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बैंकों की साख को आंच

Posted On March - 23 - 2020

जन संसद
बाड़ खा गई खेत
हाल ही में यस बैंक में जो हुआ वह जगजाहिर है। जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो उस खेत को कोई भी नहीं बचा सकता। बैंक के पैसे का गलत उपयोग किया गया। यस बैंक के संस्थापक राणा कपूर ने बैंक के पैसे का जमकर गलत उपयोग किया। ऐसा करने से बैंक की साख को बट्टा लग गया और पूंजी की कमी की वजह से आरबीआई को बैंक को मोराटोरियम में डालना पड़ा। आरबीआई को बैंकों में घोटाले रोकने, बैंकों का पैसा डकारने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि सभी बैंकों की साख बाजार में बनी रहे।
सुनील महला, पटियाला, पंजाब
निगरानी तंत्र बने
बैंक चाहे सरकारी हो या निजी, नियमों में सख्ती, सही निगरानी, कुशल प्रबंधन और पारदर्शिता ही समाधान है। विडम्बना देखिए कि यस बैंक की हालत बुरे ऋणों की बंदरबांट की वजह से हुई है। सितंबर, 2019 तक 2 लाख करोड़ से अधिक की बैंक की जमापूंजी अचानक चालू वित्त वर्ष में 12 हजार करोड़ का नुकसान उठाती है तो शीर्ष प्रबंधन और आरबीआई कहां थे? लापरवाही और चेहरा देखकर डिफाॅल्टर्स को भी ग्रीन सिग्नल देना बैंक को ले डूबा। बैंकिंग बैलेंसशीट में और न ही एनपीए में डूबे ऋण को दर्शाया गया, जो एक सुनियोजित साजिश और मिलीभगत को दर्शाता है। ऐसे में सरकारी बैंकों के निजीकरण का जो सवाल उठ रहा है क्या वह न्यायसंगत है? खैर, पारदर्शिता एवं निगरानी स्थापित हो।
हर्षवर्द्धन, कदमकुआं, पटना, बिहार
कठोर कार्रवाई हो
कार्पोरेट जगत के कुछ लोग सार्वजनिक बैंकों के हजारों-करो‍ड़ रुपये कर्ज चुकाए बिना विदेश भाग गये। कुछ ने अपने को दिवालिया घोषित कर बैंकों को चूना लगा दिया। बैंकों में हो रही धोखाधड़ी की घटनाएं भयावह हैं। सार्वजनिक क्षेत्रों के बैकों में एनपीए 10 प्रतिशत से ऊपर जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। बैंकर्ज को कंपनी व व्यक्ति की फेस वैल्यू के बजाय ठोस प्रतिभूतियों पर कर्ज देना चाहिए। सरकारों को भी वोट केंद्रित कर्ज योजनाओं से परहेज करने की जरूरत होगी। दुरुपयोग करने वालों चाहे बैंकर्ज हों या कर्ज लेने वाले हों, के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
रूप सिंह नेगी, सोलन, हि.प्र.
बैंक जिम्मेदार
बैंकों की गिरती साख के लिए बैंक स्वयं जिम्मेदार हैं। आज हम जिसको रुपये की शक्ल में पहचानते हैं, दरअसल वह एक कागज सेे ज्यादा कुछ नहीं है। बैंकों ने 1933 में गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म कराकर देश में रुपये की कीमतें शून्य कर दी हैं। लोग भ्रम में रहते हैं कि बैंक में जमा पैसा सुरक्षित है। दरअसल, नोट पर छपा है कि मैं धारक को रुपया अदा करने का वचन देता हूं। आप इस नोट रूपी वादे से बैंक के डूबने, दिवालिया होने की स्थिति में जमीन, अनाज, सोना-चांदी के रूप में अपना पैसा मांगना चाहें तो बैंक 95 प्रतिशत हाथ खड़े कर देंगे। यानी बैंकों की अर्थव्यवस्था सिर्फ भ्रम, वादों पर चल रही है, जिसकी कीमत शून्य के बराबर है।
राजेश कुमार कनौजिया, नई दिल्ली
सख्ती जरूरी
बीते समय में बड़े कारोबारी व संचालक बैंकों से किसी न किसी प्रकार से आमजनों के पैसे लेकर चंपत हो जाते हैं। इनकी खामियां आम जनता को भुगतनी पड़ती हैं। सरकार को इस तरह से बैंक को चूना लगाने वालों पर अंकुश लगाना चाहिए। वित्तमंत्री को भी इसके लिए जवाबदेही तय करनी चाहिए। शंका होने पर किसी को विदेश जाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। इससे सरकार की सख्त नीति का बोध होगा। बैंक और वित्त मंत्रालय को विश्वास को बनाये रखते हुए जनता को अपने ही पैसों के लिए जद्दोजहद करने से उबारना चाहिए।
मनकेश्वर महाराज ‘भट्ट’, मधेपुरा, बिहार
जिम्मेदारी तय हो
जिस देश में भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहराई तक जा चुकी हैं उस देश के बैंकों में घोटाला होना कोई हैरत की बात नहीं है। मोदी सरकार ने जब अपनी पहली पारी में नोटबंदी का फैसला लिया था, तब भी कुछ बैंकों की हेराफेरी की खबरें सामने आई थीं। बैंक अधिकारियों से पहले सरकार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। सरकार गड़बड़-घोटाले रोकने के लिए सख्त कानून क्यों नहीं बनाती? रिजर्व बैंक क्यों नहीं बैंकों की कार्यप्रणाली पर सख्त नज़र रखता है? कहीं इन घोटालों के तार किन्हीं सत्ताधारियों से तो नहीं जुड़े हुए, जो आसानी से बैंक में घोटाला हो जाता है। बैंक के छोटे कर्मचारी तो घोटाले को आसानी से अंजाम नहीं दे सकते। यह सब जांच का विषय है।
राजेश कुमार चौहान, जालंधर

पुरस्कृत पत्र
बंद हो ये खेल
यस बैंक हो या पीएमसी बैंक का संकटग्रस्त होना, सीधे बड़े पूंजीपतियों, भ्रष्ट बैंक ब्यूरोक्रेट्स और घोटालेबाज नेताओं के गठजोड़ का नतीजा है। गरीब जनता की मेहनत की कमाई, जो एक सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से बैंक में रखी जाती है, को ‘उक्त तिकड़ी’ शातिर तरीके से मिलकर उड़ा ले जाती है और एनपीए के एक नये फार्मूले के अनुसार इन अरबों-खरबों के घोटाले की, एक साजिश के तहत ‘माफी’ भी हो जाती है, मरता साधारण व्यक्ति ही है। आमजन विरोधी एनपीए का नाटक बंद होना ही चाहिए और इन अपराधियों को कठोरतम दण्ड मिलना चाहिए।
निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद


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