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आत्मा पर खरोंचों के निशान लिये वे चल दिये

Posted On May - 23 - 2020

बेबसी का पलायन

आलोक यात्री

‘यूं तो शहर में मकां लाखों हैं, लेकिन मकानों में घर नहीं होते। आप क्यों घर की बात करते हैं, घर जो होता तो घर गए होते।’ किसी शायर की ये पंक्तियां गोया हमारे देश के आप्रवासी मजदूरों की हकीकत बयान करती हैं। लॉकडाउन के पहले दौर के साथ ही देश के कई हिस्सों के राष्ट्रीय राजमार्गों पर प्रवासी मजदूरों के पलायन का जो कारवां गुजरता दिखाई देना शुरू हुआ था वह दिन-रात अब भी अनवरत जारी है। इन छिटपुट तस्वीरों के बीच उनका दर्द पहले ही चरण में कुछ इस रूप में सामने आने लगा था ‘जा रहे हैं हम…, जैसे आए थे वैसे ही जा रहे हैं। यही दो-चार पोटलियां साथ थीं तब भी, आज भी…। और यह देह…। ‌आत्मा पर खरोंचों के निशान कितने बढ़ गए हैं कौन देखता है? कोई रोकता तो रुक भी जाते। बस दिखलाता… आंखों में थोड़ा पानी…। इतना ही कहता… यह शहर तुम्हारा भी तो है…। उन्होंने देखा भी नहीं पलट कर, जिनके घरों की दीवारें हमने चमकाई थीं…। उन्होंने भी कुछ नहीं कहा… जिनकी चूड़ियां हमने 13 सौ डिग्री तापमान में कांच पिघला कर बनाई थीं। किसी ने नहीं देखा… ‌एक ब्रश, एक पेचकस, एक रिंच और हथौड़े के पीछे एक हाथ भी है, जिसमें खून दौड़ता है…। जिसे किसी और हाथ की ऊष्मा चाहिए। हम जा रहे हैं…। हो सकता है कुछ देर बाद हमारे पैर लड़खड़ा जाएं…, हम गिर जाएं…।
हो सकता है हम न पहुंच पाएं। …वैसे भी आज तक हम कहां पहुंचे हैं? हमें कहीं पहुंचने भी कहां दिया जाता है…? हम किताबों तक पहुंचते-पहुंचते रह गए। न्याय की सीढ़ियों से पहले ही रोक दिए गए। नहीं पहुंच पाई हमारी अर्जियां भी कहीं। हम अन्याय का घूंट पीते रहे। जा रहे हैं हम… यह सोच कर कि हमारा एक घर था कभी। अब वह न भी हो तब भी उसी‌ दिशा में जा रहे हैं हम… कुछ तो कहीं बचा होगा उसमें…? जो अपना जैसा लगे…? नहीं रहना हमें, जहां हमारी हैसियत हमारे धेले से भी कम हो…। जा रहे हैं हम… जैसे आए थे… वैसे ‌ही जा रहे हैं हम…।’
सवाल यह है कि दो महीने से अनवरत जारी आप्रवासी मजदूरों के देशव्यापी इस दर्द को किसने महसूस किया? प्रवासी मजदूरों को गंतव्य तक पहुंचाने के नाम पर एकत्रित और चंद घंटों बाद बैरंग लौटा दी गई बसों के साथ इन मजदूरों का अपने सफर पर पैदल ही निकल पड़ना व्यवस्था और सियासत के मुंह ‌पर एक तमाचा है। सौ, दो सौ, हजार, लाख की संख्या में घर लौट रहे मजदूरों के इन जत्थों को सरकारी इमदाद की जगह अपने ‌हाथों से बनाई सड़कों पर अधिक भरोसा है। भूख, प्यास, लू के थपेड़े, हादसे के रूप में फिरती मौत, पुलिस की लाठी और धूप से तपती मीलों लंबी सड़कें भी उनके भरोसे को नहीं तोड़ पा रही हैं। लाखों रुपये खर्च कर मीडिया में प्रकाशित आधे-आधे पृष्ठ के विज्ञापन के जरिए सरकार या उसके नुमाइंदे अपनी पीठ थपथपा सकते हैं मगर सफर में शामिल इन मजदूरों के पांव में पड़ ‌गए छालों पर मरहम नहीं लगा सकते।
जो संकट हम आज सड़कों पर देख रहे हैं, उसे जल्द भूल पाना आसान नहीं होगा। यह मजदूरों का पलायन नहीं, बल्कि मानव पूंजी ‌का पलायन है, क्योंकि यही लोग हमारे देश की अर्थव्यवस्था के स्तंभ हैं। गांव लौटना इनको इसलिए उचित लगा कि वहां लोग उन्हें ‌भूख से मरने नहीं देंगे। मुमकिन है इनमें से अधिकांश अब गांव छोड़ने के बारे में कभी सोचे ही नहीं। उन्होंने सड़कों पर कई-कई दिनों तक तपती हुई दोपहरी में जिंदगी और मौत से जंग लड़ी है। जाहिर है इनके दोबारा न लौटने पर शहरों में कामगारों की कमी महसूस होगी।
हमारी अर्थव्यवस्था में रोबोट या ऑटोमेशन या यूं कहें कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ‌की भूमिका बहुत सीमित है। इसलिए उद्योगों की निर्भरता मजदूरों पर ही टिकी हुई है। ऐसे में इनका हमेशा के ‌लिए पलायन चिंता का विषय है। साथ ही यह भी चिंतन का विषय है कि संकट के इस विकराल समय में, सावधानियों को ताक पर रख कर इन लोगों ने पलायन का रास्ता ही क्यों चुना? कहा जा सकता है कि भविष्य की चिंता, आर्थिक तंगी, परिवार का भरण-पोषण, बीमारी का डर, अशिक्षा और राजनीतिक कारणों की वजह से ही श्रमिक वर्ग ने पलायन का रास्ता चुना। अन्यथा यह कैसे संभव है कि कोई इनसान वर्षों से जहां रह रहा हो, महज एक संकट आने पर ही वह वहां से पलायन की सोच को इतना पुख्ता कर ले? सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब संवेदनशील तबके का है। यह भी तय है कि महज स्थान बदलने से उनकी मुश्किलों का हल नहीं होगा। मूल स्थान पर लौटने के बावजूद उनकी दुश्वारियां कम नहीं होंगी। बरसों तक उनकी स्थिति वहां भी विस्थापितों की-सी ही बनी रहेगी।
श्रमिकों के पलायन की तस्वीर बताती है कि मौजूदा हालात आप्रवासी मजदूरों, दिहाड़ी कामगारों, बेरोजगारों और किसानों के लिए अकल्पनीय कठोर हालात पैदा करने ‌वाले हैं। इस दौरान आपसी समन्वय की कमी भी भरपूर देखने को मिली, जिसका खमियाजा उन गरीब मजदूरों को उठाना पड़ रहा है जो अपने गंतव्य की ओर पैदल या अन्य साधनों से जा रहे हैं। इनका पलायन बता रहा है कि हर शहर की फितरत समुद्र की-सी होती है। जो गैर-जरूरी चीजों को अपने भीतर समाने नहीं देता बल्कि उठाकर बाहर फेंक देता है।


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