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राजनीति का वक्त नहीं

Posted On May - 21 - 2020

रचनात्मक सहयोग की भूमिका निभाए विपक्ष

जैसे ही चौथे चरण के लॉकडाउन में कुछ छूट मिलनी शुरू हुई, विपक्ष के हमलों में तेजी आने लगी। राजनीतिक दल भी सतारूढ़ दल के ‘संकट में अवसर तलाशने’ के फार्मूले पर आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। पहले कोविड-19 से निपटने के तौर-तरीकों को लेकर केंद्र और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच टकराव की खबरें आ रही थीं। कहा जा रहा था कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार केंद्र सरकार द्वारा जारी सख्त नियमों में छूट दे रही है और कोरोना संक्रमण से हुए नुकसान के आंंकड़े दबा रही है। केंद्रीय पर्यवेक्षक दल को भेजने को लेकर भी किंतु-परंतु होते रहे। फिर राजनीति का खेल बिहार में नजर आया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब कोटा में फंसे प्रदेश के छात्रों को राज्य में लाने की सार्थक पहल की तो बिहार में जमकर राजनीति हुई। विपक्षी दलों ने नीतीश सरकार के खिलाफ जमकर माहौल बनाया। नीतीश कुमार भी केंद्र सरकार से विरोध जताते रहे कि छात्रों व श्रमिकों को लाने को लेकर केंद्रीय स्तर पर नीति बने। फिर जब योगी सरकार ने श्रमिकों को प्रदेश में लाने की पहल की तो बिहार में फिर जमकर राजनीति हुई। कहीं न कहीं नीतीश कुमार बचाव की मुद्रा में नजर आये। फिर उन्होंने प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्रियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई बैठक में श्रमिकों को गृह राज्यों में लाने के लिए केंद्रीय स्तर पर नीति बनाने की मांग की थी। उसके बाद केंद्र सरकार ने स्पेशल श्रमिक ट्रेनों की शुरुआत की। नि:संदेह नीतीश कुमार एक दूरदर्शी नेता हैं और जानते हैं कि लौटने वाले श्रमिकों को संभाल पाने और उनकी रोटी-रोजगार की व्यवस्था करने में राज्य समर्थ नहीं हैं। फिर कोरोना वायरस के संक्रमण की दृष्टि से प्रवासी श्रमिक संवेदनशील हैं। दूसरे, यदि ग्रामीण क्षेत्रों में महामारी पांव पसारती है तो उससे निपटना बेहद जटिल होगा।
नि:संदेह, पश्चिम बंगाल और बिहार विधानसभा चुनाव की दहलीज पर हैं और महामारी के बाद हालात सामान्य होने पर चुनाव की रणभेरियां बजेंगी, लेकिन राजनीतिक दल अपनी जमीन तलाशने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में आये दिन होने वाले टकराव को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। बहरहाल, उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिकों को घर पहुंचाने को लेकर हो रही ‘बस पॉलिटिक्स’ इस राजनीतिक विवाद की ताजा कड़ी है, जिसमें एक हजार बसों के जरिये श्रमिकों को राज्य में भेजने की अनुमति मांगी गई थी। इस मुद्दे पर चिट्ठियों के जरिये श्रमिकों को घर भेजने की कवायद खूब होती रही। एक-दूसरे के प्रयासों में मीन-मेख निकाले जाते रहे। इस मुद्दे पर बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने योगी सरकार पर जमकर हमला बोला। यहां तक कहा कि भाजपा चाहे बसों पर अपनी पार्टी का झंडा लगा ले, लेकिन श्रमिकों को उनके घर तक भिजवा दे। दावा किया गया कि पार्टी ने राज्य के 68 लाख लोगों की मदद की है। नि:संदेह कोरोना संक्रमण का संकट बहुत बड़ा है, सरकारों और नौकरशाहों की क्षमताएं इस संकट के लिए तैयार नहीं थी। खासकर श्रमिक संकट से निपटने में सरकारें विफल रही हैं। हम श्रमिकों को यह भरोसा नहीं दे पाये कि देर-सवेर हालात सुधरेंगे और उनका त्याग-तप रंग लायेगा। फिर भी इस संकट में राजनीति करने की कोई गुंजाइश नहीं है। राजनेताओं को अपनी ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों को वक्त की कसौटी पर कसना चाहिए। राजनीतिक शुचिता को दर्शाना चाहिए। उन्हें संकट में राजनीतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। कोशिश करें कि संकट के मारे लोगों का व्यवस्था पर भरोसा कायम हो। राजनेताओं को इस बात का अहसास होना चाहिए कि जो लोग अपनी कर्मस्थली छोड़कर खाली हाथ लौट रहे हैं, उनका दुख कितना बड़ा है। उन्हें आर्थिक, सामाजिक व मनोवैज्ञानिक संबल देने की जरूरत है। यही योगदान उनकी असली राजनीतिक जमीन तय करेगा।


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