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श्रीकृष्ण ने कहा- देवर्षियों में नारद हूं मैं

Posted On May - 3 - 2020

9 मई : नारद जयंती

अनुपम कुमार
प्रभावशाली वक्ता। मेधावी नीतिज्ञ। कवि। समस्त लोकों के समाचार जानने में समर्थ। समस्त शास्त्रों में प्रवीण। सद‍्गुणों के भंडार। सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाला व्यक्ति। ये हैं नारद की विशेषताएं। टेलीविजन या फिल्मों में दिखायी जाने वाली छवि से एकदम अलग। श्रीमद्भागवत‍् के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता स्वीकार करते हुए कहा है, ‘देवर्षीणाम‍् च नारदः।’ अर्थात‍् देवर्षियों में मैं नारद हूं। उन्हें मुनियों के देवता भी कहा गया।
शास्त्रों में नारद को ‘मन का भगवान’ कहा गया है जो किसी होनी-अनहोनी को समय रहते पहचान लेते हैं। विभिन्न कालों, विविध युगों, समस्त विधाओं और वर्गों में आदर के पात्र रहे भगवान नारद को आज इस कारण ज्यादा याद किया जाता है क्योंकि वे मीडिया क्रांति और समाचार युग में पत्रकारों के प्रकाश स्तम्भ हैं। कई और धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में भी उनका परिचय समय-समय पर दिया गया है, जिसके अनुसार वह ब्रह्मा के छह पुत्रों में से छठे हैं। वह विष्णु भगवान के अनन्य भक्तों में से एक हैं। वह अवतारी पुरुष हैं। श्रीमद्भागवद्पुराण का कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया है और अपने उपदेशों से सत्कर्मों के द्वारा भवबंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया है।
नारद का परिचय हिंदू धर्म के लोकप्रसिद्ध महाकाव्य सभापर्व के पांचवें अध्याय में भी विस्तार से दिया गया है। उन्हें वेद, उपनिषदों के मर्मज्ञ, इतिहास पुराण के विशेषज्ञ और अतीत की बातों को जानने वाला बताया गया है। न्याय एवं धर्म के तत्वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष, संगीत विशारद के रूप में देखा गया है। उन्हें यह सब विरासत में नहीं, बल्कि कठिन तपस्या के बाद प्राप्त हुआ। उनके नाम से अठारह महापुराणों में से एक पुराण भी है जिसे नारदोक्तपुराण कहा गया है। वह ज्योतिष के साथ-साथ भक्ति के भी आचार्य हैं। इस तरह कई और धर्मग्रंथों और शास्त्रों में उनके व्यक्तित्व की चर्चा विस्तार से है। लेकिन इन सबसे हटकर उनकी एक छवि को ‘रील’ यानी आभासी दुनिया में छोटा और एकांगी बना दिया गया है।


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