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बनी रहे यह मोहक तस्वीर

Posted On May - 24 - 2020

सर्वेश तिवारी
लॉकडाउन के दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ। जिसमें दो नदियों के संगम को साफ़ देखा जा सकता है। ये नदियां हैं अलकनंदा और भागीरथी जो उत्तराखंड के रूद्र प्रयाग में मिलती हैं। इतना साफ़ दशकों बाद लोगों ने इन्हें देखा है। दिल्ली की यमुना, लखनऊ में गोमती और बनारस में गंगा भी इन दिनों अपने वास्तविक रूप में अवतरित नजर आ रही हैं। ये सब कुछ कैसे मुमकिन हुआ? किसी सरकार के करोड़ों के बजट खर्च करने से नहीं, बल्कि इंसानों के सिर्फ इनसे दूर होने मात्र से ये चमत्कार हो सका है। वायरल वीडियो हकीकत है। आज कई जगहों से यह सुखद सूचना आई है कि हर तरह के प्रदूषण में कमी आई है। लॉकडाउन से जल्दी हम विकास पथ पर आगे बढ़ें, लेकिन साथ ही ध्यान रखें अपने पर्यावरण का। यह सही मौका है समझने का। मौजूदा हालात में जरूरी है कि हम ‘नीड बेस्ड’ इकोनॉमी पर चले, ‘ग्रीड बेस्ड’ पर नहीं। मतलब ये है कि हमें गावों की तरफ और ध्यान देना होगा। कई लोग कहते हैं कि गांवों में पर्यावरण की रक्षा की दिशा में कुछ नहीं हो रहा है। हकीकत को यह है कि प्रकृति का महत्व जितना ग्रामीणों को मालूम है और जो श्रम उसके लिए वे करते हैं, उतना कोई और नहीं। जरूरत है इस बात की कि हम अंधाधुंध शहरीकरण के दौर से खुद को उबारते हुए पर्यावरण पर ध्यान दें। कौन नहीं जानता कि कई नदियां या उनकी सहायक नदियों का हाल नालों जैसा हो गया था। जैसे कि सहारनपुर से दिल्ली की यमुना में मिलने वाली हिंडन।

ग़ाज़ियाबाद और दिल्ली के बीच की कई पीढ़ियां इसी के किनारे पली बढ़ीं, लेकिन इसकी महत्ता गंगा और यमुना की तरह नहीं बल्कि पूजा सामग्री के विसर्जन या अंतिम संस्कार तक ही है। आज भले ही कई नदियों का जल साफ हो गया हो, और हवा में भी जहरीले तत्व कम हों, लेकिन हमें तलाशना होगा उन कारणों को जिनकी वहज से वातावरण दमघोटू बनता चला गया। विकास के पहिये को खूब घूमना चाहिए, लेकिन उसे विनाश की ओर नहीं ले जाना चाहिए। देश में जल प्रदूषण का बड़ा कारण शहरीकरण और उसकी अनियंत्रित दर है। पिछले एक दशक में शहरीकरण की दर तेजी से बढ़ी है। इसकी वजह से लंबी अवधि के लिए कई पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो गई हैं। इनमें जल आपूर्ति की कमी, पानी के प्रदूषित होने और उसके संग्रहण जैसे पहलू मुख्य हैं। इस संबंध में प्रदूषित पानी का निपटान और ट्रीटमेंट एक बड़ा मुद्दा है। शहरी इलाकों में नदियों, तालाबों, नहरों, कुओं और झीलों के पानी का इस्तेमाल घरेलू और औद्योगिक जरूरतों लिए होता है। हमारे घरेलू इस्तेमाल का 80 प्रतिशत पानी खराब हो जाता है। ज्यादातर मामलों में पानी का ट्रीटमेंट अच्छे से नहीं होता और इस तरह जमीन की सतह पर बहने वाले अच्छे पानी को प्रदूषित करता है। यह प्रदूषित जल सतह से गुजरकर भूजल में भी जहर घोल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक एक लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में 16,662 मिलियन लीटर खराब पानी एक दिन में निकलता है। गंगा नदी के किनारों पर बसे शहरों और कस्बों में देश का करीब 33 प्रतिशत खराब पानी पैदा होता है। वैदिक ऋषियों का भी मत था कि जहां धरती और जल का महत्व है उस राष्ट्र की खुशहाली कम नहीं होती। यजुर्वेद ही नहीं अर्थर्ववेद में भी इसकी महत्ता देखने को मिलती है।


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