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एकदा

Posted On May - 23 - 2020

मौके की नजाकत

नादिरशाह कई देशों को फतह करता हुआ हिंदुस्तान की सीमा तक आ पहुंचा था। धीरे-धीरे मारकाट और लूटपाट करता हुआ दिल्ली की सीमा में घुस आया और मुहम्मद शाह को पराजित किया। शाम के समय रंगारंग महफ़िल सजाई गई। तरह-तरह के कार्यक्रम, खान-पान और राग-रंग चल रहे थे। नादिरशाह ने मुहम्मद शाह को अपने ही साथ उचित आदर देकर समान आसन पर बिठाया। मुहम्मद शाह ने अपने एक सेवक को हुक्का भरकर लाने को कहा। सेवक गया और शाही हुक्का भरकर ले आया। हुक्का लाकर सेवक असमंजस में पड़ गया कि हुक्का एक, बादशाह दो। एक अपना बादशाह, दूसरा विजेता। जिसके आगे न रखूं, वही नाराज़ हो जाएगा और न जाने क्या सज़ा दे बैठे। कुछ सोच-विचार कर उसने हुक्का उठाया और बड़े अदब से अपने बादशाह के सम्मुख रखते हुए बोला—यह रहा हुक्का, बादशाह सलामत। बादशाहों की खातिरदारी करना बादशाहों को ही शोभा देता है, हम जैसे तुच्छ सेवकों को नहीं। मुहम्मद शाह भी अपने सेवक की चतुराई पर मुस्कुराकर रह गया।

प्रस्तुति : मुकेश कुमार जैन


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