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बाल कविता

Posted On March - 15 - 2020

जंगल की सैर
चुन्नू-मुन्नू जंगल की,
सैर को निकले जब।
देखे दोनों ने वहां पर,
जानवर बड़े अजब।
देखा एक खरगोश झाड़ी से,
निकल अचानक भागा।
पेड़ पे सोया हुआ था बंदर,
देख उन्हें झट जागा।
हिरण दूर से कान खड़े कर,
लगा ताकने उनको।
लगी दिखाने तभी गिलहरी,
उछल-कूद के फन को।
तभी कहीं से डरावनी-सी,
आवाजें पड़ी सुनाईं।
चुन्नू-मुन्नू बोले-झटपट, भागो यहां से भाई।
सतीश मराठा

दादी मां…
मां से भी अच्छी भाती दादी मां
पिटने से मुझको बचाती दादी मां
मैं सलौना था बचपन में कहती वो
काजल-टीका रोज़ लगाती दादी मां

जब आ जाता कोई भिखारी घर अपने
अपने आंचल में मुझे छुपाती दादी मां
छुप-छुप करके अपनी बहू से मुझको
लोणी घी खूब खिलाती दादी मां

यूं तो थी क़ंजूस घर में अब्वल जो
मेला खर्ची फिर भी देती दादी मां
स्वर्ग सिधारी वो व्यग्र हूं मैं तबसे
याद मुझको बहुत आती दादी मां
– व्यग्र पाण्डे


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