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परवरिश के अंधेरे

Posted On May - 31 - 2020

संजय वर्मा

तकनीक किस तरह समाजों को रच रही है और उसमें नए अंधेरे-उजाले भर रही है- कोरोना संक्रमण से पैदा हुए संकट ने इसे नए सिरे से पारिभाषित किया है। एक कामकाजी समाज के तौर पर देखें तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि अगर इंटरनेट जैसा आविष्कार नहीं हुआ होता तो मुमकिन था कि कोरोना से आधी दुनिया साफ हो जाती और हमें इसकी भनक भी न पड़ती। यह तकनीक ही है कि जिसने बेहद लंबे खिंच रहे लॉकडाउन में भी दुनिया की चाल को किसी न किसी तरह से बनाए रखा है। पर कुछ अंधेरे भी इधर एक बार फिर उजागर हुए हैं। इन्हें देखकर लगता है कि निजता के नाम पर डिजिटल स्पेस में जो कुछ हो रहा है और वहां खास तौर से बच्चे और किशोर जिस किस्म की ताकझांक कर रहे हैं वह अंततः एक मानसिक रूप से बीमार समाज को ही हमारे सामने प्रस्तुत करती है। ज्यादा बड़ी उलझन बच्चों को मिल रही परवरिश को लेकर है, जो लगता है कि हमारे एजेंडे से पूरी तरह गायब ही है।
सोशल मीडिया कितना ज़िम्मेदार
मामला देश की राजधानी दिल्ली में बॉयज़ लॉकर रूम के रूप में सोशल मीडिया पर की गई चैटिंग और शेयरिंग से जुड़ा है। करीब दो दर्जन किशोर लड़कों (जिसमें बाद में एक लड़की के भी शामिल होने का पता चला) ने सोशल मीडिया के एक मंच- इंस्टाग्राम पर सहपाठी लड़कियों के फोटो आपस में साझा किए, उन पर भद्दे कमेंट्स किए और उनमें से कुछ को बुलाकर उनका गैंगरेप करने की बातें कहीं। सोशल मीडिया पर शेयर होने वाली दूसरी हज़ारों-लाखों चैटिंग की तरह गुपचुप तौर पर हो रही इस बातचीत और लड़कियों की न्यूड्स फोटोज़ पर की गई अश्लील कमेंटबाजी शायद उस समूह में शामिल होने वालों तक सीमित रह जाती। पर एक सहपाठी लड़की के दोस्त की कोशिशों से इस बदतमीज़ी की शिकार पर भीतर से डरी हुई लड़कियां मामला पुलिस तक ले जाने के लिये किसी तरह सहमत हो गईं, जिससे इस ग्रुप का भंडाफोड़ हुआ और पुलिस हरकत में आई।
हालांकि यह दावा नहीं किया जा सकता कि इसके बाद भी सोशल मीडिया पर ऐसी वारदातों में कोई कमी आएगी या जवानी की ओर बढ़ते किशोरों को पूरी तरह इंटरनेट के ऐसे अंधेरों से बचाकर रखा जा सकेगा। समाजशास्त्री खुद इसके पक्षधर नहीं हैं कि कोई एक वारदात होने पर बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जाएं। इसके उलट उनकी राय है कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल सीमित करने या चौबीसों घंटे निगरानी रखने से उन्हें सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाना मुमकिन नहीं है। उल्टे यह हो सकता है कि पाबंदी लगाने पर बच्चों में डिजिटल स्किल का अभाव हो जाए और वे भावनात्मक रूप से असंवेदनशील हो जाएं। इससे उनके अंदर ऑनलाइन आने वाली मुश्किलों या कहिए कि ऑनलाइन जोखिम से निपटने की क्षमता कम हो जाती है।
बढ़ रही यौन दुर्व्यवहार की घटनायें
हालांकि जिस तरह से दुनिया भर में लड़कियों-महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार और रेप जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं, उनमें से ज्यादातर में यह तथ्य उजागर हुआ है कि ऐसे बर्ताव के बहुतेरे उकसावे इंटरनेट से मिले थे। स्कूल-कॉलेजों तक में कराए गए सर्वेक्षणों में पता चला है कि अगर युवा इंटरनेट पर पोर्न देखने के आदी हैं तो इसकी आशंका काफी ज्यादा रहती है कि वे अवसर मिलने पर कोई यौन दुर्व्यवहार कर बैठें।
ज्यादातर सर्वे बताते हैं कि पोर्न देखने और सोशल मीडिया पर अश्लील बातचीत में शामिल रहने वाले समूह के दो तिहाई सदस्यों के मन में रेप करने की इच्छा जागृत हो उठती है। सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, समूचे इंटरनेट के बारे में यह शिकायत तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं हैं कि वहां से होकर गुजरने वाले हर शख्स का सामना तकरीबन हर रोज़ ऐसी सामग्री से होता है जिन्हें देखने-सुनने की ताब और उसे देखकर भी अनदेखा करने की समझ अक्सर कम ही होती है। बच्चों के मामले में ऐसी सामग्री और भी खतरनाक क्यों हो जाती है, इसके दो-तीन अहम कारण हैं। बच्चों में गोपनीय समझी जाने वाली चीजों को जानने की तीव्र ललक होती है और दूसरे, परिवारों के अलावा स्कूलों में भी खास तौर से सेक्स एजुकेशन की सही समझ देने की ज़रूरत नहीं समझी जाती।
इन बुनियादी बातों से ज्यादा बड़ी वजह वह है, जिस पर बॉयज़ लॉकर रूम प्रकरण के प्रसंग में हमारी नज़र जानी चाहिए।
सामाजिक परिवेश का असर
आज के बच्चे जिस सामाजिक परिवेश से होकर गुज़र रहे हैं, उसमें वे देख पा रहे हैं कि हमारी सोसायटी में महिलाएं सिर्फ भोगवादी वस्तु के रूप में पेश की जाती हैं। परिवारों के भीतर महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है। उन्हें बात-बात पर गालियां दी जाती हैं। जिन परिवारों में शराबखोरी का ज्यादा चलन है, वहां स्थितियां और भी खराब हैं। महिलाओं को लेकर अश्लील चुटकुले कहना, उन पर फब्तियां कसना और कुछ नहीं तो दूसरों के संदर्भ में दी जाने वाली गालियों में ज्यादातर का मां-बहन को संबोधित होना बच्चों को ऐसी प्रेरणा देता है कि लड़कियां-महिलाएं समाज की दोयम दर्जे की नागरिक हैं। इस मोर्चे पर आकर परवरिश का सवाल एक जटिल गुत्थी बन जाता है। हम बच्चों को कथित तौर पर अच्छी शिक्षा दिलाएं, आज के दौर के मुताबिक उनकी हर ज़रूरत और इच्छा का ख्याल रखें तो सिर्फ इतने भर से पैरेंटिंग के दायित्व पूरे नहीं हो जाते। बल्कि इसका दायरा अब काफी बढ़ गया है। इसमें हमें दोहरे चरित्र वाली तकनीक से पैदा हुई चुनौतियों से भी निपटना है और बच्चों को पीयर प्रेशर (यानी अपने साथियों के बीच गलत बातों का साथ देकर मिलने वाली संतुष्टि के भाव) से कैसे निपटा जाए- इसकी समझ भी देनी है। इसकी शुरुआत अभिभावक के रूप में परिवारों के भीतर दर्शाए जाने वाले हमारे व्यवहार से होती है।
महिलाओं का सम्मान करना सिखाना
जिन परिवारों में महिलाओं को इज्जत नहीं दी जाती, घर-बाहर की स्त्रियों को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां या गाली-गलौज की जाती हैं, उन परिवारों के बच्चों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे सोशल मीडिया या दोस्तों के दबाव में आकर भी गलत का पक्ष नहीं लेंगे और सही का साथ देंगे। चूंकि ज्यादातर अभिभावक इस किस्म की परोक्ष परवरिश और उसके कायदों को भूल गए हैं, लिहाजा उनके बच्चे ऐसी स्थितियों में सहपाठी लड़कियों की बॉडी पर भी भद्दे कमेंट करने से खुद को रोक नहीं पाते हैं और रेप तक करने में सहमति जता बैठते हैं।
बच्चों पर हो नज़र
परवरिश का एक अन्य मोर्चा तकनीक के दोहरे चरित्र के कारण खुला है। जो इंटरनेट और सोशल मीडिया अभिभावकों को हासिल है, वही इंटरनेट बच्चों की पहुंच में भी है।
कोरोना काल में ऑनलाइन कक्षाओं की जरूरत के चलते बेहद छोटे बच्चों तक को इस इंटरनेट से जोड़ा गया है। पर कैसे एक जरूरत कुछ मौकों पर खलनायक बन जाती है, दिल्ली का ताजा बॉयज़ लॉकर रूम जैसा प्रकरण यह साबित कर रहा है। एक वयस्क के तौर पर हम भले ही इंटरनेट के भले-बुरे को लेकर जागरूक हों, लेकिन यदि अभिभावक के तौर यदि यह इस जागरूकता को बच्चों तक पहुंचाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं और खुद उनके बड़े होने पर सही-गलत का अंदाजा लगने का इंतजार करते हैं, तो यह अनदेखी घातक है। पढ़ाई और अन्य जरूरतों के मद्देनजर बच्चों को इंटरनेट से लैस करना आज की जरूरत है, लेकिन निजता के नाम पर बच्चों को डिजिटल स्पेस की एकदम खुली छूट उन्हें इस बारे में जागरूक किए बगैर देना बेहद खतरनाक है। हम भले ही तमाम फिल्टरों की बात करें, लेकिन सच्चाई है कि डिजिटल दुनिया यह नहीं देख पाती है कि उसे बरतने वाले की उम्र और समझ का स्तर क्या है। इस समझ को विकसित करने का काम अभिभावकों का है। ऐसे में यदि आगे भी लॉकर रूम जैसे मामले सामने आते हैं, तो स्पष्ट है कि अभिभावक डिजिटल परवरिश की ज़रूरत और उसके अर्थ को खुद नहीं समझ पा रहे हैं। अगर बच्चों को खास तौर से यौन अपराधी बनने से बचाना है, तो जरूरी है कि बच्चों से पहले खुद अभिभावकों को और हमारे समाज को नए जमाने की परवरिश को समझना होगा।
डिजिटल संसार की संवेदनशीलता
यह जानने के लिए किसी अध्ययन और सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है कि डिजिटल दुनिया में स्त्रियां सबसे ज्यादा प्रताड़ित हैं। वहां उनके पहनावे, लुक्स, खानपान, टीका-टिप्पणी करने पर ही डिजिटल शोहदों की बदतमीजी नहीं सहनी पड़ती है, बल्कि उन्हें यौन-प्रताड़ित भी किया जाता है। उनके शरीर की ताकझांक होती है, तकनीक का सहारा लेकर उनके बदन को उघाड़ा जाता है। विकसित देशों तक में शॉपिंग मॉल्स और सार्वजनिक शौचालयों में बेहद आधुनिक सूक्ष्म डिजिटल कैमरों से लड़कियों के वीडियो चोरी-छिपे बनाए जाते हैं और उन्हें पोर्न साइटों पर डालकर पैसे कमाए जाते हैं। दक्षिण कोरिया में ‘हा येना’ नाम से ‘डिजिटल सेक्स क्राइम आउट’ अभियान छेड़ा जा चुका है (वर्ष 2015 में), जिसका उद्देश्य यह बताना था कि किस तरह महिलाओं को हमारा समाज हर कदम पर बेइज्जत कर रहा है। ठहरकर सोचें कि आखिर लड़कियों-महिलाओं को लेकर अश्लील ऑनलाइन चैटिंग और सार्वजनिक जगहों पर उनके खुफिया वीडियो बनाने वाली मानसिकता की पैदावार की जड़ें कहां हैं। जवाब आसान है- यह सब कुछ हमारे परिवारों के भीतर तब शुरू होता है, जब अभिभावक अपने बच्चों को जेंडर सेंसिटाइजेशन (महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता) के नाम पर कुछ नहीं सिखाते हैं। सरकारें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाएं तो ले आती हैं, लेकिन जब बेटियां पढ़-लिखकर कामकाजी समाज में आगे आती हैं, उन्हें दूसरे तरीकों के साथ डिजिटल प्रताड़ना भी सहनी पड़ती है। इन हालात में थोड़ा-बहुत सुधार मुमकिन है, लेकिन इसके लिए स्कूलों के साथ-साथ परिवार के भीतर भी जेंडर सेंसिटाइजेशन का काम चलना चाहिए। स्कूलों के सिलेबस में ऐसे बदलाव किए जाएं, ताकि बच्चे महिलाओं के मुद्दों और उनकी समस्याओं के प्रति जागरूक हो सकें। प्राइमरी स्तर पर को-एजुकेशन सिस्टम लागू करने से भी स्थितियों में थोड़ी तबदीली मुमकिन है। असल में, यह समझने वाली बात है कि पिछले दशकों में लड़कियों को बड़ा करते वक्त जो पाठ पढ़ाए जाते हैं उनमें तो कई बदलाव हुए हैं, उन्हें मर्दों की तरह मुश्किल नौकरियों में आगे आने को प्रेरित किया गया है, लेकिन लेकिन लड़कों के पाठ वही रहे। उन्हें यह नहीं समझाया गया कि अगर क्लास में लड़कियां साथ में पढ़ती हैं, दफ्तरों में महिला सहकर्मी हैं, तो उनके साथ सलीके से कैसे पेश आया जाता है और कैसे इस बारे में दायरे कायम किए जाते हैं। खास तौर से डिजिटल दुनिया में महिलाओं के साथ जो कुछ हो रहा है, उस बारे में शिक्षण और ट्रेनिंग का घोर अभाव ही है।


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