8 जून को आएगा सैकेंडरी का रिजल्ट !    गेहूं उठाने में देरी करने वाले ट्रांसपोर्ट ठेकेदार होंगे ब्लैकलिस्ट !    हर पंचायत को मिलेगी फॉगिंग मशीन !    1983 पीटीआई हटाने के मामले में हाईकोर्ट ने दिया स्टे !    सनवीर सोंधी बने एनआरएआई के प्रमुख !    परीक्षा, दाखिलों के लिये तैयार रहें सभी विभाग : कुलपति !    राज्यपाल ने किया पौधरोपण !    महिला को शराब पिलाकर जघन्य सामूहिक बलात्कार !    जीएसटी परिषद की बैठक 12 को !    अध्यापिका के 25 स्कूलों में काम करने की पुष्टि नहीं !    

बीमारी और लाचारी की दोहरी मार

Posted On May - 21 - 2020

बदहाल कोरोना काल

लक्ष्मीकांता चावला

देश कोरोना महामारी से पूरी शक्ति और साधनों सहित संघर्ष कर रहा है। कभी-कभी लगता है कि हम कामयाब हो रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली जैसे कुछ प्रांतों की बढ़ती रोगियों और मृतकों की संख्या निराश भी कर देती है। अभी भी हम दुनिया के मुकाबले कोरोना को टक्कर देने में ज्यादा कामयाब हैं। चिकित्साविदों की भविष्यवाणी डराने वाली है कि जून-जुलाई में यह बीमारी बढ़ेगी। अब देश के सामने उनका संकट भी है जो रोजी-रोटी कमाने के लिए अपने घर-गांव से दूर वर्षों पहले दूसरे प्रांतों में चले गए। अब जब लाॅकडाउन हुआ और काम-धंधे बंद हो गए तो जो थोड़ी-बहुत जमापूंजी थी, उसे समाप्त करने के बाद इन श्रमिकों का धैर्य भी समाप्त हो रहा है, समाप्त हो गया है। यह भी सच है कि हर प्रांत में लाखों प्रवासी श्रमिक हैं। उनमें से कुछ तो घर-परिवार बसाकर वहां के ही हो गए जहां रोटी कमाने आए थे, पर बहुत बड़ी संख्या उनकी है जो इतना ही कमा पाते थे, जिससे हर रोज कमाना और खाना हो पाता।
हमारे विश्व के पांच बड़े समृद्ध देशों में शामिल होने के दावों के बीच जब पूरे हिंदुस्तान से लाखों लोगों को सड़कों पर देखते हैं, विसंगतियां नजर आती हैं। यद्यपि सरकार ने उन्हें घर भेजने के लिए बहुत-सी रेलगाड़ियां चलाईं, पर यह प्रबंध करने में सरकारों ने देर कर दी। जब धैर्य का संयम टूटा तो यह बेचारे बाल-बच्चे, परिवार लेकर पैदल ही चल पड़े।
शहरों में रोटी कमाने के लिए आए इन श्रमिकों को भी जब शहर की अर्थव्यवस्था ने रोटी-रोजी देने से इनकार कर दिया तो ये घर-गांव की ओर चल पड़े। पैदल चले जा रहे हैं, साइकिलों पर भी चल रहे हैं, सिर पर गठरी और बगल में बच्चा लिये महिलाएं भी आगे बढ़ रही हैं। बहुत से ऐसे हैं, जिनके पांवों में चप्पल भी नहीं और जब उन्हें रास्ते में रोक कर पुलिस डंडों से वापस भेजती है तो वे खेतों की तरफ भागते हैं। इस दौड़ में जो बचा-खुचा सामान है वह भी सड़क पर ही गिर जाता है। न जाने वे लोग कितने थके, टूटे होंगे जो रेल की पटरी पर ही सो गए और फिर हमेशा के लिए सो गए। कोई ट्रक दुर्घटना में मारे गए और किसी की बस पलट गई।
फिर पंत जी याद आते हैं जिन्होंने लिखा था—कुछ श्रमजीवी धर डगमग पग थे नाप रहे निज घर का मग। आज की स्थिति इससे भी विकट है। वे तो मेहनत करने के बाद थके-हारे घर जाते थे, जिन्हें पंत जी ने देखा था, पर ये बेचारे तो सरकारी साधनों से निराश होकर, भूख और बेकारी से तंग होकर घरों की ओर चले। गांव में रोटी मिल जाएगी, ऐसा उनका विश्वास है। बैलगाड़ी में बैल बना इनसान का बेटे और बेटी तो आप सबने देखे ही होंगे। महाराष्ट्र से राजस्थान की ओर चले बैलगाड़ी सवार तीन लोगों के परिवार का जब एक बैल रास्ते में मर गया तो यह देखा गया कि उन तीनों में से बारी-बारी मां-बेटा और पिता बैल बनकर दौड़ते रहे। कितनी विवशता, कितनी मजबूरी। कोल्हू के आगे बैल बनाकर तो काले पानी की जेलों में अंग्रेज दौड़ाते थे, यह आजाद भारत का शायद सबसे दर्दनाक और सच्चाई दिखाने वाला चित्र है।
सभी जानते हैं कि लाखों लोगों को उनके घर तक पहुंचाना सहज नहीं। खासकर उस स्थिति में जब कोरोना के कीटाणु का भी साथ जाने का खतरा हो। अब तो अच्छा हो गया सभी सरकारें अपने प्रदेशों से दूसरे प्रदेशों में गए श्रमिकों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, पर बहुत अच्छा होता जो आज किया है वह लॉकडाउन के साथ ही कर लेते। बहुत दिन पहले से यह कहा जा रहा है कि आज भी भारत में दो वर्ग हैं, एक इंडियन और एक भारतीय। जो इंडियन हैं उनका देश के सारे संसाधनों पर अधिकार हो चुका है। हमारे जनप्रतिनिधि इन संसाधनों का एकछत्र दुरुपयोग या उपयोग कर रहे हैं। देश का आम हिंदुस्तानी नागरिक अपने रोगी को लेकर किसी सरकारी अस्पताल की दहलीज पर पहुंचता है, जो कुछ मिलता है उसे ही लेकर वह अपने भाग्य को स्वीकार कर लेता है। बच्चों को शिक्षा भी नहीं दे पाता। दूसरा सत्ता से जुड़ा वर्ग ऐसा है जो सरकारी धन से देश-विदेश में मुफ्त इलाज करवाते हैं। धन तो जनता का है, पर जनता का धन जनता के लिए नहीं, जन-प्रतिनिधियों के लिए हो गया।
जनता को भरोसा दिया जाता है कि न्यूनतम वेतन सीमा तय कर दी गई। जो भाग्यशालियों को मिलता है, वह न्यूनतम वेतन भी इतना नहीं कि जिससे परिवार को भोजन, शिक्षा और जीवन की मूल आवश्यकताएं पूरी हो जाएं। अधिकतर तो वे बेचारे हैं जो चमकते होटलों, ऊंचे-ऊंचे अस्पतालों, बड़े-बड़े व्यापारिक संस्थानों में पीले चेहरे, पिचके पेट लिए बहुत कम वेतन पर काम करते हैं।
अब भी पूरा सप्ताह हम सुनते रहे कि भारत सरकार ने बीस लाख करोड़ का पैकेज दिया। मुफ्त राशन और मनरेगा को छोड़कर सीधे-सीधे जनता की मदद करने वाली कोई और घोषणा समझ नहीं आई। उन बेचारों के लिए कुछ नहीं जो सरकार की किसी योजना में गरीब नहीं माने जाते, पर बहुत गरीब हैं। सरकारी राशन मुफ्त न सही, नियंत्रित मूल्य पर भी उन्हें नहीं मिलता। जहां नौकरी करते हैं वहां न्यूनतम वेतन के दर्शन उन्होंने कभी नहीं किए।
सरकार कोई ऐसी योजनाएं बनाए, जिसमें कारखाने भी चलें, औद्योगिक, व्यापारी कार्य भी आगे बढ़े। देश रक्षा हित संसाधन भी खूब बनाए, जुटाए पर उन बेचारों को भी अनदेखा न किया जाए जो मजदूर, प्राइवेट कर्मचारी, छोटे दुकानदार, रेहड़ी, फड़ी, छाबड़ी वाले, रिक्शा और ऑटो चलाने वाले हैं। लॉकडाउन के दिनों में देश के अनेक भागों में इन लोगों ने ही पुलिस के डंडे सबसे ज्यादा खाए हैं। याद रखना होगा भूखे पेट कुछ भी कर सकते हैं, पुलिस के खिलाफ आक्रोश उसी भूख की एक छोटी-सी प्रतिक्रिया है। देश को विकास करना ही चाहिए, लेकिन विकास का अर्थ यही है कि देश का हर व्यक्ति इस योग्य हो जाए कि अगर कोई लॉकडाउन लग भी जाए तो उसके पास कम से कम चार सप्ताह तक तो गुजारा करने के साधन बचे रहें।


Comments Off on बीमारी और लाचारी की दोहरी मार
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.