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वक्त की जरूरत के बावजूद बाकी हैं सवाल

Posted On March - 26 - 2020

सोशल डिस्टेंसिंग

अभिषेक कुमार सिंह

इंसानी सभ्यता ने सबसे मुश्किल वक्त महामारियों के वक्त ही देखा है। पुराने वक्त में भी फ्लू, चेचक, हैजा, तपेदिक, प्लेग जैसे रोग बड़ी आबादी के सफाए का सबब बने हैं। इनमें भी ज्यादा मुश्किलें तब आईं, जब स्पेनिश फ्लू, बर्ड और स्वाइन फ्लू, सार्स, मर्स, इबोला, जीका, निपाह और अब कोरोना जैसे विषाणुओं से पैदा हुए संकट ने बड़ा खतरा पैदा कर डाला। हाल के तीन-चार दशकों में ही 30 से ज्यादा विषाणुजनित संक्रामक बीमारियों ने जितने बड़े संकट हमारे सामने पैदा किए हैं, औद्योगिकीकरण के बाद के करीब डेढ़ सौ वर्षों में वैसे हालात कम ही बने हैं। कोरोना वायरस को ही लें, इसने पूरी दुनिया में अभूतपूर्व लॉकडाउन की स्थितियां पैदा कर दी हैं।
हालात संभलने तक ताकीद है कि लोग न तो यात्राएं करें और न ही भीड़ का हिस्सा बनें। जहां तक मुमकिन हो, लोग सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरियां बरतें ताकि किसी भी संक्रमित व्यक्ति से कोरोना का वायरस दूसरे व्यक्ति तक नहीं पहुंचे। विडंबना देखिये कि इंसानियत का सारा कामकाज तो मेलमिलाप के जरिये ही संपन्न होता है। मनुष्यता एक-दूजे से मेलमिलाप के जरिये यहां तक पहुंची है और जिसका इसी मेलजोल से ही विस्तार हुआ है, उसे अब एक बीमारी के डर से दूरी बरतने की सलाह दी जा रही है।
क्या कोरोना के प्रकोप से बचने का यही इकलौता तरीका बचा है कि लोग हर किस्म का संपर्क छोड़ दें? जो लोग कोरोना से संक्रमित हैं, उन्हें तो क्वारंटाइन यानी अलग-थलग किया ही जा रहा है, पर बाकी लोगों को सलाह दी गई है कि जब कोरोना का प्रकोप कुछ थम नहीं जाता, वे सबसे दूर रहें।
सोशल दूरी का तात्पर्य आम मानव व्यवहारों में उस तब्दीली से जुड़ा है, जिसमें वह न एक साथ कहीं जमा हो और न दूसरों से सीधे संपर्क में आए। कहा जा रहा है कि एक व्यक्ति के रूप में, आप अन्य लोगों के साथ संपर्क की दर को कम करके संक्रमण फैलने का जोखिम कम कर सकते हैं। सार्वजनिक स्थानों, सामाजिक समारोहों से बचना, विशेष रूप से बड़ी संख्या में लोगों या भीड़ के साथ होने वाली घटनाओं से बचना इसी का एक पहलू है। सोशल डिस्टेंसिंग का दूसरा पहलू यह है कि जहां तक संभव हो घर से काम करें, दफ्तर में होने वाली बैठकों में वीडियो कॉल के जरिये शामिल हों और सार्वजनिक परिवहन जैसे कि बस-मेट्रो और टैक्सियों का इस्तेमाल करने से बचें। भारत में ही तमाम कंपनियां अपने कर्मचारियों से घर से काम करने को कह रही हैं। पर घर से काम करने का यह अर्थ नहीं है कि लोग बाहर से खाना ऑर्डर करके मंगवाएं। बल्कि इस मामले में भी सलाह दी गई है कि कोरियर से लेकर ऑनलाइन ऑर्डर किए गए सामान को लेकर आ रहे डिलीवरी ब्वॉय के सीधे संपर्क से बचा जाए क्योंकि वह कई घरों से होते हुए आप तक पहुंचता है। अगर घर में पालतू पशु हैं तो उनसे भी दूरी बनानी पड़ेगी।
यहां कुछ सवाल भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देशों के संदर्भ में उठते हैं। भारत में जन-घनत्व भी बहुत ज्यादा है। भारत में यह औसत 455 है, जो चीन के 148 के औसत से कई गुना ज्यादा है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक दिल्ली के गांधीनगर इलाके में प्रति वर्ग किलोमीटर में 89,185 लोग मौजूद थे। ये आंकड़े विश्व बैंक के हैं। जहां रेल, बस में ही नहीं, बल्कि बाजारों और छूट की घोषणा वाले दिनों में शॉपिंग मॉल्स में सिर से सिर टकराते हों, वहां सोशल डिस्टेंसिंग के कायदे को आखिर कितने दिनों तक लागू किया जा सकता है। पर इससे ज्यादा चिंता हमारे व्यवहार की है। शादी, मुंडन, मृत्युभोज के सदियों से चले आ रहे रिवाजों के बाद शहरों में बर्थडे से लेकर प्रमोशन पार्टियों का नया सिलसिला चला है। गांव-देहात की शादियों में हाथ धोने को साबुन मिल जाना बड़ी नियामत है, हैंड सेनेटाइजर तो दूर की बात है।
भारत में कोरोना से कुल जमा मौतों का आंकड़ा साबित करता है कि हमारी सरकार और प्रशासन ने सतर्कता बरती है। हालांकि सोशल डिस्टेंसिंग के इन उपायों का एक अर्थ मनुष्य होने की कसौटियों पर खरे उतरने वाली परीक्षा से भी जुड़ा है। नि:संदेह हम भीड़ का हिस्सा बेशक न बनें, पर मदद के लिए हमें कोई पुकारे तो उसके दरवाजे पर पहुंचने में वक्त न गंवाएं। वुहान के सबसे बड़े अस्पताल के चिकित्सकों का हाल में वायरल हुआ वह वीडियो बहुत प्रासंगिक है, जिसमें वे अस्पताल से कोरोना के सारे मरीजों के स्वस्थ होकर चले जाने के बाद चेहरे से अपने मास्क हटाकर मुस्कुराते हुए नजर आ रहे हैं। यानी जब तक आपदा थी, महामारी के फैल जाने का खतरा और तमाम आशंकाएं हैं, डिस्टेंसिंग का जरूरी कायदा प्राणप्रण से निभाया गया। और जब मरीजों को रोगमुक्त कर सकुशल विदा किया तो वे सब एक-दूसरे के इतना करीब थे, जितना पहले कभी नहीं हुए थे।


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