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ज़िंदगी ऑनलाइन

Posted On April - 26 - 2020

अभिषेक कुमार सिंह

मानव सभ्यता के इतिहास में यह पहला मौका है, जब दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में ट्रेन, बस-कार और विमान सेवाएं बंद हैं लेकिन ज़िंदगी चल रही है। घर-दफ्तर के बहुत सारे काम हैं जो पहले कहीं आए-जाए बिना मुमकिन नहीं थे, पर अब घर बैठे-बैठे हो रहे हैं। शायद ही कोई स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी ऐसी हो जहां छात्र और शिक्षक वास्तविक रूप में उपस्थित हों, लेकिन वे आमने-सामने हैं और पढ़ाई व परीक्षाओं का सिलसिला जारी है। पेशेवर ज़िंदगी की रूपरेखा बदलने वाले इस मौके ने हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी यह कहने के लिए मजबूर कर दिया कि इन दिनों घर हमारे नए ऑफिस और इंटरनेट नया मीटिंग रूम है। सहकर्मियों के साथ ऑफिस ब्रेक या लंच भी वर्चुअल वर्ल्ड का हिस्सा हो गया है।
सरकारी हो या प्राइवेट सेक्टर, सभी जगहों पर ज्यादातर बैठकें ऑनलाइन संपन्न हो रही हैं। आम लोगों की जिंदगी में भी ये ऑनलाइन हलचल तेज़ है। वे फिल्म देखने के ऑनलाइन मंचों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं, कविता, कहानी लिखने से लेकर अपनी गायन, नृत्य और पकवान कलाओं का प्रदर्शन सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर कर रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम की जिस अवधारणा को अभी तक फुटकर में अपनाया जाता था, कोरोना के संकट ने साबित कर दिया है कि अगर इस वर्क कल्चर के कायदों को सलीके से अपनाया जाता तो आपदाओं में लगने वाले हर किस्म के झटकों को हम आसानी से सह जाते।
नया कारोबारी मॉडल
असल में, कोविड-19 यानी कोरोना वायरस के प्रहार से बचने की ज़रूरतों के मद्देनजर इन दिनों दुनिया में जो नए शब्द प्रचलित हुए हैं, उनमें सबसे ज्यादा उल्लेख ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का हुआ है। पहले जिस सोशल डिस्टेंसिंग को एक खराब चीज के रूप में दर्ज किया जा रहा था, कोरोना ने दूसरों से फासला बनाए रखने को बीमारी के फैलाव से बचाव के एक अहम टूल में बदल दिया है। लॉकडाउन के दौरान जीवन की गाड़ी के पहिए पूरी तरह थम न जाएं, इसके लिए कुछ अनिवार्य सेवाओं को जारी रखना ज़रूरी था। इसके तमाम इंतज़ाम भी किए गए। साथ में, वे प्रबंध भी सामने आए कि अगर किसी रोज़ हमारी दुनिया को चलाए रखने के पारंपरिक तौर-तरीकों को कोई ग्रहण लग जाए तो उस दौर में भी कोई कामकाज रुकता-ठहरता नज़र न आए। इस प्रबंध का संबंध घर से ही इंटरनेट के ज़रिए कामकाज निपटाने से है, जिसे पिछले दो दशकों में ऑनलाइन टिकट बुकिंग-रिजर्वेशन से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक के कई किस्सों में देखा-परखा और आज़माया गया है।
ऑनलाइन शॉपिंग की अवधारणा
बीते कई दशकों से मौके-बेमौके इसकी चर्चा इस रूप में होती रही है कि अगर ऑनलाइन शॉपिंग की जा सकती है तो पूरे दफ्तरी कामकाज के आधे हिस्से को इस तरीके से निपटाया ही जा सकता है। शहरों में भयानक प्रदूषण फैलने, ऑड-ईवन जैसे फॉर्मूले अपनाने, ट्रैफिम जाम में फंसने और भारी बारिश-बाढ़ जैसे हालात में दिल्ली-मुंबई आदि शहरों में अक्सर इसकी वकालत की गई है कि दफ्तरी किस्म के जो काम घर बैठे कराए जा सकते हैं, उन्हें इसकी इजाज़त दी जानी चाहिए। महंगी होती कारोबारी जगहों, बिजली की बढ़ती खपत और आने-जाने में वक्त की बचत के अलावा अक्सर यह दलील भी दी गई है कि अगर कुछ प्रतिशत लोगों को वर्क फ्रॉम होम की इजाज़त दे दी गई होती तो यह हमारी पृथ्वी के ऊपर बहुत बड़ा रहम होता। लाखों लोगों के घर से काम करने की इस कोशिश का क्या सुखद अंजाम निकल सकता है- इन दिनों हमारे देश समेत पूरी दुनिया ने यह देखा है। नीले हुए आसमान की नीचे चमकती पर्वत चोटियों और खुशनुमा मौसम, चिड़ियों की चहचहाहट और समुद्री – वन्य जीवों की बेतकल्लुफ चहलकदमी ने साबित कर दिया है कि इंसान अगर कुछ वक्त के लिए अपने घरों में ठहर जाए तो पूरी कायनात में जैसे नई हरकत पैदा हो जाती है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि धुरी पर टिकी हमारी धरती की चाल में पैदा होने वाले कंपनों में भी उल्लेखनीय कमी आई है। यह सारा करिश्मा सिर्फ इसलिए हुआ है कि इंसान की जि़ंदगी पहले से कई गुना ज्यादा ऑनलाइन हो गई है।
ऑफलाइन से ऑनलाइन तक
यूं कहा जा सकता है कि आज भी कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां ऑनलाइन कामकाज संभव नहीं है। इंजीनियरिंग, निर्माण क्षेत्र, चिकित्सा, पर्यटन आदि कई सेक्टरों के कामकाज मोटे तौर पर ऑनलाइन नहीं हो सकते, हालांकि इधर वर्चुअल टूरिज्म को साकार करने की कोशिशें भारत में भी हो रही हैं, जिसका मकसद फौरी तौर पर दुनिया भर के पर्यटकों को घर बैठे भारत दर्शन कराना है। लेकिन इनसे अलग कई सेक्टर ऐसे हैं, जहां वर्चुअल कामकाज में कोई खास दिक्कत नहीं है। आईटी सेक्टर तो काफी समय से ऐसे इंतज़ामों को आज़मा रहा है, पर कई तरह के वित्तीय, पेटेंट, कानूनी सलाह, लेखन-पत्रकारिता आदि नई शैली के कामकाज में भी साबित हुआ है कि इनके लिए दफ्तर जाने की ज्यादा ज़रूरत नहीं है। इनसे जुड़े ज्यादातर कामकाज घर बैठे ही निपटाए जा सकते हैं। तेज़ ब्रॉडबैंड और वेबकैम जैसी आधुनिक तकनीकें भी मददगार साबित हो रही हैं। लेखकों के लिए ही नहीं, पत्रकारों के लिए भी हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सशरीर उपस्थित होना ज़रूरी नहीं है- अब ऐसा सरकारी पत्रकार वार्ताओं में भी दिख रहा है जो ऑनलाइन यानी ईकॉन्फ्रेंस के रूप में आयोजित कराई जा रही हैं। यही नहीं, इस लॉकडाउन के बावजूद सभी ने देखा है कि अखबारों का छपना नहीं रुका है, बैंकिंग कामकाज जारी हैं, शेयर बाजारों में भी सतत उठापटक हो रही है। सबक यह है कि सरकारें अपने स्तर पर जितने काम ऑनलाइन कर सकती हैं- उन्हें तत्काल ऐसा कर देना चाहिए।
वर्क फ्रॉम होम के फायदे भी
कोरोना संकट के इस दौर ने यह दिखाया है कि टेलीवर्किंग यानी घर से काम करने का चलन सिर्फ इसलिए ज़रूरी नहीं है कि कंपनियों को महंगे होते जा रहे दफ्तरी इलाकों की समस्या से निपटना है बल्कि शहरों में घर-दफ्तर के बीच बढ़ती दूरियों, ट्रैफिक जाम और परिवहन के बढ़ते खर्चों जैसी कई समस्याओं का हल भी खोजना है। कहा जा रहा है कि निकट भविष्य में ज्यादातर कामकाज ऐसी प्रवृति के होंगे, जिनके लिए लोगों को दफ्तर नहीं जाना पड़ेगा। भारत में तो इसके ठोस अनुमान सामने नहीं आए हैं कि अब यहां कितने कर्मचारी घर से दफ्तर का काम करते हैं, लेकिन दुनिया के कई देशों में घर बैठकर काम करने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। जैसे ब्रिटेन में वर्ष 2011 में कराए गए एक सर्वे में हिस्सा लेने वाले 59 फीसदी कर्मचारियों ने टेलीवर्किंग यानी ऑनलाइन कामकाज को तवज्जो दी थी। कुछ वर्ष पहले अमेरिकी नागरिकों पर किए गए एक सर्वेक्षण में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास और रोसेस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने कई दिलचस्प नतीजे निकाले थे। इन शोधकर्ताओं ने द अमेरिकन टाइम यूज सर्वे के 10 साल के आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद बताया था कि वर्ष 2003 के मुकाबले में 2012 में अमेरिकी नागरिक औसतन 7.8 दिन ज्यादा घर पर काम करते हुए बिताते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अमेरिकी में बिजली की मांग वर्ष 2012 में 1700 खरब यूनिट (बीटीयू- ब्रिटिश थर्मल यूनिट) की कमी आई। यह अमेरिका की कुल सालाना बिजली खपत का 1.8 प्रतिशत है।
भ्रांतियां तोड़ने का वक्त
यूं अभी भी कई मैनेजरों का तर्क हो सकता है कि वर्क फ्रॉम होम या फ्लेक्सी-टाइम एक अव्यावहारिक अवधारणा है, जिससे किसी का भला नहीं होने वाला है। ऐसे लोगों की नज़र में, जो भी चीज बाजार और कॉमर्स के लिए स्वाभाविक नहीं है, वह कामयाब नहीं होगी। इसी तरह की एक राय यह भी है कि पश्चिमी देशों के उलट भारत में कर्मचारियों के घरों में ऑफिस स्पेस के लिए अलग जगह नहीं होती, इसलिए घर से काम करने पर उत्पादकता पर असर पड़ सकता है। निश्चय ही, वर्क फ्रॉम होम के इस चलन पर कई सवाल रहे हैं, पर मौजूदा ज़रूरतों के मद्देनजर इसे लेकर कायम नज़रिये में बदलाव लाने की ज़रूरत है। अगर दफ्तरी माहौल की बात को छोड़ दिया जाए, तो आजकल बड़े शहरों में बनने वाले आधुनिक अपार्टमेंट तक में इस तरह का इंतज़ाम किया जा रहा है कि व्यक्ति यदि चाहे तो वह घर से ही दफ्तर के ज्यादातर काम निपटा सकता है। भारत के विशाल आबादी वाले दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में, जहां घर से दफ्तर आने-जाने में ही रोज़ाना चार-पांच घंटे बर्बाद हो जाते हैं, वर्क फ्रॉम होम की छूट असल में काम की गुणवत्ता और उत्पादकता (क्वॉन्टिटी) में बढ़ोत्तरी करने वाली साबित हो सकती हैं। जिन पेशों में ग्राहक और कर्मचारी का आमना-सामना ज़रूरी नहीं है, कम से कम वहां तो वर्क फ्रॉम होम की यह सुविधा धन और ऊर्जा बचाने के अलावा सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव कम करने और प्रदूषण घटाने में भी मददगार साबित हो सकती है। लोगों को कंपनियों से जोड़े रखने, कार्यालयों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाने और एक बेहतरीन कार्य संस्कृति विकसित करने में घर से काम करने का तरीका काफी मददगार है। कई अध्ययनों में भी यह साबित हुआ है कि जब लोगों को मनचाहे वक्त और स्थान से काम करने की आज़ादी दी जाती है, तो वे उस माहौल में ज्यादा बेहतरीन परिणाम दे पाते हैं। मुमकिन है कि जिस तरह ऑड इवन कारों के संचालन से ट्रैफिक के दबाव और प्रदूषण को कम करने के बारे में योजनाओं को अमल में लाया गया है, उसी तरह वर्क फ्रॉम होम के विचार को भी एक बार अमल में लाकर उसके नतीजे देखे जाएंगे। यह वक्त कामकाजी ऑनलाइन जिंदगी को लेकर कायम कुछ भ्रांतियों को तोड़ने का भी है। जैसे यह माना जाता है कि कार्य संस्कृति के परंपरागत तरीके के मुकाबले वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था में लोग कम काम करते हैं। यह एक बड़ी भ्रांति है। असल में, परंपरागत कामकाजी संस्कृति कहती है कि लोग काम करने के लिए दफ्तर आएं, वहां एक साथ लंच लें और मुद्दों-समस्याओं पर चर्चा करें। यानी दफ्तर आने का मतलब सिर्फ उत्पादकता और कामकाज सुचारु रूप से संपन्न कराना मात्र नहीं माना जाता है। बल्कि दफ्तर आने वाले वाला कर्मचारी उतना ही काम घर से काम करने वाले कर्मचारी के मुकाबले ज्यादा तरक्की पाता रहा है। इस बारे में लंदन बिजनेस स्कूल और अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में एक शोध कराया गया। शोध का निष्कर्ष यह निकला कि जो कर्मचारी दफ्तर में नज़र नहीं आता, ज्यादा काम करने के बावजूद उसका प्रमोशन भी नहीं होता है या उसे दूसरों के मुकाबले कम पदोन्नति व कम वेतन वृद्धि मिलती है। वर्क फ्रॉम होम वाली कार्य संस्कृति का ज्यादा विरोध इसलिए है क्योंकि ज्यादातर मैनेजर पुरानी कार्यसंस्कृति को तरजीह देते हैं।
बचपन के लिये नुकसानदायक
इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता के चलते बच्चों का स्क्रीन टाइम भी बढ़ गया है, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है। हाल में अमेरिकी बच्चों पर किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक बच्चे वहां औसतन दिन में तीन घंटे का वक्त टीवी देखने में गुजारते रहे हैं, पर अब इसमें पढ़ाई के उद्देश्य से मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट के इस्तेमाल के वक्त को मिला लिया जाए तो यह समय 5 से 7 घंटे तक पहुंच जाता है। प्रत्यक्ष तौर पर इसके दो नुकसान हैं- बच्चों का मैदानी खेल-कूद जैसी शारीरिक गतिविधियों से दूर होना, उनकी सोचने-समझने की क्षमता सीमित होना और स्क्रीन पर कुछ न कुछ देखते रहने की लत पड़ जाना। ये सारी बातें बच्चों के शरीर और दिमाग के विकास के लिहाज से बेहद नुकसानदेह हैं। ऐसे बच्चों के बारे में आशंका है कि उनमें सामान्य जिंदगी जीने के लिए जरूरी संवाद का कौशल भी विकसित नहीं हो पाता है।
ऑनलाइन पढ़ाई की मुश्किलें
हालात कैसे भी हों, कुछ चीजें कभी रुक नहीं सकतीं। शिक्षा का क्षेत्र कुछ ऐसा ही है। लॉकडाउन के ऐलान के बावजूद सरकार ने शिक्षा को अनिवार्य चीजों की लिस्ट में नहीं डाला। वजह यह थी कि इससे सोशल डिस्टेंसिंग का कायदा टूटने का खतरा है। लेकिन पढ़ाई और परीक्षा का निजाम तो चालू ही रहना था। ऐसे में छोटे बच्चों से लेकर यूनिवर्सिटी स्तर तक की ऑनलाइन पढ़ाई के इंतजाम पूरी दुनिया में किए जा रहे हैं। उन अध्यापकों और बच्चों का भी ऑनलाइन पढ़ाई के सिस्टम से वास्ता पड़ रहा है, जिन्होंने इससे जुड़े माहौल में कभी कोई काम नहीं किया। हालांकि व्हाट्सएप जैसी चीजों ने उनके इस काम में कुछ शुरुआती मदद की है, लेकिन जहां बात कॉलेज-यूनिवर्सिटी की आती है तो वहां इसके लिए ज्यादा बड़े प्रबंध किए जा रहे हैं। हालांकि अभी तो ऐसे जरियों से सिर्फ पढ़ाई कराई जा रही है, लेकिन कोविड-19 से प्रभावित लोगों के आंकड़ों में सतत बढ़ोत्तरी के मद्देनजर सोचा जा रहा है कि अब परीक्षाएं भी ऑनलाइन तरीके से कराई जाएं। यूं कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन बीते कई वर्षों से ऑनलाइन ही कराए जाते हैं, लेकिन जैसे इंतज़ाम उनके लिए होते हैं- वैसे प्रबंध करना कॉलेज-यूनिवर्सिटियों के लिए नई बात हैं। इसीलिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इस बारे में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई है, जिसके सुझावों पर 30 अप्रैल तक दिशा-निर्देश जारी किए जाने की संभावना है। यूजीसी की ओर से ये सुझाव मानव संसाधन मंत्रालय को सौंपे जाएंगे जो पूरे देश के विश्वविद्यालयों को सत्रों की पढ़ाई और परीक्षा के ऑनलाइन विकल्पों पर निर्देश दे सकता है। हालांकि इसमें कैसी मुश्किलें सामने आ सकती हैं, इसकी एक झलक पिछले दिनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म- ज़ूम के साथ हुए हादसे में मिल गई। इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल शिक्षक छात्रों को पढ़ाने से लेकर अन्य शिक्षकों के साथ कॉन्फ्रेंसिंग और विश्वविद्यालयों के पदाधिकारियों के साथ ऑनलाइन मीटिंग के सिलसिले में कर रहे हैं। पता चला कि पिछले दिनों जूम पर बनाए गए पांच लाख से ज्यादा अकाउंट्स की जानकारियां हैक करके हैकरों ने डार्क वेब पर डाल दीं या उन्हें किसी तीसरी पार्टी को बेच जिया। हालांकि बिजनेस पत्रिका – फोर्ब्स का कहना है कि जूम के अकांउट्स की जानकारी मुफ्त में ही थर्ड पार्टी को दी गई हैं। एक साइबर सिक्योरिटी फर्म- साइबल का कहना है कि जूम के यूजर्स को यह पता ही नहीं चला कि उनका डाटा किसी को बेच दिया गया है।


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