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एकदा

Posted On May - 20 - 2020

कर्मपथ ही सर्वोत्तम

एक महर्षि राजा जनक के महल में उनसे गाढ़े तत्वों की मीमांसा कर रहे थे। एकाग्रचित्त हो जनक उपदेशों को ग्रहण कर रहे थे। तभी कोलाहल मचा। किसी ने बताया कि महल में आग लग गयी। राजा फिर भी पूरी तल्लीनता से महर्षि का उपदेशामृत ग्रहण कर रहे थे। क्योंकि राजा उस समय प्रजाहित से संबंधित कई बातों की मीमांसा कर रहे थे। महर्षि ने भी राजा को चेताया। राजा शांत चित्त से उठे और उन्होंने सबसे पहले महर्षि एवं शिष्यों से सुरक्षित जगह पर जाने की विनती की फिर बचाव कार्य की समीक्षा की। तभी अग्निदेव शांत हो गये। सहसा महर्षि व्यास ने पूछा-राजन! अग्निज्वाला से तुम विचलित नहीं हुए। राजा जनक ने कहा, ‘महर्षि एक तो आपका आशीर्वाद मेरे साथ था, दूसरे मैं प्रजाहित से संबंधित बातों पर ही चर्चा कर रहा था।’ महर्षि मुस्कुराये और बोले, ‘कर्मपथ ही सबसे बड़ा मार्ग होता है। अग्निदेव ने भी इसे समझा।’ इसके बाद राजा जनक ने शांत स्वर में कहा, ‘महर्षि मेरा इस संसार में क्या है? इसलिए शोक में डूबने के बजाय मनुष्य को उचित कर्म करते रहना चाहिए।’ प्रस्तुति : शशि सिंघल


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