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पीजी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं

Posted On March - 2 - 2020

गुरुग्राम/हप्र

नवीन पांचाल
पेइंग गेस्ट (पीजी) यानी सुविधाओं के बदले भुगतान करके रहने वाला मेहमान। होटल और गेस्ट हाउस की तुलना में कम खर्चीला, लेकिन इनके बराबर की सुविधाएं देने वाले पीजी कंसेप्ट को मेट्रोपोलिटिन शहरों ने हाथों हाथ अपनाया है। इनका चलन इतना अधिक बढ़ा है कि गांव हो या शहर सभी इलाकों में बड़े पैमाने पर पीजी खुल गए। बाहर से आने वाले लोगों के लिए पीजी बेशक सुविधा है, लेकिन स्थानीय निवासियों के लिए ये किसी आफत से कम नहीं हैं।
बड़े पैमाने पर मोटी आय का साधन बने इन पीजी को लेकर सरकार की कोई नीति नहीं है। ऐसे में किसी हादसे की स्थिति में सभी विभाग एक-दूसरे के ऊपर ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारी से बच जाते हैं। अवैध तरीके से शहर की प्रत्येक रोड व गली में खुले पीजी में रहने वाले लोगों की आपात स्थिति में सुरक्षा के लिए किसी तरह के कोई उपाय नहीं किए जाते। खुफिया विभाग की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो गुरुग्राम के शहरी क्षेत्र में करीब 5 हजार पीजी बने हुए हैं। सुरक्षा संवेदी मौकों मसलन गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब इनकी जांच पड़ताल की जाती है तो अधिकांश पीजी प्रबंधन के पास इनमें ठहरने वालों की पर्याप्त जानकारी तक नहीं होती। ऐसी स्थिति में ये सुरक्षा के लिए बड़े खतरे के तौर पर सामने आते हैं। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट के द्वारा पिछले दिनों अपने स्तर पर जुटाई गई जानकारी में सामने आया कि निजी क्षेत्र की टाउनशिप डीएलएफ, सुशांत लोक, साउथ सिटी, सनसिटी में करीब 2500 पीजी चल रहे हैं।

रेवाड़ी/निस

विदेश की 250 से अधिक कंपनियों के कार्यालय गुरुग्राम में हैं। इसके अलावा, यहां देश का बड़ा औद्योगिक क्षेत्र, मेडिकल व एजूकेशन हब भी है। इसलिए देश-विदेश के हजारों लोग हर रोज यहां किसी न किसी काम से आते हैं। ये महंगे होटल की बजाय पीजी में ठहरने को प्राथमिकता देते हैं, जबकि यहां के शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी, आईटी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारी, अस्पताल व दूसरे औद्योगिक क्षेत्र के कर्मचारी भी पीजी में रहना पसंद करते हैं। ऐसी स्थिति में आए दिन इनकी मांग बढ़ती जा रही है। यहां तक कि शहर के बेहद पॉश इलाकों व सोसायटी में भी लोगों ने अपने घरों को पीजी में तब्दील कर दिया है और इससे मोटी कमाई कर रहे हैं।
बने पॉलिसी
गेस्ट हाउस आॅनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष शीतल अग्रवाल कहते हैं, ‘गेस्ट हाउस को लेकर तो सरकार ने पॉलिसी बना दी, लेकिन पीजी के बारे में अभी किसी ने अपना रुख साफ नहीं किया है। इससे कई तरह की दिक्कतों का भी सामना करना पड़ रहा है।’ वह कहते हैं, ‘शहर में बाहर से आने वाले लोगों की सहूलियत के लिए कम से कम 2500 गेस्ट हाउस और इससे दोगुनी संख्या में पीजी की जरूरत है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। सरकार यदि गेस्ट हाउस पॉलिसी की तरह पीजी के लिए भी नियमावली बना दे तो इनसे राजस्व तो मिलेगा ही, यात्रियों व इन्हें बनाने वालों को भी लाभ होगा।’
नियमों को लेकर ही कन्फ्यूजन
गेस्ट हाउस के लिए प्रदेश सरकार ने हाल ही में पॉलिसी बनाई है, लेकिन पीजी के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं। इसके नियमों को लेकर विभागों में भी असमंजस है। न तो नगर निगम या नगर परिषद अधिकारियों को और न ही पुलिस अधिकारियों को पीजी के लिए निर्धारित शर्ताें के बारे में पूरी तरह पता है। ज्यादातर निगमों के अधिकारियों का कहना है कि पीजी को लेकर सरकार का कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं। हालांकि, रेवाड़ी के संपदा अधिकारी व एसडीएम रविंद्र यादव का कहना है कि एसडीएम कार्यालय, नगर परिषद, बिजली विभाग, फायर व पुलिस विभाग की एनओसी के बाद ही कोई पीजी खोला जा सकता है। वर्ष 2005 में पीजी को लेकर नोटिफिकेशन भी जारी हुई थी। इसके तहत, पीजी 7.5 मरला या इससे बड़े मकान में ही चलाया जा सकता है। 5 गेस्ट पर एक इंग्लिश टॉयलेट होना जरूरी है। उस बिल्डिंग में मालिक का रहना अनिवार्य है। एक गेस्ट के लिए कम से कम 50 स्क्वेयर फुट की जगह होनी चाहिए। जिस एरिया में पीजी होगा, वहां के पुलिस स्टेशन में संचालकों को ठहरने वाले गेस्ट्स का रिकार्ड जमा करवाना जरूरी है।
1) नहीं हुआ सर्वे
‘पीजी को नगर निगम कमर्शियल के तौर पर ट्रीट करता है। प्रॉपर्टी सहित दूसरे प्रकार के टैक्स कमर्शियल तरीके से लिए जाते हैं। कभी ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया, जिससे इनकी वास्तविक संख्या का पता चल सके। इनके खिलाफ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट की होती है। बेड एंड ब्रेकफास्ट की पॉलिसी अब प्रभाव
में नहीं है।’

-विनय प्रताप सिंह, कमिश्नर, नगर निगम

2) निगम करे कार्रवाई
‘हमारी जिम्मेदारी सिर्फ लाइसेंस्ड कॉलोनी क्षेत्र को लेकर है। सेक्टर एरिया में कार्रवाई एचएसवीपी और निगम क्षेत्र में निगम को अपने स्तर पर कार्रवाई करनी होती है। इनका बिल्डिंग प्लान और ऑक्यूपेशन सार्टिफिकेट रद्द किया जा सकता है, लेकिन यह कार्रवाई सिर्फ लाइसेंस्ड टाउनशिप में ही की जा सकती है।’

-आरएस बाठ, डीटीपी-इंफोर्समेंट व प्लानिंग

3) डीटीपी बनाये पॉलिसी
‘सेक्टर एरिया में कितने पीजी चल रहे हैं, इसे लेकर कोई सर्वे नहीं करवाया गया। इनके खिलाफ कार्रवाई व पॉलिसी बनाने की जिम्मेदारी टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट की बनती है। अभी तक पीजी के नियमतीकरण को लेकर संभवतः कोई पॉलिसी नहीं बनी है।’

-जितेंद्र यादव, प्रशासक- एचएसवीपी

4) असुरक्षा की भावना
‘पीजी के तौर विकसित हुए मकानों में क्षमता से कई-कई गुणा लोगों को रखा जाता है। इससे पानी व सीवरेज की समस्याएं तो पनपती ही हैं, बाहरी लोगों की बड़ी संख्या में मौजूदगी स्थानीय निवासियों के लिए असुरक्षा की भावना भी बढ़ाती है।’

-अजीत यादव, निवासी साउथ सिटी-2


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