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साथ छोड़ते हाथ

Posted On March - 23 - 2020

हरीश लखेड़ा
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी रहे पूर्व ग्वालियर रियासत के ‘महाराज’ ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के साथ ही मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार की विदाई हो गई है। अब लगभग 15 महीने बाद फिर से वहां भाजपा का कमल खिल रहा है। कमलनाथ सरकार को गिराने के सूत्रधार रहे सिंधिया कमल के सहारे ही राज्यसभा पहुंचेंगे और शीघ्र ही केंद्र की मोदी सरकार में उन्हें अहम मंत्रालय भी मिलना तय है।
मध्य प्रदेश के इस सियासी घटनाक्रम से भाजपा ने उन नेताओं को संदेश देने का प्रयास किया है, जो देश की सबसे पुरानी व समृद्ध विरासत वाली कांग्रेस की मौजूदा नीतियों और नेतृत्व से खुश नहीं है। सिंधिया से पहले भी कई ऐसे नेता रहे हैं, जिनके कांग्रेस छोड़ने पर भाजपा ने उन्हें गले लगाया और अब वे सत्ता सुख भोग रहे हैं। वैसे भी कांग्रेस में बुजुर्ग नेताओं और युवा नेताओं के बीच जारी अघोषित सियासी संघर्ष के कारण भाजपा को यह मौका मिल रहा है। कांग्रेस में राहुल गांधी के ‘रणछोड़’ होने तथा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अस्वस्थता के कारण अब ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। प्रियंका गांधी ने खुद को पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित कर रखा है। राहुल गांधी अब भी पार्टी अध्यक्ष नहीं बनना चाहते। ऐसे में कांग्रेस के महत्वाकांक्षी युवा अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं, जबकि पार्टी के युवा नेता चाहते थे कि कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बावजूद राहुल उनके राजनीतिक हितों की रक्षा करें, ऐसा हो नहीं रहा है। इन नेताओं को लग रहा है कि कांग्रेस में उन्हें दरकिनार किया जा रहा है, इसलिए कांग्रेस के युवा अब इंतजार करने को तैयार नहीं हैं। उनका धैर्य जवाब देने लगा है। कांग्रेस संगठन में दशकों से काबिज बुजुर्ग नेता पार्टी की दुर्दशा के बावजूद नये लोगों को रास्ता देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में भाजपा ने उन्हें वैकल्पिक रास्ता दे दिया है। वैसे भी आज की राजनीति जनता की सेवा की बजाय सत्ता पाने की हो गई है। ऐसे में कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं देख रहे नेताओं को अब कुर्सी के लिए भाजपा अच्छी लगने लगी है और वे उसके पाले में जाने लगे हैं। माना जा रहा है कि राज्यसभा के अगले चुनाव तक कांग्रेस के और कई नेता भाजपा का कमल खिलाने जा सकते हैं।

राहुल के करीबी कह रहे अलविदा
कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए राहुल गांधी ने जिन युवाओं को आगे बढ़ाया था, अब उनमें से कई पार्टी को अलविदा कह चुके हैं या असंतुष्टों की कतार में शामिल हो गए हैं। सिंधिया तो राहुल के बचपन के दोस्त रहे हैं। इसके बावजूद, सिंधिया ने भाजपा का दामन थाम लिया। सिंधिया और पायलट को इस बात का मलाल रहा है कि अपने-अपने राज्यों के
विधानसभा चुनाव जिताने में उनकी अहम भूमिका रही, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी दूसरों को मिल गई। पायलट तो उपमुख्यमंत्री बन गए, लेकिन सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया। लोकसभा चुनाव हारने के बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी उन्हें हाशिए पर डालने में जुट गई।
भाजपा में शामिल होते समय सिंधिया ने कहा कि कांग्रेस अब पहले जैसी पार्टी नहीं रही है। वहां रहकर जनसेवा नहीं हो सकती है। सिंधिया के साथ मध्य प्रदेश कांग्रेस के 22 विधायकों ने भी पार्टी से बगावत कर दी। इसका नतीजा यह हुआ कि लगभग 15 माह पुरानी कमलनाथ सरकार गिर गई। सिंधिया की तरह राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को भी राहुल गांधी के खास दोस्तों में गिना जाता रहा है, लेकिन वे भी इन दिनों संतुष्ट नहीं हैं। सिंधिया पहले नेता नहीं हैं, जिनके भाजपा में जाने से कांग्रेस को इस तरह का भारी नुकसान हुआ है। कुछ साल पहले असम में कांग्रेस के बड़े नेताओं में शामिल रहे हेमंत विश्वा शर्मा भी पार्टी नेतृत्व के रवैये के कारण भाजपा में शामिल हो गए थे। आज वे असम सरकार में मंत्री हैं और पूर्वोत्तर में भाजपा का एक प्रमुख चेहरा है। शर्मा तो राहुल के रवैये से नाराज थे। राहुल के करीबी लोगों में शामिल रहे बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी भी कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं। अब वे नीतीश कुमार की जदयू में शामिल हो चुके हैं। झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष रहे आईपीएस अजय कुमार भी अब आम आदमी पार्टी में जा चुके हैं। हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे अशोक तंवर भी पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए पंजाब के नेता नवजोत सिंह सिद्धू भी इन दिनों हाशिए पर हैं, वे पंजाब सरकार में अपना मंत्रीपद भी गंवा चुके हैं, जबकि उन्हें राहुल और प्रियंका, दोनों का करीबी माना जाता रहा है। महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर परेशान बताए जाते हैं। इसके अलावा, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जितेंद्र प्रसाद के पुत्र जतिन प्रसाद के भी कांग्रेस छोड़ने की अटकलें लगती रहती हैं।
इसके अलावा, कई ऐसे नेता भी हैं, जो पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं होने के कारण कांग्रेस छोड़ गये। राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक रहे भुवनेश्वर कलिता भी भाजपा का दामन थाम चुके हैं। वे जम्मू-कश्मीर को लेकर अनुच्छेद 370 पर कांग्रेस के रुख से सहमत नहीं थे। यहां तक कि अमेठी में कांग्रेस के पारिवारिक मित्र माने जाने वाले संजय सिंह भी राज्यसभा छोड़कर भाजपा के पाले में चले गए। इसी तरह कई नेता आए दिन विभिन्न मुद्दों पर पार्टी लाइन से अलग राय रखते रहे हैं। इनमें शशि थरूर, शर्मिष्ठा मुखर्जी, संदीप दीक्षित जैसे नेता खास हैं। मुंबई कांग्रेस के नेता संजय निरूपम भी पार्टी के उम्रदराज नेताओं की नीतियों पर प्रहार करते रहते हैं।
कांग्रेस नेतृत्व की अनदेखी के कारण ही पिछले वर्षों के दौरान दर्जनों नेता कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं। शरद पवार, ममता बनर्जी जगन मोहन रेड्डी का मामला तो पुराना हो चुका है, लेकिन उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा समेत दर्जनभर विधायक भी कुछ साल पहले मध्य प्रदेश की तरह भाजपा में चले गए थे। हालांकि, वहां तब के मुख्यमंत्री हरीश रावत अदालत के दखल के बाद सरकार बचाने में सफल रहे, लेकिन इससे उत्तराखंड में संगठन कमजोर हो गया और उसके बाद प्रदेश में कांग्रेस चुनाव हारती चली गई। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने तो पूरे मंत्रिमंडल के साथ भाजपा का दामन थाम लिया था। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रही रीता बहुगुणा जोशी प्रदेश सरकार में मंत्री रहने के बाद अब भाजपा सांसद हैं। उत्तराखंड कांग्रेस के अध्यक्ष रहे यशपाल आर्य अब प्रदेश भाजपा सरकार में मंत्री हैं। आंध्र प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष बी सत्यनारायण तथा त्रिपुरा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे प्रद्युत देव बर्मन भी कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं। इसी तरह, दर्जनभर नेता ऐसे हैं, जो कांग्रेसराज में मुख्यमंत्री रहे, लेकिन अब पार्टी को बाय-बाय कह चुके हैं। इनमें अजीत जोगी, विजय बहुगुणा, गिरधर गोमांगो, एसएम कृष्णा, डीडी लपांग, समीर रंजन, चर्चिल अलेमाओ शामिल हैं। यह सिलसिला थम नहीं रहा है।

फैसले लेने में देरी
कांग्रेस हाईकमान से पार्टी नेताओं की शिकायत रही है कि वह विवाद सुलझाने की बजाय मामलों को टालता रहा है। इसका एक बड़ा उदाहरण हरियाणा भी है। हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में पार्टी संगठन को दुरुस्त करने की मांग की जा रही थी, लेकिन पार्टी हाईकमान ने फैसला तब किया जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने पार्टी से बगावत करने का मन बना लिया था। विधानसभा चुनाव निकट आने पर ही पार्टी ने कुमारी सैलजा और हुड्डा को कमान सौंपी। इस पर कांग्रेस ने भाजपा को अपने दम पर बहुमत पाने से रोक दिया। माना जा रहा है कि यदि कम से कम एक साल पहले कांग्रेस नेतृत्व इस पर फैसला ले लेता तो हरियाणा में विधानसभा के नतीजे कुछ और हो सकते थे। मध्य प्रदेश में भी यदि कमलनाथ और सिंधिया के विवाद को समय रहते सुलझा लिया होता तो सरकार गिरने और पार्टी टूटने से बच सकती थी।

राजस्थान सरकार पर भी संकट
कांग्रेस हाईकमान के समय पर दखल नहीं देने से पार्टी को लगातार नुकसान हो रहा है। राहुल के निष्कि्रय होने और सोनिया के ज्यादा सक्रिय नहीं रहने से प्रदेशों के क्षत्रप भी मनमानी करने लगे हैं। यही कारण है कि कांग्रेस को एक साल के भीतर 2 सरकारें खोनी पड़ी हैं। कर्नाटक की तरह अब मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस विपक्ष में बैठेगी। कर्नाटक में कांग्रेस नेताओं के रवैये के कारण पार्टी के 16 विधायकों ने बगावत कर दी थी। इससे जेडीएस-कांग्रेस की सरकार गिर गई थी और भाजपा के बीएस येदियुरप्पा सीएम बने। गोवा में भी कांग्रेस के 10 विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया था। मध्य प्रदेश सरकार गंवाने में कांग्रेस नेतृत्व की उदासीनता और आंतरिक कलह बड़ा कारण माना जा रहा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे चुके कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ जब ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार शिकायतें कर रहे थे तो कांग्रेस नेतृत्व ने समय पर दखल नहीं दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस को एक और सरकार गंवानी पड़ी। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी में आंतरिक कलह चल रही है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच लंबे समय से खटपट चल रही है। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव में खींचतान शुरू हो गई है। पंजाब में भी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह व पूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू की पटरी नहीं जम रही। सिद्धू को लेकर अटकलें आती रहती हैं कि वे भाजपा अथवा आम आदमी पार्टी का दामन थाम सकते हैं।

बुजुर्ग बनाम युवा नेता
कांग्रेस के पुराने नेता अकसर पार्टी के प्रवक्ता रहे वरिष्ठ नेता विट्ठलराव गाडगिल की एक उक्ति को सुनाते हैं। गाडगिल कहते थे कि कांग्रेस कार्यसमिति और राष्ट्रीय पदाधिकारियों के संगठन में शामिल नेता ऐसी ट्रेन के डिब्बे में बैठे होते हैं, जो खचाखच भरा है और जहां पांव रखने की जगह नहीं होती है। वहां पहले तो मुश्किल से चढ़ा जाता है और एक बार कोई चढ़ गया तो यह दूसरों के लिए जगह बनाने की बजाय उन्हें डिब्बे में चढ़ने से रोकने लग जाता है। वास्तव में राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद पार्टी में बुजुर्ग बनाम युवा नेताओं का संघर्ष बढ़ गया है। इसमें फिलहाल बुजुर्ग अपनी बात मनवाने में सफल हो रहे हैं। राहुल के अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस के जो युवा आगे बढ़ रहे थे, उनमें से अधिकतर अब हाशिए पर हैं, इसलिए ये नेता अपना नया रास्ता तलाशने लगे हैं। कांग्रेस में उम्रदराज नेताओं के दूसरों के लिए जगह खाली नहीं करना भी पार्टी छोड़ने की एक बड़ी वजह माना जा रही है।

भाजपा ने दिग्गजों को दिखाया रास्ता
आज कांग्रेस कार्यसमिति और राष्ट्रीय पदाधिकारियों की यही स्थिति है। एक ओर भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर पार्टी के भावी नेतृत्व को लेकर अपना दृष्टिकोण साफ पर दिया है। भाजपा ने आडवाणी व जोशी को राज्यसभा नहीं भेजा। भाजपा ने 75 साल की उम्र के बाद किसी भी नेता को संगठन व सरकार में शमिल नहीं करने की लाइन खींची है। भाजपा ने 16वीं लोकसभा की स्पीकर रही सुमित्रा महाजन से लेकर लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, बीसी खंडूरी, शांता कुमार, करिया मुंडा, कलराज मिश्र, भगत सिंह कोश्यारी समेत कई नेताओं को लोकसभा का टिकट नहीं दिया था।

कांग्रेस में उम्रदराज नेता ही आगे
कांग्रेस में उम्रदराज नेताओं को संगठन और राज्यसभा में भेजने की परंपरा टूट नहीं रही। आज भी 93 साल की उम्र में मोतीलाल बोरा और 87 साल के डा. मनमोहन सिंह कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक कार्यसमिति में हैं। वास्तव में कांग्रेस कार्यसमिति और राष्ट्रीय पदाधिकारियों में से अधिकतर पिछले 2-3 दशकों से कांग्रेस के भाग्य विधाता बने हुए हैं। इनमें से अधिकतर ऐसे हैं, जो केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनने पर मंत्री बन जाते हैं, या राज्यों में सत्ता मिलने पर वे मुख्यमंत्री बन जाते हैं। जब केंद्र या राज्यों में कांग्रेस सत्ता में नहीं होती तो वे पार्टी संगठन में आ जाते हैं। वे महासचिव अथवा राज्यों के प्रभारी बन जाते हैं। कांग्रेस के अधिकतर वरिष्ठ नेता अब लोकसभा का चुनाव लड़ने की बजाय राज्यसभा की राजनीति करते हैं। कार्यसमिति में शामिल नेताओं में से सोनिया, राहुल व अधीर रंजन चौधरी को छोड़कर अधिकतर राज्यसभा में हैं। राहुल गांधी चाहते थे कि पार्टी में नये नेताओं को बढ़ावा मिले, लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाए, इसलिए अध्यक्ष पद छोड़ गए। इसके बावजूद कांग्रेस में उम्रदराज नेता अब भी पद खाली करने को तैयार नहीं दिखते। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अहमद पटेल (71) अंबिका सोनी, एके एंटनी (79) आनंद शर्मा (67) गुलाम नबी आजाद (71) मल्लिकार्जुन खड़गे (78), हरीश रावत (72), ओमन चांडी (77), लुइझिनो फलेरो (69) जैसे नेता शामिल हैं। इनमें से अहमद पटेल, अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद और मोतीलाल वोरा समेत अधिकतर नेता तो लगभग 3 दशक से कांग्रेस में किसी न किसी पद पर जमे हुए हैं। ऐसे में युवाओं के लिए कांग्रेस संगठन के दरवाजे खुलते नहीं दिख रहे।


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