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यस, बस?

Posted On March - 16 - 2020

आलोक पुराणिक
सरकार ने यस बैंक के पुनर्गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। इसके साथ ही बैंक पर लगी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रोक 18 मार्च को हट जाएगी। आरबीआई ने 5 मार्च से यस बैंक को मोर्टेरियम या अधिस्थगन में रखा था। मूल घोषणा में यह अधिस्थगन 3 अप्रैल 2020 तक के लिए था। इस अधिस्थगन के तहत 50 हजार रुपये से अधिक की राशि निकालने पर रोक लगायी गयी, अपवाद स्वरूप कुछ स्थितियों में 50 हजार रुपये से ज्यादा की राशि निकालने जाने की इजाजत भी दी गयी है। एसबीआई के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर प्रशांत कुमार को यस बैंक का प्रशासक नियुक्त किया गया था और इसके निदेशक मंडल को हटा दिया गया था। सितंबर 2019 में यस बैंक में करीब 2 लाख 9 हजार करोड़ रुपये जमा थे। यानी करीब दो महीनों के जीएसटी संग्रह के बराबर की रकम यस बैंक के पास जमा थी।
यस बैंक कोई छोटा-मोटा बैंक नहीं है। इसकी वेबसाइट के मुताबिक ही इसकी देशभर में 1000 शाखाएं हैं और 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 1800 एटीएम हैं। यस बैंक को हम ‘टू बिग टु फेल’ कह सकते हैं। यानी बहुत बड़ा, इतना बड़ा कि सरकार और रिजर्व बैंक इसे फेल नहीं होने दे सकता। अब कहा जा रहा है कि सारी गड़बड़ियों की जिम्मेदारी इस बैंक के प्रमोटर राणा कपूर की है। व्यक्ति बनाम प्रक्रिया का सवाल महत्वपूर्ण है। बैंकों में कर्ज देने की व्यवस्थाओं की सम्यक प्रक्रिया होनी चहिए, कर्ज देना किसी एक व्यक्ति के विवेक, पसंद या नापसंदगी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की है। पूरा यस बैंक एक ही व्यक्ति के इशारे पर चलता रहा। सम्यक प्रक्रियाएं और उचित व्यवस्थाएं नहीं बनायी गयीं। ऐसे में यह किसकी जिम्मेदारी मानी जाये, बैंक के प्रबंध बोर्ड की या रिजर्व बैंक की। कहीं न कहीं जिम्मेदारी सुनिश्चित होनी ही चाहिए।
बैंकिंग जगत में अफवाहों का बाजार गर्म है। यस बैंक संकट के बाद आऱबीएल बैंक के भी संकट से घिरे होने की बात सामने आ रही है। एक बात तो साफतौर पर समझ ली जानी चाहिए कि भारत में बैंकिंग जगत के संकट में घिरने के बावजूद आम डिपाजिटर का पैसा आमतौर पर नहीं डूबा, कुछ असुविधा भले ही हो। आरबीआई इस तरह के इंतजाम कर देता है कि डिपाजिटर का पैसा सुरक्षित रहता है। यस बैंक से पहले पीएमसी बैंक को लेकर भी इस तरह के मसले खड़े हुए थे। लेकिन मामला सिर्फ डिपाजिटर के पैसे की सुरक्षा के नहीं है। मामला यह है कि इस तरह के कर्ज लगातार दिए कैसे जाते हैं, जिनसे किसी बैंक पर संकट खड़ा हो जाता है। बैंकों के डूबत कर्ज किसी भी बैंक के अस्तित्व पर संकट डालते हैं, समग्र अर्थव्यवस्था पर संकट डालते हैं।
बात भरोसे की
अब यह साफ हो गया है कि यस बैंक में एबीआई की भागीदारी होगी। स्टेट बैंक करीब 10 हजार करोड़ रुपये तक की पूंजी का निवेश इस बैंक में कर सकता है। यानी स्टेट बैंक की तरफ से पूंजी और साख का लाभ यस बैंक को मिलेगा। यह बैंक अलग रहेगा, लेकिन स्टेट बैंक इसमें महत्वपूर्ण शेयरधारक की तरह होगा, तो इसकी खोयी साख एक हद तक वापस आने की उम्मीद है।
बहुत बुनियादी नीतिगत सवाल यह है कि एक तरफ तो आमतौर पर सार्वजनिक बैंकों को कोसा जाता है कि उनका हाल खऱाब है और दूसरी तरफ जब निजी क्षेत्र का कोई बैंक फंसता है तो सार्वजनिक बैंक से उम्मीद से की जाती है वह उसका हाल सुधारेंगे। एक वक्त ओरियंटल बैंक आफ कामर्स सरकारी बैंक में ग्लोबल ट्रस्ट बैंक को मिला दिया गया था। अब एसबीआई से उम्मीद है कि वह यस बैंक का हाल सुधारेगा। क्या सरकारी बैंकों का जिम्मा निजी कूड़ा उठाने का ही है? सितंबर 2019 में यस बैंक के डूबता कर्ज या एनपीए कुल दिये कर्जों का 7.4 प्रतिशत था। यह स्तर बहुत ज्यादा है। स्टेट बैंक के मामले मे यह स्तर दिसंबर 2019 में 7 प्रतिशत था। एक्सिस बैंक के मामले में यह स्तर दिसंबर 2019 में 5.6 प्रतिशत था। पंजाब नेशनल बैंक में यह स्तर दिसंबर 2019 में 18 प्रतिशत था। बैंक आफ बड़ौदा में यह स्तर दिसंबर 2019 में 11.74 प्रतिशत था। निजी क्षेत्र के इंडसबैंक में यह स्तर 2.2 प्रतिशत था। एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े बैंक के मामले में यह स्तर सितंबर 2029 में 1.38 प्रतिशत था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि एचडीएफसी बैंक के कर्ज देने की गुणवत्ता का स्तर खासा ऊंचा है। एचडीएफसी बैंक द्वारा दिये कर्जे डूबते नहीं हैं, ऐसी बात आमतौर पर मानी जा सकती है, आंकड़े बताते हैं। किस बैंक के कर्ज ज्यादा डूबते हैं, इस बात का असर उस बैंक के कुल मूल्य पर पड़ता है। डूबत कर्ज के ट्रैक रिकार्ड से 11 मार्च, 2020 के आंकड़ों के हिसाब से एचडीएफसी बैंक का समग्र बाजार मूल्य 6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा था, जबकि डूबत कर्जों के मामले में टाॅप पर चलने वाले पीएनबी का समग्र बाजार मूल्य 26 हजार करोड़ और एसबीआई का समग्र बाजार मूल्य 2,18,831 करोड़ रुपये था। जो बैंक बाजार में जितनी रकम कर्ज में डुबायेगा, उसके डूबने की आशंका उतनी ही ज्यादा बन जाती है। कोई बैंक डूबत कर्जों में बहुत ज्यादा रकम डुबाये तो उसके दो असर साफ होते हैं कि बैंकों के पास पूंजी की कमी हो जाती है कि कर्ज दे पाये। खराब कारोबारियों को कर्ज देने के बाद इतनी पूंजी नहीं बचती कि अच्छे कारोबारों के लिए कर्ज दिये जा सकें। अर्थव्यवस्था में पूंजी प्रवाह ठप हो जाता है और इसके चलते कारोबारी गतिविधियां ठप हो जाती हैं। एक असर यह हो जाता है कि पूंजी डूबती है तो उस डूबी हुई पूंजी को बचाने के लिए जो उपक्रम किये जाते हैं, उनके चलते संसाधनों को कहीं और से जुटाना होता है। संसाधन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया लाकर दे या कोई बैंक लाकर दे, ये उन्हीं संसाधनों में से जाने होते हैं, जो बतौर कर्ज कहीं और दिये जा सकते थे। जैसे एसबीआई अगर 10 हजार करोड़ रुपये यस बैंक में लगा रहा है, तो यह पैसा एसबीआई के संसाधनों से आयेंगे, जिनका प्रयोग स्टेट बैंक कर्ज वितरण में या किसी और काम के लिए कर सकता था। डूबत कर्ज ऐसा बोझ बन जाता है, जिनका असर सिर्फ बैंकिंग जगत पर ही नहीं, समग्र अर्थव्यवस्था में महसूस किया जाता है।

मुंबई में मनी लांड्रिंग के मामले में राणा कपूर को अदालत में पेश्ा करने ले जाते अधिकारी।

उत्साह और असावधानी
बैंकों द्वारा दिये कर्जों के संदर्भ में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मोटी-मोटी तीन बातें कहीं थी। पहली, बैंक अति आशावादी रुख दिखाते हैं। दूसरी, बड़ा कर्ज देने में बहुत असावधानी बरती जाती है। तीसरी, कर्जों के टारगेट पूरा करने के लिए जरूरी सावधानियों को ताक पर रख दिया जाता है। कई बैंकों ने बहुत ही आशावादी रुख दिखाया और उम्मीद पर उम्मीद करते गये कि दिया गया पैसा वापस आयेगा। इसलिए डूबती कंपनियों को भी कर्ज दिये गये। छोटी-छोटी कंपनियों को बड़े-बड़े कर्ज दिये गये। जाहिर है ऐसा होने की कुछ वजहें होंगी। सरकारी बैंकों पर राजनीतिक दबाव काम करते हैं। 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण में एक समस्या का जिक्र था-ट्विन बैलेंस शीट समस्या यानी कंपनी का हिसाब किताब खराब होता है फिर उसे कर्ज देने वाले बैंक का हिसाब खराब हो जाता है। इस तरह से देर सबेर दोनों बैलेंसशीटों के हिसाब खऱाब हो जाते हैं, कारोबारों के भी और बैंकों के भी।
नयी चुनौतियां
कई बैंकों के संकट की वजह इन कारोबारी समूहों को दिये गये कर्ज में तलाशी जा सकती है। यस बैंक के डूबने की एक वजह यह थी कि अनिल अंबानी समूह की कंपनियों को भारी कर्ज दिये गये थे। कुल मिलाकर डूबत कर्ज का मसला अर्थव्यवस्था में लगातार उठता रहेगा, क्योंकि राणा कपूर जैसे बैंकर और अनिल अंबानी जैसे उद्योगपति हमेशा रहेंगे। इनके बोझ आखिर में करदाता को ही उठाने पड़ेंगे, जिसकी रकम उस घाटे की भरपाई में लगेगी, जो ये लोग बैंकिंग जगत को देते हैं।
एक बड़ा सवाल यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि रिजर्व बैंक की माॅनिटरिंग, निगरानी व्यवस्थाएं पुराने वक्त की हैं और ये नये प्रमोटर नये तरह से खेल कर रहे हैं और समय रहते पकड़ में नहीं आ रहे। रिजर्व बैंक के स्तर पर कुछ सुधार या आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत अभी महसूस होनी चाहिए। यस बैंक प्रकरण के बाद यह बात और साफ तौर पर रेखांकित की जानी चाहिए।
कारपोरेट प्रशासन
एक बहुत बड़ा सवाल कारपोरेट गवर्नेंस या कारपोरेट प्रशासन को लेकर उठता है। सितंबर, 2019 में यस बैंक ने एक इनवेस्टर प्रेजेंटेशन पेश किया था, यह 12 मार्च 2020 को भी यस बैंक की वेबसाइट पर था। इसमें लिखा है कि 11 इमीनेंट पर्सनेल्टीज अलग-अलग बैकग्राउंड की यस बैंक के निदेशक मंडल में हैं। दो नाम इनमें बहुत महत्वपूर्ण हैं, एक उत्तम प्रकाश अग्रवाल का। वे इंस्टीट्यूट आफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व अध्यक्ष हैं और 30 साल का टैक्सेशन, फाइनेंस का उन्हें अनुभव है। दूसरा नाम है आर गांधी का, जो आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर हैं। ये लोग यस बैंक के बोर्ड में रहे और फिर भी यस बैंक के साथ इतने कांड हो गये। इससे सवाल उठता है कि निदेशक मंडल की भूमिका किसी बैंक को चलाने में कितनी और किस हद तक कारगर होती है। एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि रिजर्व बैंक ने यस बैंक को लेकर कदम उठाया तो ईडी को भी कई पेंच दिखायी दिए। फिर सीबीआई ने भी कार्रवाई शुरू की। फिर कारपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को भी यस बैंक में समस्याएं दिखने लगीं। एक साथ सबको राणा कपूर में 50 खोट दिखायी पड़ने लगे। कहीं न कहीं कार्रवाई में आलस्य कहें या क्या कहें कि सब कुछ एक साथ दिखायी दे गया। पहले सब कुछ ठीक ही चल रहा था। जैसे पहले क्यों सामूहिक अंधकार छाया हुआ था। इस तरह के सामूहिक अंधेरे के गहरे निहितार्थ हैं।
कर्ज के घर
क्रेडिट सुईस बैंक ने अक्तूबर 2015 में जारी एक रिपोर्ट में कुछ कारपोरेट घरानों को कर्ज के घर की संज्ञा दी हैं। ये कारपोरेट
घराने हैं…

  • लांको समूह
  • जेपी समूह
  • जीएमआर समूह
  • वीडियोकोन समूह
  • जीवीके समूह
  • इस्सार समूह
  • अडानी समूह
  • रिलायंस अनिल अंबानी समूह
  • जिंदल स्टील वर्क्स समूह
  • वेदांता समूह

यस बैंक के मामले में इनमें शामिल नामों में से रिलायंस अनिल अंबानी समूह का नाम आया है। समझने की बात यह है कि 5 साल पहले चेतावनी या संकेत दिये गये थे। लेकिन यस बैंक की ओर से इन संकेतों को ग्रहण नहीं किया, बल्कि कुछ और संदिग्ध कंपनियों को कर्ज दिये। इससे इस बैंक के शीर्ष प्रबंधन पर ही सवालिया निशान नहीं लगता, बल्कि वे तमाम रेटिंग एजेंसियों भी सवालों के घेरे में आती हैं, जो यस बैंक को ठीक-ठाक रेटिंग देती रहीं। रेटिंग एजेंसियों की जिम्मेदारी कैसे तय हो। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएलएफएस) में रकम डूबी थी, तब सेबी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को डांटा था, लेकिन यस बैंक डूबता गया और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को पता ही नहीं चला। रेटिंग एजेंसियों को जिम्मेदार कैसे बनाया जाये, यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है।
मूल्यांकन की समस्या
समझने की जरूरत यह है कि एनपीए पैदा कैसे हुए। बैंक किसी कंपनी को, किसी कारोबार को कर्ज देते हैं तो एक हद तक संभव है कि बैंकों का मूल्यांकन गलत हो जाये। जैसे बहुत संभव है कि विजय माल्या की हवाई जहाज कंपनी को कर्ज देते वक्त बैंकों को लगा है कि हवाई उड़ानों का कारोबार भारत में बहुत शानदार कारोबार है। इसमें मुनाफे की पर्याप्त संभावनाएं उन्हें दिखायी पड़ सकती थीं। लेकिन यह कारोबार उतना मुनाफे का साबित नहीं हुआ, बल्कि रकम डुबोने वाला साबित हुआ। रकम डुबोने वाला कर्ज अगर गलत मूल्यांकन की वजह से दिया गया है, तो इसमें बेईमानी की बात नहीं है। बड़े से बड़े मूल्यांकनकर्ता का मूल्यांकन गलत हो सकता है। बड़े से बड़े निवेशक का आकलन गलत हो सकता है। विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस में सरकारी औऱ निजी दोनों तरह के बैंकों की रकम डूबी थी। तो यह कहना भी ठीक नहीं है कि हमेशा निजी बैंकों का आकलन सही ही होता है। लेकिन देखने की बात यह है कि निजी बैंक डूबत कर्जों के साथ आमतौर वह सलूक करते हैं, जो एक कारोबारी को करना चाहिए। उनसे छुटकारा पाकर, उन्हें अपने हिसाब से हटाकर नये कारोबार पर फोकस करने का। ऐसा रवैया सरकारी बैंक नहीं दिखा पाते। यस बैंक उन अपवाद स्वरूप निजी बैंकों में है, जिसके काम काज का रंग-ढंग कई मामलों मे सरकारी टाइप रहा। इसका मतलब यह हुआ कि भ्रष्ट काहिली सिर्फ सरकारी बैंकों की मिल्कियत नहीं है, निजी बैंकों की बपौती हो सकती है।


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