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ऐसी प्रीति करहु मन मेरे…

Posted On May - 24 - 2020

26 मई : शहीदी दिवस

ओशो सिद्धार्थ औलिया
विश्व के आध्यात्मिक इतिहास में 1500 से 1700 ईस्वी को स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। इस काल में दस हीरे जड़े हुए हैं- श्री गुरु नानक देव जी से गुरु गोबिंद सिंह जी तक। गुरु अर्जुन देव जी गुरु सिखी परंपरा के पांचवें पातशाह हैं, जिन्होंने अपने त्याग और बलिदान से पंजाब व भारत की धरती को सिंचित किया। उनके कहने का अंदाज बड़ा प्यारा है। वह बड़े सहज ढंग से बात को शबदों में कह जाते हैं। भक्ति और प्रभु प्रेम का उत्कर्ष छूते हुए उन्होंने कहा- ऐसी प्रीति करहु मन मेरे॥ आठ पहर प्रभ जानहु नेरे॥ यानी, हे मेरे मन ऐसा प्रेम कर कि हर वक्त प्रभु को अपने निकट ही महसूस करूं।
सिमरन की विधि देते हुए उन्होंने कहा- मन महि सिंचहु हरि हरि नाम॥ अनदिनु कीरतनु हरि गुण गान॥ कहते हैं मन को सींचो हरि के नाम से। दिन-रात उसके कीर्तन को सुनो, और उसके गीत गाओ, उसके भजन गाओ, उसका यश गाओ, उसकी चर्चा करो।
कुछ भी कहो, उसकी चर्चा के साथ कहो। कोई सुंदर फूल खिला है, केवल इतना ही नहीं कहो कि फूल सुंदर है, कहो कि गोविंद ने कितने सुंदर फूल की रचना की है। चांद उगे तो केवल चांद की चर्चा मत करो, जरा हरि को जोड़ो।
सब कुछ उस प्रभु से जुड़ा है। एक उसका ही आसरा है। यही समझाते हुए गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं- जीअ जंत तेरे धारे॥ प्रभ डोरी हाथि तुमारे॥
तुम इतने जीव-जंतुओं का लालन-पालन करते हो, सबको धारण करते हो, हे गोविंद, सबकी डोरी तुम्हारे हाथों में है तो मुझे चिंता करने की क्या जरूरत है।
यह बात महसूस करने की है। अपनी डोरी उस पर छोड़ दो। सभी चिंता उस पर छोड़ दो। इसे महसूस करो। वो खुद ही संभालता है।
हम बारिक तउ सरणाई॥ प्रभि आपे पैज रखाई॥ यह कहते हुए गुरु अर्जुन देव जी प्रार्थना का उत्कर्ष छू रहे हैं, ये नहीं कहते कि तुम रखो ख्याल हमारा, कह रहे हैं कि तुम रखते ही हो, क्योंकि हम तुम्हारे बच्चे हैं, तुम्हारी शरण चाहते हैं।
जिस भाव से गोविंद को तुम भजते हो, गोविंद तुम्हारे लिए वैसा ही होता है। ये कोई सिद्धांत की बात नहीं है, दर्शनशास्त्र की बात नहीं है, ये कोई तर्क की बात नहीं है, यह महसूस करने की बात है। अगर आप महसूस करते हैं कि गोविंद हमारा राखनहार है, पालनहार है, गोविंद हमारी देख-रेख कर रहा है, तो गोविंद आपकी देख-रेख करता है। यह महसूस करना है कि हम गोविंद की शरण में हैं। बड़ा भरोसा चाहिये यह बात कहने में, मानने में कि हम तेरी शरण में हैं। और जिस दिन कह पाओ, वास्तव में देखोगे कि गोविंद तुम्हें अपनी शरण में ले लेते हैं।
कहते हैं गुरु अर्जुन देव जी-
मेरा मात पिता हरि राइआ॥ करि किरपा प्रतिपालण लागा करीं तेरा कराइआ॥
हे प्रभु पातशाह! तू ही मेरी मां है, तू ही मेरा पिता है। मेहर करके तू खुद ही मेरी पालना कर रहा है। हे प्रभु! मैं वही कुछ करता हूं, जो तू मुझसे करवाता है।
(लेखक ओशोधारा नानकधाम, मुरथल के संस्थापक हैं)

सुखमनि सुख अमृत प्रभ नामु…
संसार में हर कोई सुख चाहता है। श्री गुरु अर्जुन देव जी ने स्पष्ट संकेत दिया कि यह सुख प्रभु का नाम जपने से ही मिल सकता है। नाम सिमरन सब दुख दूर करने का उपाय है। सुखमनि साहिब में गुरु जी ने कहा-
सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ।। कलि कलेस तन माहि मिटावउ।।
मैं सिमरूं और सिमर सिमर कर सारे सुख हासिल करूं, इस तरह शरीर में जो दुख व्याधियां हैं उन्हें मिटा लूं।
परमात्मा के नाम को अमृत बताते हुए गुरु जी ने कहा-
सुखमनि सुख अमृत प्रभ नामु।।
भगत जना कै मन बिस्राम।।
यानी प्रभु का अमर करने वाला व सुखदाई नाम सुखों की मणि है, इसका ठिकाना भक्तों के हृदय में है।
प्रभ कै सिमरनि भउ न बिआपै॥
प्रभ कै सिमरनि दुखु न संतापै॥
प्रभु का सिमरन करने से डर (जीव पर) दबाव नहीं डाल सकता और दुख व्याकुल नहीं कर सकता।

हरिमंदिर के सृजनहार
गुरु अर्जुन देव जी मात्र 18 वर्ष की उम्र में गुरु गद्दी पर बैठे और 43 वर्ष की आयु में उनकी शहादत हुई। इस छोटे से काल में गुरु अर्जुन देव जी की देन बड़ी अद‍्भुत है। उन्होंने हरिमंदिर साहिब की नींव मियां मीर जी से रखवाई, जो प्रसिद्ध सूफी फकीर थे। ऐसा करके उन्होंने धार्मिक उदारता का परिचय दिया। गुरु जी ने आदिग्रंथ के शबदों का संकलन किया। अपने शबदों की भी रचना की। बादशाह अकबर के पास उनके खिलाफ शिकायतें पहुंचीं कि जिन शबदों की वे रचना कर रहे हैं, वह मुसलमानों के खिलाफ हैं, हिंदुओं के खिलाफ हैं। वहां से समन आता है। गुरु अर्जुन देव जी भाई गुरदास और बाबा बुड्ढा जी को भेजते हैं। उन दोनों की बातें सुनकर बादशाह अकबर कहता है कि मुझे तो कोई आपत्तिजनक बात नहीं लग रही। 1604 ईस्वी में स्वर्ण मंदिर का निर्माण पूरा होता है और वहां गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश होता है। उधर, तब तक अकबर विदा हो जाता है और राजगद्दी पर बैठता है जहांगीर। गुरु अर्जुन देव जी का यश आकाश छू रहा होता है। उनसे ईर्ष्या करने वालों और विरोधियों की संख्या बढ़ती जाती है। खुद उनका बड़ा भाई पृथी चंद उनके विरोध में हो जाता है। षड्यंत्र रचा जाता है और मात्र 43 वर्ष की उम्र में जहांगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन देव को शहीद कर दिया जाता है।


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