कि उनके बिना शहर नहीं चलेगा, शहरी जीवन भी नहीं चलेगा, फैक्टरियां नहीं चलेंगी, कल-कारखाने नहीं चलेंगे, दुकानें और मॉल नहीं चलेंगे। फिर भी वे हमें चाहिए नहीं।


Comments Off on सत्ता-समाज को बेनकाब करता उनका जाना
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.