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मोबाइल से नहीं चलेगा काम, लैपटॉप दे सरकार

Posted On May - 23 - 2020

नवीन पांचाल/हप्र
गुरुग्राम, 22 मई
लॉकडाउन में इंटरनेट एक अहम रोल निभा रहा है। स्कूल बंद हैं और सिलेबस पूरा करवाने के लिए जोर ऑनलाइन स्टडी पर है। लेकिन एक्सपर्ट्स अलग राय रखते हैं। घंटों मोबाइल पर ऑनलाइन पढ़ाई से उनकी आंखें कमजोर हो सकती हैं और स्पाइन में दिक्कत भी आ सकती है। माता-पिता को अलर्ट रहने की जरुरत है। अभिभावकों का कहना है कि सरकार को योजना बनाकर लेपटॉप उपलब्ध कराने चाहिए ताकि बच्चों की सेहत ठीक रहे।
पिछले 2 महीने से विद्यार्थी घर बैठे पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं लंबे समय तक ‘ऑन स्क्रीन’ होना अंधापन, मानसिक तनाव और विभिन्न बीमारियों का कारण बन रहा है। इनकी मानें तो सप्ताह में 3 दिन निर्धारित समय अंतराल के आधार पर ऑनलाइन कक्षाओं को कुछ समय के लिए जारी रखा जा सकता है, लेकिन यह स्कूल का विकल्प नहीं। प्रदेश में 22 लाख सरकारी और 28 लाख बच्चे निजी स्कूलों में शिक्षा ले रहे हैं। इनमें 70 प्रतिशत मोबाइल पर ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं, जोकि घातक हो सकता है। छोटे व मझले दर्जे के स्कूलों के साथ सरकारी स्कूलों में भी ऑनलाइन क्लासेज शुरू कर दी है। शुरुआत में अच्छी पहल दिखी, लेकिन अब इसके नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।

आंखों पर दबाब नेत्र विशेषज्ञ डाक्टर शरद लखोटिया कहते हैं कि बच्चे गेम व सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए काफी समय कंप्यूटर या मोबाइल पर बिताते हैं। लेकिन ऑनलाइन क्लासेज के कंसेप्ट ने इनकी आंखों पर स्ट्रेस बढ़ा दिया है। इनसे ड्राई आई डिजीज बढ़ी हैं। आज 30 प्रतिशत आबादी डीईडी की किसी न किसी समस्या से जूझ रही है। इससे आंखों में पानी और जैल कम बनता है, यह भविष्य में अंधेपन का कारण भी बन सकता है।
चिड़चिड़े हो रहे मासूम ऑनलाइन क्लासेज में सोशल जैसा कुछ नहीं, बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ा है। साइक्लॉजिस्ट डाक्टर सारिका बूरा कहती हैं, ‘स्कूल में सोशल इंटरेक्शन होता है। ऑनलाइन में सिर्फ ऑन-स्क्रीन टाइम ही बढ़ा है। इससे शारीरिक व मानसिक विकास प्रभावित हुआ है। मेंटल स्ट्रेस और एंग्जाइटी बढ़ी है।’
पीरियड में गैप होना जरूरी बाल रोग विशेषज्ञ आशय शाह के अनुसार मोबाइल, लेपटॉप व कंप्यूटर से बच्चे उग्र भी हो रहे हैं। दूरगामी दुष्परिणामों को रोकने के लिए जरूरी है कि वैकल्पिक दिनों में 40-45 मिनट की क्लास के बाद कम से कम आधे घंटे का गैप हो। ऑन स्क्रीन रहने से बीमारियां भी सामने आ रही हैं।
अभिभावकों की सुनें गुरुग्राम की मीनाक्षी मल्होत्रा बताती हैं, ‘मेरी 9 साल बेटी की रोज 4-5 क्लासेज होती हैं। औसतन 4 घंटे से ज्यादा मोबाइल पर पढ़ाई। क्लास के बाद किसी न किसी बहाने से मोबाइल पर ही ज्यादा समय बिताने लगी है। अब तो बड़ों की बातों की अनदेखी शुरू कर दी हैं।’ उधर एक निजी स्कूल की शिक्षिका निकिता कहती हैं, ‘हर रोज औसतन 7 से 8 घंटे ऑनलाइन रहने के चलते पारिवारिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है।’

बचाव के उपाय

  • लुब्रीकेंट आई ड्राप डालें।
  • माइबूबियन ग्लैंड फंक्शनिंग के लिए आंखों की कसरत करें।
  • 45 मिनट से ज्यादा लगातार कंप्यूटर पर न बैठेंें।
  • शारीरिक गतिविधियां ज्यादा से ज्यादा करें।

रखें विशेष ध्यान

  • मोबाइल को लैपटॉप, डेस्कटॉप या एलईडी से कनेक्ट करके पढ़ेंं।
  • बीच-बीच में बच्चों को ब्रेक जरूर दिलाएं।
  • बच्चों के बैठने के तरीके पर नजर रखें।
  • चेक करें कि बच्चे गेम या चैट पर समय तो नहीं बिता रहे।
  • ऑनलाइन प्रश्न-उत्तर लिखवाकर करवाएं काम।

बच्चों को घर पर पढ़ाएं अभिभावक बाल संरक्षण आयोग की सदस्य डाक्टर प्रतिभा के अनुसार ऑनलाइन स्टडी लाभदायक है तो घातक भी है। ऑनलाइन पढ़ाई से अच्छा है बच्चे टीवी पर रामायण सहित अन्य धार्मिक कार्यक्रम देखें व अच्छी बातें सीखें। जरूरी नहीं कि हर घर में कई एंड्राइड फोन हों, नेटवर्क और डेटा का क्या? इसलिए अभिभावक बच्चों को खुद ही पढ़ाएं।
लैपटॉप, टैब बैंक बनाए सरकार सरकार को चाहिए कि वह लैपटॉप अैर टैब बैंक बनाए ताकि बच्चे इन पर पढ़ाई कर सकें। सरकारें एनजीओ और लोगों को अपील करें कि वे इस बैंक में अधिक से अधिक लेपटॉप और टैब डोनेट करें। हरियाणा में 50 लाख बच्चों में 10 से 15 प्रतिशत के पास ही लैपटॉप या डेस्कटॉप हैं। सरकार प्रति बच्चा 2 हजार स्कूल को दे तो उन्हें टैब दिये जा सकते हैं और उनकी सालाना फीस की भी दिक्कत नहीं होगी। -कुलभूषण शर्मा, प्रदेशाध्यक्ष, फेडरेशन आफ प्राइवेट स्कूल एसो. हरियाणा


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