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कोरोना का इलाज : प्लाज़्मा थैरेपी या हर्ड इम्युनिटी

Posted On May - 3 - 2020

अभिषेक कुमार सिंह

मानव सभ्यता को जिन चुनौतियों से सबसे ज्यादा जूझना पड़ता है, वे आपदाएं ही होती हैं। इन आपदाओं में से कुछ के बारे में दावा है कि उन्हें खुद इंसानों ने रचा है। जैसे कि ग्लोबल वॉर्मिंग से पैदा होने वाला जलवायु परिवर्तन। पर कई आपदाएं ऐसी हैं जो खुद कायनात ने रची हैं और उनके ज़रिए प्रकृति हमारा इम्तिहान लेती है। यह आज़माती है कि आखिर हम इन चुनौतियों से पार पाने के लिए कितने तैयार हैं। इस वक्त कोविड-19 यानी नोवेल कोरोना वायरस से पैदा महामारी ऐसी ही परीक्षा है, जिसे हल करना शायद बीती सदियों के मुकाबले सबसे ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। हालांकि अभी तक कोरोना के मामले में हम सिर्फ अंधेरे में हाथ-पांव मार रहे हैं, वैक्सीन बनने के इंतज़ार में मलेरियारोधी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन जैसी दवाओं को आज़मा रहे हैं पर कुछ बातों ने इसे लेकर उम्मीद की रोशनी जगा दी है। ऐसे दो उपायों की इधर चर्चा है, जिनके बारे में दावा किया जा रहा है कि अगर इन्हें सावधानी के साथ आज़माया जाए तो कोरोना की मुसीबत को टाला जा सकता है। ये दो उपाय हैं- 1. प्लाज्मा थेरेपी और 2. हर्ड इम्युनिटी।
चर्चा में प्लाज़मा थैरेपी
प्लाज़मा थेरेपी चर्चा में क्यों है और कैसे यह कोरोना से जंग में एक बेहतर उपाय साबित होते हुए प्रतीत हो रही है- इसकी बात करते हुए यह जानकारी देना प्रासंगिक होगा कि भारत सरकार ने मंगलवार (28 अप्रैल, 2020) को स्पष्ट कर दिया है कि भले ही दिल्ली समेत कुछ राज्यों में कोरोना संक्रमित मरीजों का प्लाज़्मा थेरेपी का इलाज शुरू कर दिया गया है, लेकिन इस चिकित्सा पद्धति को अभी सिर्फ ट्रायल या रिसर्च के रूप में ही आज़माया जाना चाहिए, मुकम्मल इलाज के रूप में नहीं। सरकार के मुताबिक इसकी वजह यह है कि इस चिकित्सा पद्धति (थेरेपी) को अभी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) से भी कोई मंजूरी नहीं मिली है। साथ ही, इसके कोई ठोस सबूत नहीं है कि कोरोना के इलाज के रूप में इसका इस्तेमाल हो सकता है, यहां तक कि अमेरिका में भी अभी इसे सिर्फ प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में इसके ट्रायल के गंभीर नतीजे भी निकल सकते हैं। इसका एक अर्थ यह निकलता है कि प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल गैरकानूनी है और इससे कोरोना के इलाज का दावा करना गलत है। लेकिन इन सारी चेतावनियों और अलर्ट के बीच सूचना यह है कि दिल्ली में किए गए प्रयोग में प्लाज्मा थेरेपी को कोरोना से प्रभावित पहले स्टेज के मरीजों पर कारगर पाया गया है। इस बारे में खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि कोरोना के चार मरीजों को प्लाज़मा थेरेपी दी गई और उनके जल्द स्वस्थ हो जाने की उम्मीद है। दिल्ली के इस ऐलान के साथ ही कर्नाटक ने भी अपने यहां कोरोना के मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी और वहां भी मरीजों में स्वस्थ होने के संकेतों की बात की जा रही है। एक उल्लेखनीय समाचार यह भी है कि जिस तब्लीगी जमात के सदस्यों पर देश में कोरोना के प्रसार में मदद देने का आरोप लगा है, उस जमात के संक्रमित हुए, लेकिन अब स्वस्थ हो चुके लोगों ने आगे आकर अपना प्लाज्मा देने की पेशकश की है ताकी मरीज़ों के इलाज में मदद मिल सके। सिर्फ भारत ही नहीं, अमेरिका समेत दुनिया के कई और मुल्कों में कोरोना संक्रमितों को प्लाज्मा थेरेपी की मदद से बचाने की ठीक वैसी ही कोशिश की जा रही है, जैसी इससे पहले सार्स, मर्स और इबोला संक्रमण की रोकथाम में इसके ज़रिए की गई थी। हम दुआ करेंगे कि वैक्सीन के लंबे इंतज़ार से पहले प्लाज़मा थैरेपी के करिश्माई नतीजे दुनिया के सामने आ जाएं और कोरोना के हजारों- लाखों मरीजों को मौत के पंजे से छुड़ाया जा सके। पर यहां यह जानना ज़रूरी है कि आखिर प्लाज़मा थेरेपी नामक तकनीक है क्या और यह काम कैसे करती है।
प्लाज़्मा का करिश्मा
यूं एक दावा यह भी है कि ब्लड प्लाज़्मा थेरेपी काफी पुरानी तकनीक है। पिछली सदी में जब जानलेवा स्पेनिश फ्लू ने दुनिया ने तबाही मचाई थी, पर इसी तकनीक की मदद से उस पर काबू पाया गया था। तकनीक मोटे तौर पर यह है कि इसमें समान संक्रामक रोग से ग्रस्त हुए मरीजों के स्वस्थ हो जाने पर उनके खून से प्लाज़्मा लिया जाता है और उसे बीमार लोगों में चढ़ाया जाता है। असल में जब किसी संक्रामक रोग की चपेट में आया मरीज़ अपनी प्रतिरोधक क्षमता और दवाओं के इस्तेमाल से स्वस्थ होता है, तो उसके शरीर में बीमारी की रोकथाम करने वाले एंटीबॉडीज बनने लगते हैं। स्वस्थ हुए व्यक्ति के खून में मौजूद ये एंटीबॉडीज़ ही बीमारी की रोकथाम करने में मददगार साबित होते हैं। जैसा कि स्पष्ट है कि प्लाज्मा थैरेपी का सारा क्रियाकलाप खून में मौजूद एंटीबॉडीज़ के ज़रिए संपन्न होता है। रक्त में यह प्लाज़्मा किस मात्रा में होता है और इसका रंग आदि क्या होता है, इस बारे में पहली मूलभूत जानकारी यह है कि हमारा खून चार घटकों से मिलकर बनता है। ये 4 घटक हैं लाल रक्त कणिकाएं यानी आरबीसी। खून में आरबीसी की मौजूदगी 45% होती है। दूसरा घटक हैं श्वेत रक्त कणिकाएं यानी डब्ल्यूबीसी (1%), तीसरा घटक हैं- प्लेटलेट जो खून में थक्का बनाने में सहायता करते हैं और प्लाज़्मा (55%)। खून में से प्लाज़्मा अलग करने की विधि है सेंट्रीफ्यूगल। इस तरीके से खून के चारों घटकों को जब अलग किया जाता है, तो उसमें से लाल रंग के आरबीसी सबसे नीचे बैठ जाते हैं। आरबीसी की लाल रंगत के पीछे इनमें आयरन यानी लौह तत्व अर्थात् हीमोग्लोबिन की मौजूदगी होती है। घटकों को अलग करने की प्रक्रिया में सबसे ऊपरी सतह पर पीले रंग का प्लाज़्मा (55%) तैरते हुए मिलता है, जिसका 91% हिस्सा पानी होता है। प्लाज़्मा का पीला रंग उसमें मौजूद बिलरूबिन के कारण होता है। इसके अलावा यह हरे और कत्थई रंग में भी होता है। प्लाज्मा के 91% हिस्से यानी पानी में कई पोषक तत्व, प्रोटीन, खनिज लवण, विद्युत अपघट्य, गैसें और वेस्ट पदार्थ शामिल रहते हैं, जिनमें से हरेक का अपना विशिष्ट कार्य और ज़िम्मेदारी होती है। ध्यान रहे कि हमारे शरीर में मौजूद खून के चारों घटकों से मिले संकेत के आधार पर ही हारमोन शरीर के संबंधित हिस्सों में रासायनिक संकेत भेजते हैं जो शरीर का विकास और टूटफूट की मरम्मत आदि कार्य करते हैं।
इन बीमारियों में भी प्लाज़्मा थैरेपी का प्रयोग
अमेरिका, चीन समेत कई देशों में प्लाज़्मा थैरेपी से कोरोना के मरीजों के इलाज के प्रयोग किए जा रहे हैं। प्लाज्मा थैरेपी पर भरोसे की एक वजह इसका इतिहास भी है। हालिया दशकों में वर्ष 2020 में सार्स नामक वायरस के खात्मे के लिए प्लाज्मा थेरेपी को ही आजमाया गया था। इसके बाद 2009 में खतरनाक बर्ड फ्लू यानी एच1एन1 और 2014 में इबोला जैसे खतरनाक वायरस को रोकने के लिए भी प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया गया था। गौरतलब है कि वर्ष 2014 में खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला की रोकथाम के लिए प्लाज़मा तकनीक को आज़माने की इजाज़त दी थी। इसी तरह दावा है कि अगले ही साल यानी 2015 में मर्स के इलाज में भी प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया गया था। चूंकि सार्स और मर्स आदि वायरस कोरोना परिवार के ही सदस्य हैं, इसलिए अब कोरोना के मामले में भी प्लाज्मा थेरेपी के कारगर होने की उम्मीद की जा रही है।
हर्ड इम्युनिटी छेड़ेगी सामूहिक जंग
हिंदी सिनेमा के एक प्रसिद्ध गीत में यह आह्वान किया गया है कि एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना..साथी हाथ बढ़ाना। कोरोना से जंग के मामले में एक ऐसा ही विचार हर्ड इम्‍युनिटी के रूप में आया है। हर्ड इम्‍युनिटी का आशय एक बड़ी आबादी वाले मुल्क में बीमारी (कोरोना) के खिलाफ स्वाभाविक रूप से मज़बूत होने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली से है। कुछ विशेषज्ञ दावा कर रहे हैं कि अगर भारत जैसे मुल्क लॉकडाउन के उपाय को छोड़कर कोरोना की काट के लिए लोगों में खुद-ब-खुद विकसित होने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली पर भरोसा करें तो शायद ज्यादा करिश्माई नतीजे निकल सकें। हर्ड इम्‍युनिटी की बातें और इससे जुड़े दावे एकदम हवा-हवाई नहीं हैं, बल्कि इसके बारे में ब्रिटेन की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी और नई दिल्ली व वॉशिंगटन स्थित एनजीओ सेंटर फॉर डिज़ीज़ डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (सीडीडीईपी) से जुड़े विशेषज्ञों ने अपने आकलन के आधार पर भारत, अफ्रीका के कुछ देशों और इंडोनेशिया जैसे युवा आबादी वाले देशों के लिए रामबाण साबित होने की बात कही है। इस रणनीति के केंद्र में वह युवा आबादी है जो अगर कोरोना की चपेट में आ भी जाती है, तो भी उसकी मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता उसे गंभीर रूप से बीमार होने से बचा लेगी। इन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तत्काल कदम उठाया जाए तो अगले सात महीने में यानी नवंबर के अंत तक भारत जैसे युवा देश के 60 फीसद लोग कोरोना के खिलाफ रोग प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेंगे।
इस रणनीति के लिए ज़रूरी है कि लॉकडाउन हटाया जाए और युवाओं को कोरोना से जूझने के लिए छोड़ दिया जाए। ये युवा अपनी मामूली प्रतिरोधक क्षमता के बल पर भी कोरोना के खिलाफ अपने शरीर में एंटीबॉडीज़ विकसित कर लेंगे, जिनसे प्लाज्मा लेकर बुज़ुर्गों का इलाज हो सकेगा। इसका एक आधार यह भी कि जब कोरोना जैसा वायरस नए लोगों को संक्रमण के लिए नहीं ढूंढ पाता तो समुदाय का एक हिस्सा प्रतिरक्षा हासिल कर लेता है। भारत जैसे देश में, जब एक बड़ी आबादी लॉकडाउन में हैं। आर्थिक गतिविधियां ठप्प होने से बेरोज़गारी बढ़ने की आशंका है। ऐसे में हर्ड इम्युनिटी को एक कारगर उपाय के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए कोरोना के फैलने का जोखिम होते हुए भी हर्ड इम्युनिटी की रणनीति अपनाने का पक्ष लिया जा रहा है। हालांकि इसमें पेच यह है कि भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों का आंकड़ा काफी बड़ा है और यहां सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा पहले से ही काफी कमज़ोर है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि कोरोना का असली हमला फेफड़ों पर ही होता है।


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