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बाल कविता

Posted On May - 9 - 2020

तरबूज़
गर्मियों का है ये राजा
खोले ठंडक का दरवाज़ा
बच्चे बूढ़े शौक से खाएं
तन-मन कर दे तरोताज़ा
ग्लूकोज़ की मात्रा प्रचुर
ये लाये चेहरे पर नूर
अंदर लाल बाहर हरा
बीमारी को करता दूर
पानी की कमी ना आए
भूख प्यास तृप्त हो जाए
इसे देख कर जी ललचाए
बड़े काम बीज इसके आए
गोल मटोल इसका रूप
मिश्री सा मीठा लगता खूब
यह पहेली नहीं अबूझ
उत्तर इसका है तरबूज

-पुखराज सोलंकी

आजकल
स्कूल में लगा है ताला,
घर में हो पढ़ाई।
भाई बहन हम मिलकर रहें,
करते नहीं लडाई।
मोटू पतलू और छोटा भीम,
देख मन बहलाते।
मम्मी न रिमोट छीनते,
पापा न चिल्लाते।
घर में अब जो भी पकता,
हाथ धो कर ही खायें।
खाते वक्त न बातें करते,
अच्छे बच्चे कहलायें।
पापा हमारे संग समय बिताते,
अच्छी बातें समझाते।
कभी कोई किस्सा सुना कर,
हमको खूब हंसाते।
हरिन्दर सिंह गोगना


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