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भारतीय पुनर्जागरण के जनक राजा राम मोहन राय

Posted On May - 22 - 2020

ज्ञाानेन्द्र रावत

अपने जीवन को मानव कल्याण हेतु समर्पित करने, सभी धर्मों के मध्य समन्वय स्थापित कर एक नये बुद्धिवादी संप्रदाय की स्थापना करने वाले महान समाज-सुधारक और भारतीय पुनर्जागरण के जनक थे राजा राम मोहन राय। परिस्थितियों ने उन्हंे बंगाल के पुनर्जागरण के अग्रणी नेता, अन्वेषक व मार्गदर्शक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के ग्राम राधानगर में 22 मई, सन‍् 1772 में एक संभ्रांत परिवार में हुआ था। इनके पिता रमाकांत राय और मां श्रीमती तारिणी देवी कट्टर हिंदू धर्मावलम्बी और परंपरावादी थे। राजा राम मोहन राय का जीवन संघर्षों की एक लम्बी शृंखला है। उन्हें अपने ही घर-परिवार में, तो कभी परंपरावादी-आडम्बर और मूर्ति-पूजकों के विरोध का सामना करना पड़ा। कभी पिता के आदेश से घर से बाहर निकलने का दंश झेलना पड़ा, तो कभी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। कभी अपने विचारों के कारण समाज, परिवार व आत्मीयजनों के आरोपों-लांछनों का सामना करना पड़ा। कभी तिब्बत में बौद्ध-पुरोहितों से मतभेदांे के चलते किसी तरह वे वहां से भागकर अपनी जान की रक्षा कर पाये।
दरअसल, उनके सम्पूर्ण जीवन को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला भाग जन्म से लेकर सन‍् 1800 तक यानी 28 वर्षों का है, जिसे बाल्यकाल व अध्ययन काल कह सकते हैं। लेकिन इस काल में ही जिन विचारों का इनके अंतस मंे विकास हुआ, उसका प्रभाव उनमें जीवनपर्यन्त बना रहा। सन‍् 1800 से 1812 तक का काल शासकीय सेवा व अंग्रेजी, ग्रीक, लैटिन और हिब्रू आदि भाषाओं के ज्ञान, पाश्चात्य दर्शन और विज्ञान के अध्ययन के लिए जाना जाता है। इन बारह वर्षों में 10 वर्ष इन्होंने रंगपुर कलक्टरी में नौकरी के रूप में बिताये और मात्र 40 वर्ष की अवस्था मेें धर्म और समाज की सेवा की खातिर इन्होंने रंगपुर कलक्टरी के दीवान पद से इस्तीफा दे दिया। जीवन के अंत के तीसरे भाग में यानी 1812 से 1833 तक के 21 वर्षों के शुरुआती 18 वर्ष कलकत्ता में एक कर्मयोगी के रूप में, जिसमें समाज सुधार व धर्म के कार्य में इन्होंने बिताये। अंत के तीन वर्ष इंग्लैंड, फ्रांस आदि यूरोप के अन्य देशों में बिताये। वहां भी उन्होंने अपने धार्मिक व दार्शनिक विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार ही नहीं किया, बल्कि उनकी महत्ता के बारे में व्याख्यान भी दिये। उन्हीं दिनों उनका स्वास्थ्य लगातार भाग-दौड़ के कारण गिरता चला गया और 27 सितम्बर, 1833 को ब्रिस्टल शहर में भारत का महान समाज सुधारक सदा-सदा के लिए सो गया।
राजा राममोहन राय की सती प्रथा, बहुपत्नी प्रथा के विरोधी, महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने, विधवाओं के पुनर्विवाह और अंतर्जातीय विवाह के प्रबल समर्थक के रूप में ख्याति है। उनका दृढ़ मत था कि बहुपत्नी प्रथा समाज विरोधी है और पति की मृत्यु उपरांत उसकी पत्नी को ही उसकी संपत्ति का उत्तराधिकारी माना जाना चाहिए। सती प्रथा के विरुद्ध विद्रोह की आग उनके अन्दर घर में ही पनपी। कारण बड़े भाई जगमोहन राय की मृत्यु के उपरांत लाख समझाने और विरोध के बावजूद उनकी पत्नी का सती होना इनके दुख का कारण बना। इन्होंने उसी समय इस कुप्रथा के अंत का दृढ़ संकल्प कर लिया। इनके इस निश्चय से पुरातनपंथी परिवार और कट्टरपंथी इनके प्रबल विरोधी हो गए और कट्टरपंथियों ने तो इनकी हत्या का भी प्रयास किया। लेकिन इन्होंने सती प्रथा के खिलाफ अपने आंदोलन को न केवल जारी रखा, वेद और उपनिषदों का हवाला देकर यह सिद्ध भी किया कि यह सामाजिक कुरीति, सामाजिक अंध-विश्वासों का परिणाम है। यही नहीं, ब्रिटिश सरकार को अपने तर्कों से समझाने का प्रयास किया कि इस कुरीति का बने रहना उनके आदर्शों के लिए एक कलंक है, तब कहीं जाकर गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक ने 1827 में इस प्रथा को गैर-कानूनी करार दिया। कट्टरपंथी फिर भी चुप नहीं बैठे और उन्होंने इसके खिलाफ प्रिवी कौंसिल में अपील कर दी। इसे चुनौती मान राम मोहन राय 1831 में इंग्लैंड गए और प्रवर समिति के समक्ष अपने तर्कों, उदाहरणों के माध्यम से इस अधिनियम का समर्थन कर अंततः इसे स्वीकार करने पर ब्रिटिश सरकार को उन्होंने विवश कर दिया।
उन्होंने प्राचीन हिन्दू विधि के अनेक उद्धरणों से महिलाओं को समान अधिकार दिये जाने सम्बंधी अपनी मांग को सिद्ध किया और यह भी कि समाज में प्रचलित ये परंपराएं निहित स्वार्थी तत्वों और धर्म की आढ़ लेकर अपनी तिजोरियां भरने में लगे मठाधीशों द्वारा थोपी गई हैं। उन्होंने 1822 में सभी धर्मों के मध्य समन्वय स्थापित कर एक नये बुद्धिवादी समाज ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की, जिसमें सभी धर्मावलम्बियों के प्रवेश की स्वतंत्रता थी। सबसे बड़ी बात इस समाज की यह थी कि इसमें सभी धर्मों के महान आदर्शों का समावेश था। उनकी मान्यता थी कि भारतीय ऐसी राजनीतिक चेतना से अभिभूत हों, समृद्ध हों, जिससे वे पश्चिमी संस्थाओं का अनुसरण करने में समर्थ हों। इसके लिए उन्होंने पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति, वैज्ञानिक ज्ञान से परिचित होने के लिए अंग्रेजी भाषा के ज्ञान व शिक्षा पर बल दिया। उनके संघर्ष के परिणाम स्वरूप ही विधवा विवाह आदि के अधिकार पाने में भारतीय नारी सफल हो सकी।


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