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Posted On May - 20 - 2020

कोरोना के साथ

19 मई के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘कोरोना के साथ-साथ’ कोरोना के आतंक के मद्देनजर लॉकडाउन 4 को 31 मई तक बढ़ाने का विश्लेषण करने वाला था। पहले तीन चरणों में सरकार के प्रयत्नों ने लोगों को बहुत कुछ समझा दिया। महामारी को लेकर लोगों में जागरूकता आई है। देश में महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए टेस्टिंग सुविधाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। स्वास्थ्य कर्मियों की प्रशंसनीय सेवाओं के फलस्वरूप देश में इस महामारी से लड़ने का मार्ग पहले ही प्रशस्त हो चुका है। जब तक महामारी पर नियंत्रण के लिए कारगर वैक्सीन का आविष्कार नहीं कर लिया जाता, हमें कोरोना के साथ सुरक्षित तौर पर जीना सीखना पड़ेगा।
शामलाल कौशल, रोहतक

शर्म की बात
आये दिन श्रमिक सड़क हादसों में मरते जा रहे हैं। आज श्रमिकों के लिए बड़ी मुसीबत कोरोना नहीं, बल्कि रहने-खाने की व्यवस्था है। आज कोरोना महामारी के संकट काल में कोई चूने के बोरों तले दबकर दम तोड़ रहा है तो कोई कपड़े के लट्ठों के बीच लाचार पड़ा है। मजदूरों का यूं हादसों में मरना, सरकार के लिए शर्म की बात है। इस कोरोना संकट काल ने प्रशासन की पोल खोल कर रख दी है। जमीनी स्तर पर ठोस कार्य प्रबंधन नजर नहीं आते। हर जगह लापरवाही ही नजर आ रही है।
अभिषेक मैहरा, कैथल

श्रमिकों की मजबूरी
लॉकडाउन ने हर किसी को प्रभावित किया है। लेकिन मजदूरों, श्रमिकों को, जिन्हें हम देश की धुरी भी कहते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। आज सड़कों पर पैदल, साइकिल या रिक्शों पर इनको अपने घरों की ओर जाते देखना अत्यंत दुखदायी है। इनका विश्वास प्रदेश की सरकारों से उठ गया है। सवाल उठता है कि अब इंडस्ट्री, फैक्टरियां खुलनी शुरू हो रही हैं। क्या बिना श्रमिकों के उत्पादन सम्भव होगा?
विनय मोहन, खारवन, जगाधरी

संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशनार्थ लेख इस ईमेल पर भेजें :- dtmagzine@tribunemail.com


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