रिसर्च से पुष्टि, पशुओं में नहीं फैलता कोरोना !    हल्दीयुक्त दूध कोरोना रोकने में कारगर !    ऑनलाइन पाठशाला में मुक्केबाजों के अभिभावक भी शामिल !    फेसबुक ने घृणा फैलाने वाले 200 अकाउंट हटाए !    अश्लीलता फैलाने और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान में एकता कपूर पर केस दर्ज !    भारत के लिए आयुष्मान भारत को आगे बढ़ाने का अवसर : डब्ल्यूएचओ !    पाक सेना ने एलओसी के पास ‘भारतीय जासूसी ड्रोन' को मार गिराने का किया दावा !    भारत-चीन अधिक जांच करें तो महामारी के ज्यादा मामले आएंगे : ट्रंप !    5 कर्मियों को कोरोना, ईडी का मुख्यालय सील !    भारत-चीन सीमा विवाद : दोनों देशों में हुई लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत !    

अनिश्चय की सड़क पर अपना-अपना सफर

Posted On May - 20 - 2020

तिरछी नज़र

सुरजीत सिंह

हवा बहुत साफ है। गंगा का पैंदा दिख रहा है। दूर तलक से हिमालय नजर आ रहे हैं, लेकिन नेता कहीं से भी नजर नहीं आ रहे। और राहतें, राहतें तो बहुत नजदीक से भी, धुंधली-सी भी कहीं नजर नहीं आ रही। अनिश्चय की सड़क पर कदम है और हर कदम पर आशंका, न जाने आगे क्या! सबके पास अपनी चिंताएं हैं। चिंता को चिंता की तिर्यक रेखा काट रही है। भूखे को खाने की चिंता। भरे पेट को पीने की चिंता। जिनके पास दोनों, उन्हें गुलाब की चिंता। गले में तरावट, पेट में गेहूं और सूंघने को गुलाब हो तो मानस तृप्त होता है।
जो सड़कों के हवाले हो गए, उन्हें सफर की चिंता। न जाने कितने शेष पहुंचेंगे। वाहनों से लेकर सरकारों तक का चैलेंज, बच कर दिखाओ तो जानें! घरों को अपनों की चिंता, न जाने लौटकर आ पाएंगे कि नहीं, रास्ते में खाने में रोटी मिलेगी कि डंडे। वाहन मिलेगा कि खुद मुर्गा बनेंगे। वायरस से बड़ा निष्ठुर समय है। सरकारों के पास हाथ बढ़ाने के बजाय हाथ धोने की हिदायतें हैं। डर का इन्फेक्शन फैल रहा है।
बेसहारा, फुटपाथ, झुग्गी-झोपड़ियों में खौफ का सन्नाटा है-उम्मीद में सुबह हुई, आशंका में दोपहर गुजरी, फटे चीथड़ों में से डर की शाम उतर चुकी, तब जाकर कहीं से सोने की सिल्ली की तरह एक अपार संभावनाओं वाला छोटा-सा फूड पैकेट टपका। उसे भी ट्रॉफी की तरह ग्रहण करते हुए दो-चार फोटो खिंचवाकर फिर लपका। पार्श्व में इस प्रतिध्वनि के साथ- ‘और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत कीजिए इनका, इन्होंने चौबीस घंटे तक अपने अदम्य साहस और हौसले से भूख को मात देकर जीती है यह ट्रॉफी उर्फ रोटी!’ उफ, समझ नहीं आता, इस दुर्लभतम वस्तु को संभालकर रखें या पेट के हवाले करें। ऐसे करुण दृश्य तब मारक दृश्यों में बदल जाते हैं, जब सीन में रोटी की जगह शराब की एंट्री हो जाती है… हिच्च! इधर शराब की दुकानों के शटर उठे, उधर डेढ़ महीने से भयंकर सूखे की चपेट में अतृप्त आत्माएं तर होने को मचल उठीं। कोरोना की ऐसी-तैसी कर घरों से भाग निकलीं। बोतल हथियाना किसी एडवेंचर से कम नहीं। यह सोचकर रोमांच और भय दोनों बढ़ जाते हैं कि न जाने बोतल मिलेगी कि कोरोना, फूल बरसेंगे कि लाठियां!
कहीं मजदूरों से ज्यादा शराबी भाग्यशाली निकले। उन्हें मिल गई, जिन्हें नहीं मिली, उन्हें होम डिलीवरी का भरोसा। मजदूरों को फिर फिर फिर मिली अनन्त सफर पर चलते रहने की प्रेरणा। उनकी बेरुखी भी प्रेरणास्पद है, ‘घर जाना मानव का स्वभाव है, अपने स्वभाव के सहारे पैरों पर चलते रहो।’ ट्रेनों पर भरोसा नहीं रहा, तो पटरियों के हवाले हो गए। जिंदा को मौत मिली, शवों को स्पेशल ट्रेन। हाय, कैसे-कैसे हृदय विदारक दृश्य हैं! नन्हे-नन्हे बालकों के पांवों में छाले, चांद से भी दूर निवाले। बीच रास्ते प्रसव वेदना, फिर निरंतर चलने की हिमालय से बड़ी पीड़ा। क्या मानवता इस ‘भारत माता’ से आंख मिलाने का साहस कर पाएगी?


Comments Off on अनिश्चय की सड़क पर अपना-अपना सफर
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.