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वायरस से जंग

Posted On March - 9 - 2020

अमलेंदु भूषण खां
पूरी दुनिया कोरोना वायरस के कहर से दहशत में है। अकेले चीन में तीन हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि पूरी दुनिया में अबतक एक लाख से अधिक लोगों को इसका संक्रमण हैं। भारत में अब तक 39 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। नये मामले सामने आने से केंद्र सरकार की चिंता बढ़ गई है। सरकार के लिए राहत की बात यह है कि केरल में जो तीन मामले आए थे वे सभी मरीज इलाज के बाद अपने-अपने घरों को लौट गए हैं। कोरोना को लेकर देशभर में सतर्कता बरती जा रही है। कई समारोह स्थगित कर दिए गए हैंैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से अपील की है वे हाथ न मिलाएं, बल्कि नमस्कार करें। दरअसल, कोरोना वायरस पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आने से या उसके द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तु को छूने से फैलता है। इसका अभी तक कोई इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है। वैज्ञानिक इसके स्रोत को लेकर कोई आम राय नहीं बना सके हैं, जिससे इसकी दवा खोजने में परेशानी हो रही है।  शुरू में कहा गया कि यह चमगादड़ और सांप का सूप पीने से फैला, लेकिन इस पर सहमति नहीं बनी। यह अभी भी पूरी दुनिया की चिकित्सा व्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है।
ऐसा नहीं है कि दुनिया पहली बार इस तरह के वायरस की चपेट में आई है। पिछले कुछ समय में कई खतरनाक वायरस के हमले हुए। जिनसे बड़े पैमाने पर लोगों की मौत भी हुई। पिछले तीन दशकों में इबोला, सार्स और स्वाइन फ्लू को सबसे किलर वायरस माना गया, लेकिन माना जा रहा है कि जिस तरह कोरोना वायरस फैल रहा है और बड़े पैमाने पर लोगों को चपेट में ले रहा है, यह अब तक का सबसे खतरनाक वायरस है।
स्कूल ऑफ हाईजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन, लंदन के अनुसार कोरोना वायरस इबोला, सार्स और स्वाइन फ्लू की तुलना में ज्यादा देशों में फैल चुका है। इसलिए इसे तीन दशक का सबसे खतरनाक वायरस माना जा रहा हैै। यह अब तक 85 से ज्यादा देशों को अपनी चपेट में ले चुका है। भारत, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान, वियतनाम और सिंगापुर, इटली व अन्य यूरोपीय देशों में भी इससे पीड़ित मरीज मिले हैं। सबसे पहले कोरोना वायरस से पीड़ित मरीज चीन के शहर वुहान में दिसंबर में मिला था। हालांकि, उस समय चीन ने उससे संबंधित खबरों को दबाने की कोशिश की, लेकिन जनवरी आते-आते यह बेकाबू हो गया था। जनवरी में इसकी पहचान कोरोना वायरस फैमिली के नये घातक सदस्य के तौर पर की गई। इसके साथ ये खबरें भी आने लगीं कि इससे पीड़ित लोग बड़े पैमाने पर बढ़ रहे हैं। उसी गति से मरने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। अब तक दुनियाभर में करीब एक लाख लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि चिंताजनक बात यह है कि जिन लोगों को यह बीमारी हो रही है, उनमें इसके संकेत काफी देर से दिखते हैं। उन्हें खुद नहीं मालूम होता कि उन्हें यह बीमारी हो गयी है।

चीन के फूड मार्केट से फैल रही नयी बीमारियां
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन से नयी-नयी बीमारियों के फैलने की एक वजह वहां का फूड मार्केट है। खासकर वहां के मांस के मार्केट नयी बीमारियों की बजह बनते हैं। चीन में कई तरह के जानवरों के मांस मिलते हैं। चीन के लोग सांप और छिपकली से लेकर सीफूड के नाम पर कई तरह के समुद्री जीवों का मांस खाते हैं या सूप पीते हैं। चीन में यह सब खुलेआम मिलता है। इससे कई नयी और संक्रामक बीमारियां वहां के लोगों को होती हैं। हाल के वर्षों में ऐसी कई बीमारियां सामने आई हैं, जिसके वायरस जानवरों के मांस से इनसान के शरीर में आए और फिर इनका संक्रमण तेजी से दुनियाभर में फैला। सार्स और स्वाइन फ्लू ऐसी ही बीमारियां हैं।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जानवरों के मांस से फैले वायरस की वजह से दुनियाभर के करोड़ों लोग बीमार पड़ रहे हैं। इससे हर साल लाखों मौतें हो रही हैं। संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों में कुल 60 फीसदी बीमारियां जानवरों के जरिए इनसान में फैल रही हैं। पिछले तीन दशक में 30 नयी संक्रामक बीमारियों का पता चला है। इनमें से 75 फीसदी संक्रामक बीमारियों के वायरस जानवरों से इनसान में आए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मीट मार्केट में जानवरों के मांस और खून का संपर्क मानव शरीर से होता है और यह वायरस के फैलने की सबसे बड़ी वजह बनती है। हाईजीन में थोड़ी भी चूक वायरस के फैलने में मददगार साबित होती है। ये कहीं भी हो सकता है। इबोला वायरस अफ्रीका से पूरी दुनिया में फैला। इबोला के वायरस चिंपाजी से मानव शरीर में आए थे। अफ्रीका में चिंपाजी को मारकर खाया जाता है और इससे ही यह वायरस इनसानों में फैला। बाद में दुनियाभर में इसका असर देखा गया। दुनिया में मांस का कारोबार बढ़ रहा है। जंगल कम हो रहे हैं और जानवरों की फार्मिंग बढ़ रही है। कई बार जंगली जानवरों के वायरस फार्मिंग वाले जानवरों में आ जाते हैं। वहां से ये वायरस आदमी के शरीर में पहुंच जाते हैं।
चीन की आबादी करीब 140 करोड़ है। दुनियाभर का करीब 50 फीसदी पशुधन चीन के पास है। चीन का दुनिया के बाकी देशों के साथ संपर्क भी ज्यादा है। चीन का एयर नेटवर्क मजबूत है। इसकी वजह से चीन से संक्रमण तेजी से दुनिया के बाकी हिस्सों में फैल जाता है।
पहले भी मचा है दुनिया में कोहराम
इबोला
कोरोना के कहर को समझने के लिए इससे पहले आये वायरसों के प्रभाव को भी देखना होगा। 2014 में जब दुनियाभर में इबोला महामारी ने दस्तक दी तो इसने 26800 लोगों को प्रभावित किया था। इनमें से 40 फीसदी लोगों की मौत हो गई थी। हालांकि इसका असर भौगोलिक तौर पर सीमित था। यह वायरस आमतौर पर पश्चिमी अफ्रीका के तीन देशों में ही फैला था।

स्वाइन फ्लू
इबोला से पहले स्वाइन फ्लू ने 2009 में पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया था। हालांकि, उससे बहुत कम लोग प्रभावित हुए थे, लेकिन यह लगभग सभी देशों तक पहुंच गया था। स्वाइन फ्लू से करीब 6 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे। माना जाता है कि इससे लगभग 2 लाख लोगों की मौतें हुईं। इससे विश्व की अर्थव्यवस्था पर भी काफी विपरीत असर पड़ा था।

सार्स
कोरोना वायरस की तरह सार्स वायरस भी साल 2003 के दौरान चीन से फैला था। इसे करीब 1500 से 2000 लोगों की जान गई थी। माना गया था कि वहां यह वायरस किसी जानवर या पक्षियों से मनुष्यों में पहुंचा और फिर दुनियाभर में फैल गया। यह भी चीन से शुरू होकर कई देशों में फैल गया था। इससे पूरी दुनिया में 4,000 करोड़ डॉलर कारोबार चौपट हुआ था।

एविन इन्फ्लूएंजा
एविन इन्फ्लूएंजा यानी बर्ड फ्लू के विषाणु मनुष्य को प्रभावित करते हंै। कई बार गंभीर रूप से पीड़ित होने पर मौत भी हो जाती है। इससे पीड़ित होने पर श्वसन प्रणाली प्रभावित होती है। देश में अब तक 49 बार अलग-अलग राज्यों में 225 स्थानों पर यह बीमारी फैली है, जिसमें करीब 83.5 लाख पक्षियों को मारा गया है। देश में पहली बार 2017 में दिल्ली, मध्य प्रदेश , केरल , कर्नाटक , पंजाब और हरियाणा में प्रवासी पक्षियों एवं कुक्कुट में एक नया वायरस एच5एन8 की सूचना मिली थी।
कोरोना से बचने के लिए यह करें
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी की एडवाइजरी के अनुसार, कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए ये उपाय अपनाये
जा सकते हैं।
0 अपने हाथों को बार-बार साबुन-पानी से धोएं या हैंड सैनिटाइजर से साफ करें।
0 अपनी आंख, नाक, मुंह और चेहरे को अपने हाथ से बार-बार न छुएं
0 किसी से भी हाथ मिलाने से बचें
0 अगर आपको खांसी, बुखार या सांस लेने में कठिनाई है तो तुरंत डाक्टर की सलाह लें
0 भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचें
दुनियाभर की अर्थव्यवस्था पर असर
वर्ष 2003 में विश्व अर्थव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी केवल 4 फीसदी थी। विश्व अर्थव्यवस्था तब 2.9 फीसद की रफ्तार से बढ़ रही थी, लेकिन चीन की आर्थिक विकास दर 10 फीसदी थी। इस समय कोरोना का कहर सार्स वायरस से ज्यादा है और विश्व अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव भी बड़ा हैै। मौजूदा समय में दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी वर्ष 2003 के मुकाबले 4 गुना ज्यादा यानी 16 फीसदी है। ऐसे में कोरोना के कहर से चीन की आर्थिक विकास दर एक से सवा फीसदी तक कम होने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। इसके असर से विश्व अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी 0.5 फीसद तक घटने का अंदेशा है। भारत सरकार भी अर्थव्यवस्था पर कोरोना के असर को लेकर सचेत है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि इस मामले में विभिन्न स्तर पर विकल्पों को तलाशा जा रहा है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और चीन के साथ 150 अरब डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का कारोबार करने वाला भारत इससे अछूता नहीं रहेगा। हालांकि, अर्थशास्त्री अभी भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर पर कोरोना के असर से इनकार कर रहे हैं। रिसर्च एवं रेटिंग एजेंसी मूडीज एनालिटिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर में कोरोना की वजह से इस साल 0.4 फीसदी की गिरावट हो सकती है। पहले, वर्ष 2020 के लिए वैश्विक विकास दर में 2.8 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया था, जिसे कोरोना के बाद घटाकर 2.4 फीसदी कर दिया गया है।

मुरादाबाद के एक स्कूल में कोरोना से बचने के लिए मास्क पहनकर परीक्षा देने पहुंचे छात्र।

भारत में महंगी हो जाएंगी दवाइयां
भारत में कोरोना ने दूसरा ही संकट खड़ा कर दिया है। यहां जीवनरक्षक दवाओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, क्योंकि दवा बनाने में प्रयोग होने वाला कच्चा माल चीन से आयात होता है। चीन में फैक्टरियां बंद पड़ी हैं, बंदरगाह ठप हैं और श्रमिक खौफ में हैं। ऐसे में न केवल फार्मा, बल्कि चीन से सस्ते आयात पर टिके तमाम उद्योगों में अफरा-तफरी का माहौल है। आलम यह है कि ‘एंटी बायोटिक, एंटी एलर्जिक और डायबिटीज जैसी दवाओं को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल पिछले एक महीने में दो से तीन गुना तक महंगा हो गया है। दर्द निवारक दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले पैरासीटामॉल का भाव 270 रु. किलो से बढ़कर 600 रुपये के पार पहुंच गया है। जाहिर है, कच्चे माल के दाम में अप्रत्याशित तेजी से दवाओं के दाम बढ़ेंगे। अंदेशा है कि कच्चे माल की कीमत अगर बिक्री मूल्य के पास आ पहुंची तो छोटी कंपनियों का तो बाजार में टिक पाना ही मुश्किल हो जाएगा। अगर कोरोना का असर लंबा खिंचा तो उन्हें भी नये बाजार तलाशने होंगे, जो महंगे होंगे। भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रभाव होंगे। लेकिन भारतीय विकास दर के प्रभावित होने के कयास लगाना जल्दबाजी होगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (फियो) के सीईओ एवं डीजी अजय सहाय का कहना है कि कच्चे माल की कमी और उत्पादन लागत बढ़ने की सूरत में आयात बिल भी बढ़ सकता है।


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