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फ्लैशबैक

Posted On March - 21 - 2020

हिंदी फीचर फिल्म : हलाकू

शारा
हलाकू मंगोल-आक्रांता चंगेज खान का पोता था, जिसने अपने दादा की तरह देशों, नस्लों पर हुकूमत की। हमलावर होने के कारण इराक, चीन, रूस, अफगानिस्तान आदि देशों पर उसका आधिपत्य था लेकिन हलाकू फिल्म सिर्फ ईरान पर उसके शासनकाल के इर्दगिर्द घूमती है। इस मूवी में एक्शन, ड्रामा, रोमांस के अलावा जज्बाती प्रवाह सभी कुछ है। केंद्र में हलाकू बने प्राण का किरदार है। प्राण का यह रोल इतना ताकतवर है कि नेगेटिव होने के बावजूद दर्शक उसके किरदार से मुहब्बत करने लगता है। यही हलाकू के किरदार की खासियत है कि उसमें विलेन होने के बावजूद इतनी खूबियां हैं कि भारतीय सिनेमा की सिंड्रेला मीना की अदाएं और सिक्स पैक वाले अजित का शारीरिक सौष्ठव भी भूल जाता है। प्राण अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ रोल में कहे जा सकते हैं।
कहानी का आगाज़ ही परवेज (अजित) और नीलोफर (मीना कुमारी) की मुहब्बत से होता है। गीत गाते हुए, प्यार की कसमें खाते हुए कहानी आगे बढ़ रही होती है कि ईरान के नरेश हलाकू की नीलोफर पर आंख पड़ती है और वह उसी से शादी करने का दावा पेश करता है। चूंकि उन दिनों समाज में पित्रात्मक परिवार का बोलबाला था, इसलिए महिलाएं उन दिनों शादी-ब्याह के मामले में कोई दखलअंदाजी नहीं कर पाती थीं बल्कि समाज में सुंदरता पर भी ताकतवर का ही शासन चलता था। यानी जिसकी लाठी उसकी भैंस। ऐसे हालात में अपनी प्रेयसी को बचाने का जिम्मा उसके प्रेमी का ही होता है। लिहाजा परवेज हलाकू को ताल ठोक देता है लेकिन जो बात हलाकू के मन में घर कर जाती है, वह परवेज का शारीरिक बल नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति थी, जिसके लिए परवेज नीलोफर को भी छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है। परवेज की देशभक्ति का जज्बा उसके दिल में उतर जाता है और हलाकू में अजीब तरह का परिवर्तन आता है। वह अपने विलेन का चोला फेंक कर दयालु राजा बन जाता है, जिसके लिए समाज का हित सर्वोपरि है। हालांकि, फिल्म के हीरो अजित हैं लेकिन प्राण फिल्म का शो चुराकर ले जाता है। इस रोल के लिए उसे समीक्षकों ने भी उतना ही सराहा, जितना दर्शकों ने। वह कई दशकों तक विलेन की भूमिकाओं से दर्शकों का मनोरंजन करते रहे। लेकिन हलाकू में वह खूब फबे हैं। यहां हेलन भी है डांस करने के लिए। हलाकू का दरबार बिना नृत्य के कैसा होगा? हालांकि यह कहना किसी निर्णय देने जैसा होगा कि हलाकू फिल्म इतिहास के कितना नजदीक है? हलाकू फिल्म को हम सलीम-अनारकली जैसी मान सकते हैं जो इतिहास के कुछ-कुछ नजदीक है। फिल्म का विषय ऐतिहासिक होने के बावजूद उबाऊ नहीं है। सारे तकनीकी पक्ष, जिनमें फिल्म की लंबाई भी शामिल है, सही है। निर्देशक डीडी कश्यप ने बड़ी ही खूबसूरती से स्क्रीन पर 12वीं सदी को उतारा है। शैलेंद्र के गीतों को संगीत दिया है शंकर जयकिशन ने। ‘आजा के इंतजार में, जाने को है बहार भी’ रफी तथा लता के चंदेक युगल गीतों में से एक है। ‘दिल का न करना एतबार कोई’ भी लता के लोकप्रिय गानों में से एक है। अक्सर लोग मीनू मुमताज को हलाकू की धर्मपत्नी बताते हैं लेकिन मीनू मुमताज एक डांसर थी। वीना (क्रिश्चियन) उसकी महारानी थी, जिसकी अक्सर हलाकू सलाह लिया करता था। वीना ने ही नीलोफर पर अत्याचार करने पर उसका विरोध किया था और नीलोफर पर गलत आंख रखने पर हलाकू को पत्नी की खरी-खरी सुननी पड़ी थी। फिल्म में सुंदर भी है परवेज के दोस्त की भूमिका में जो अपनी ऊलजलूल हरकतों से दर्शकों को हंसाता है। जिन पाठकों ने ‘चंगेज़’खां’ फिल्म देखी है, उन्हें हलाकू फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
निर्माता टीम
प्रोड्यूसर : प्रेम नारायण अरोड़ा, डी.डी. कश्यप
निर्देशक : डी.डी. कश्यप
गीत : हजरत जयपुरी, शैलेन्द्र
संगीत : शंकर जयकिशन
सिनेमैट्रोग्राफी : सूर्या कुमार
सितारे : मीना कुमारी, प्राण, अजित, वीना, हेलन आदि।

गीत
उसे मिल गयी नयी जिंदगी : लता मंगेशकर
आ जा कि इंतजार में : मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर
ये चांद ये सितारे : लता मंगेशकर
अजी चले आओ : लता मंगेशकर, आशा भोसले
बोल मेरे मालिक : लता मंगेशकर
ओ सुनता जा दिल का नगमा : लता मंगेशकर
दिल का न करना एतबार कोई : मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर
तेरी दुनिया से जाते हैं : लता मंगेशकर


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