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कम न हों ईद की खुशियां

Posted On May - 24 - 2020

मुस्लिम समुदाय तीन तरह की ईद मनाते हैं। एक ईद-उल-फितर है जो रमजान महीने के रोजे खत्म होने के बाद मनाई जाती है। दूसरी ईद इसके लगभग दो महीने बाद मनाई जाती है, जिसे ईद-उल-जुहा कहा जाता है। तीसरी ईद-ए-मिलाद है जो पैगंबर मोहम्मद साहब की पैदाइश के मौके पर मनाई जाती है। यह ईद रमजान के रोजे रखने के बाद मनाई जाती है, इसलिए इस पर लोगों में ज्यादा खुशी देखी जाती है। रमजान के पूरे महीने रोजे रखने के बाद सभी को इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दिन लोग पड़ोसियों और दोस्तों को भी घर बुलाते हैं। उनसे गले मिलते हैं। ये पड़ोसी और दोस्त केवल मुस्लिम नहीं होते, बल्कि सभी मजहब के लोग होते हैं। पड़ोसियों को लेकर इस्लाम की शिक्षा बेहद प्रेरक है। पड़ोसी से मोहब्बत रखने, उनका ख्याल रखने और उनकी इज्जत करने की शिक्षा इस्लाम में दी जाती है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि ये पड़ोसी केवल मुस्लिम हों, इसका कोई जिक्र नहीं है। ईद के जश्न के जरिये अमन और भाईचारे का संदेश यहीं से निकला है।

रिज़वान अंसारी
इस वर्ष की ईद-उल-फितर बाकी वर्षों से अलग है। इस ईद की नमाज ईदगाह और मस्जिद के बजाय लोग घरों में ही अदा करेंगे। सभी अपने-अपने घरों में रह कर लॉकडाउन का पालन करेंगे, इसलिए एक-दूसरे से मिलना-जुलना नहीं होगा। लेकिन, हमें मायूस होने की जरूरत नहीं है। हम घर पर रहकर भी अपनी खुशियों में इजाफा कर सकते हैं। यह सच है कि हम इस बार पड़ोसी और दोस्तों से न तो गले मिल पाएंगे और न ही उन्हें घर दावत पर बुला सकेंगे। लेकिन, इसका एक विकल्प यह है कि हम अपने सभी खास लोगों से फोन के जरिये संपर्क करें। उन्हें ईद की बधाई देकर उनका हालचाल जानें। सामाजिक सौहार्द की दिशा में यह एक बेहतर कोशिश होगी। समाज के प्रति हमारी यह जिम्मेदारी है कि जब हर तरह की सामाजिक गतिविधियां प्रतिबंधित हैं, तब हम लोगों से जुड़ने का कोई भी मौका नहीं जाने दें। ऐसा कर ईद के मौके पर एक-दूसरे से न मिलने की तकलीफ तो कम होगी ही, साथ ही हम एक-दूसरे का भरोसा भी जीत सकेंगे।
दूसरी ओर, इस ईद पर हम ज्यादा से ज्यादा गरीबों और भूखों के मददगार बन सकते हैं। अमूमन ईद के मौके पर गरीबों की कपड़े और पैसे से मदद की जाती है। इस बार जब हमारी ईद काफी सादगी से मनाई जा रही है, तब हम शारीरिक दूरी का ख्याल करते हुए इन गरीबों तक खाना पहुंचाएं। पैगम्बर मोहम्मद साहब हमेशा ही गरीबों और भूखों के हिमायती रहे हैं, लेकिन रमजान और ईद के मौके पर गरीबों और भूखों के प्रति उनकी फिक्र और ज्यादा बढ़ जाया करती थी। रमजान में जकात और फितरा की जो अवधारणा है, अगर सभी सक्षम लोग ईमानदारी से उस पर अमल करें तो शायद कोई भी भूखा न रहे। इस ईद तमाम पाबंदियों के बाद भी कुछ ऐसी चीजें हैं जिनमें कोई कमी नहीं आएगी। ईद की नमाज अदा करना और फिर सबके लिए दुआएं करने का सौभाग्य कोई संकट हमसे नहीं छीन सकता। इस दुआ में हम अपने बड़े-बुजुर्गों के लिए खूब दुआ करें। अपने गरीब पड़ोसियों को भी इस दुआ में याद रखें। लॉकडाउन के चलते लाखों प्रवासी मजदूर सड़कों या राहत शिविरों में हैं। कोई घायल है तो कोई भूखा है। लिहाजा, इनकी सलामती के लिए खूब दुआएं करें। इस कोरोना संकट में तमाम दुनिया की बेहतरी के लिए दुआ करें और खुदा से खासकर अपने मुल्क हिन्दुस्तान की सलामती मांगें। यकीनन, हमारी यह कोशिश भी हमें ईद जैसी ही
खुशी देगी। लिहाजा, इस पाबंदी भरी ईद में गमगीन और मायूस होने के बजाय हम अपनी खुशियों में इजाफा करने के विभिन्न तरीकों के बारे में विचार करें और इस ईद को भी यादगार बनाएं। आप सभी को मेरी ओर से भी ईद की मुबारकबाद।


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