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बड़ा लेखक होने का सुख

Posted On May - 22 - 2020

तिरछी नज़र

अंशुमाली रस्तोगी

दरअसल, लेखन की लाइन में मैं लेखक बनने नहीं, ‘बड़ा लेखक’ बनने आया था। साहित्य और लेखन का मजा बड़ा लेखक बनने में ही है। लेखक बनकर आप सिर्फ मन को तसल्ली दे सकते हैं। समाज और लेखक बिरादरी में पूछता आपको कोई नहीं। ऐसे लेखन से भी क्या फायदा, जिसमें न पूछ हो न फेम।
बड़ा लेखक होना खुद में महानता का अहसास कराता है। हर कोई इज्जतभरी निगाह से देखता है। हर आयोजन की जान होता है बड़ा लेखक। वह कहीं कुछ भी लिख दे, तुरंत नोटिस लिया जाता है। उसके लिखे की विकट चर्चा होती है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक पर बहस होती है। अक्सर यह बहस राजनीतिक रूप भी धारण कर लेती है। बड़े लेखक के चेले उसे डिफेंड करने सामने आ जाते हैं। सरेआम चुनौती देते हुए पूछते हैं कि है कोई माई का लाल जो हमारे गुरु से भिड़े।
साहित्य में बड़े लेखक की इमेज ‘गब्बर सिंह’ से कमतर नहीं होती। मेरे मोहल्ले में जब कोई बच्चा रोता है तो उससे कह देता हूं, चुप हो जा बेटा नहीं तो फलां बड़ा लेखक आ जाएगा।
बड़े लेखक का जो भी, जैसा भी लिखा हो ‘पत्थर की लकीर’ होता है। फिर उसे आलोचक तो क्या पाठक भी नहीं काट सकता। पुरस्कार या सम्मान की गरिमा तब तक बनी नहीं रह सकती, जब वह किसी बड़े लेखक को नहीं मिल जाता। बड़े लेखक की आस्था हर छोटे-बड़े पुरस्कार में होती है। और पुरस्कार भी खुद सम्मानित होने के लिए बड़े लेखक के दर पर नाक रगड़ते हैं।
लेखक होने के लिए फिर भी संघर्ष की जरूरत होती है किंतु बड़ा लेखक होने के लिए संघर्ष नहीं करना होता। चापलूसगीरी किसी को भी बड़ा लेखक बना सकती है। महत्व यह नहीं रखता कि उसने अब तक बड़ा क्या लिखा, महत्व यह रखता है कि उसके कहां कितने चेले हैं, किन-किन साहित्यिक जगहों पर उसकी कितनी पैठ है, दादागीरी कहां-कहां चलती है। नेताओं से संबंध कैसे हैं।
खैर, चिंता मत कीजिए एक दिन मैं भी बड़ा लेखक बनकर दिखाऊंगा। लेखन के मैदान में अपनी धाक जमाऊंगा। बड़ा लेखक होने का सुख एक दिन पाकर ही रहूंगा।


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