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जीवन बीमा सही जानकारी देकर पाएं लाभ

Posted On May - 3 - 2020

पुष्पा गिरिमाजी

आपको पता होना चाहिए कि बीमा का अनुबंध पूरे विश्वास पर आधारित है और उपभोक्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पॉलिसी खरीदते वक्त आवेदन पत्र में अपने स्वास्थ्य से संबंधित सभी तथ्यों का खुलासा करे और सभी प्रश्नों का उत्तर सच्चाई और ईमानदारी से दे। ऐसा करने में विफल रहने पर बीमा कंपनी दावेदार को पॉलिसी के लाभों से वंचित कर सकती है।
हालांकि, बीमा अधिनियम के तहत बीमा कंपनी को यह सिद्ध करना होता है कि (ए) पॉलिसी धारक ने अपनी जानकारी में होने के बावजूद या जानबूझकर ऐसी सूचना छिपाई जिसका उसे पता था और (बी) ऐसी जानकारी नीति के लिए महत्वपूर्ण थी और बीमाकर्ता द्वारा किए गए जोखिम पर इसका सीधा असर था।
बीमा अधिनियम भी बीमा कंपनियों को तथ्यों से संबंधित किसी भी नीति पर सवाल उठाने के लिए तीन साल देता है। पॉलिसी की तारीख से तीन साल पूरे होने या जोखिम की शुरुआत के बाद, बीमा कंपनी भौतिक तथ्यों में कमी के आधार पर दावे को अस्वीकार नहीं कर सकती है। आपकी मित्र के मामले में, जो आपने कहा है कि पॉलिसी सिर्फ दो साल पुरानी है, लाभ यहां नहीं मिल सकेंगे।
यदि आपकी दोस्त के पति को पॉलिसी खरीदने के समय पहले से मौजूद बीमारी के बारे में पता नहीं था या मौजूदा बीमारी का पता नहीं चला या जांच नहीं हो पाई तो वह उपभोक्ता अदालत के हस्तक्षेप के माध्यम से बीमित राशि प्राप्त कर सकती हैं।
मेरी मित्र के अनुसार, उनके पति को स्वास्थ्य के मुद्दे के बारे में पता था और यहां तक कि उन्होंने इस बारे में फॉर्म भरने वाले एजेंट को भी सूचित किया। हालांकि, उन्होंने यह नहीं जांचा था कि क्या जानकारी भरी गई थी और बस डॉटेड लाइन पर हस्ताक्षर कर दिए गए थे। क्या इससे बचाव की एक रेखा निकलेगी?
दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सकता। पॉलिसी धारक से उम्मीद की जाती है कि फॉर्म खुद ही भरे, यहां तक कि अगर उसे कोई और भरता है तो हस्ताक्षर करने से पहले उसे ध्यान से पढ़ना चाहिए (ऐसे मामलों को छोड़कर, जहां पॉलिसी खरीदने वाला अनपढ़ हो)। असल में एक मामले, जो कम-ज्यादा आपके केस से मिलता जुलता है, में शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने हाल ही में बीमा कंपनी द्वारा तथ्यों के आधार पर दावे को खारिज किए जाने को सही ठहराया। इस मामले में भी विवादास्पद पॉलिसी दो साल पुरानी थी (रीना कर्माकर बनाम एलआईसी ऑफ इंडिया 2018 के आरपी नंबर 3301 आदेश 4 फरवरी 2020 को)।
ऐसा करते वक्त राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के दो आदेशों का संदर्भ दिया : उनमें से एक था रिलाइंस लाइफ इंश्योरेंस बनाम रेखाबेन नरेशभाई राठौड़, जहां कोर्ट ने कहा, ‘हम प्रस्तुतकर्ता के इस बात से प्रभावित नहीं हैं कि तीसरे पक्ष द्वारा फॉर्म में भरी गई सामग्री से वह अनभिज्ञ थे और जिन चीजों का भरा जाना आवश्यक था, उसके प्रति उन्हें जानकारी नहीं थी। प्रस्तावक ने प्रस्ताव फॉर्म में अपने हस्ताक्षर को विधिवत रूप से जोड़ा और बीमा कवर का प्रस्ताव उस प्रस्ताव में दिए गए बयानों के आधार पर था … ’
आयोग ने यहां भारतीय जीवन बीमा निगम बनाम मनीष गुप्ता (2019 के सीए नंबर 3944 जिसका फैसला 15-4-2019 को हुआ) का भी उद्धरण दिया जहां सुप्रीम कोर्ट ने सतवंत कौर संधु बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड में दिए अपने फैसले को याद करते हुए कहा, ‘… इस तरह, इस बात पर बहुत कम जोर दिया जाता है कि जब प्रस्ताव फॉर्म में किसी विशिष्ट पहलू की जानकारी मांगी जाती है, तो एक आश्वासन एक दायित्व के तहत होता है कि वह उस विषय पर जानकारी का अपने ज्ञान के अनुसार सही और पूर्ण प्रकटीकरण कर सके। यह बात प्रस्तावक के निर्धारण के लिए नहीं है कि संबंधित उद्देश्य के लिए मांगी गई सामग्री पॉलिसी के लिए है या नहीं। बेशक चीजों का खुलासा करने की बाध्यता केवल उन तथ्यों तक है जो आवेदक को ज्ञात हैं और न कि वह जो उसे पता होनी चाहिए। चीजों के खुलासे का दायित्व आवश्यक रूप से उसके ज्ञान के आधार पर होता है। उस ज्ञान के बारे में उनकी राय का कोई महत्व नहीं।’
इसलिए आपकी मित्र के सामने लड़ाई कठिन है।


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