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पानी कुछ कहता है…

Posted On March - 22 - 2020

विश्व जल दिवस

सुरेश कुमार मिश्रा

मैं पानी हूं। हर जिंदगी की कहानी हूं। किसी का अफसाना तो किसी का तराना हूं। आपके शरीर में 70 प्रतिशत का मालिक हूं। मैं हर जगह हूं। पाताल से लेकर अंबर तक, सूक्ष्म से लेकर स्थूल तक, हर कण में बसा हूं। हवा में भाप, जमीन में तरल और ठोस में बर्फ बनकर आपके चारों ओर हूं। रूप अलग-अलग है। काम केवल एक है-हर जरूरतमंद के काम आना। कहने को तो सारा समुंदर इनसान के पास है, लेकिन एक बूंद उसकी प्यास है। मैं वही बूंद हूं। मैं वही आस, मैं वही विश्वास हूं।
महासागर पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई भाग घेरे हुए है, लेकिन पृथ्वी पर मेरी उपलब्धता मीठे जल के रूप में केवल 2.7 प्रतिशत ही है और इसमें से भी लगभग 75.2 प्रतिशत धुव्रीय प्रदेशों में बर्फ के रूप में विद्यमान हूं और 22.6 प्रतिशत भूजल के रूप में। शेष जल तालाबों, झीलों, नदियों, वायुमंडल, नमी, मृदा और वनस्पति में मौजूद हूं। बड़ी मुश्किल से आपके पास आते-आते एक प्रतिशत रह जाता हूं।
एक जमाना था जब मैं जमीन के भीतर मात्र 15 फुट की गहराई में दर्शन दे देता था। अब एक जमाना यह भी है कि 1000 फुट की गहराई से पहले दर्शन देना मेरी शान के खिलाफ है। क्या सिर्फ इनसान ही रंग बदलते हैं? कतई नहीं। मुझे ही देख लो। अगर मैं अपने पर आ जाऊं तो कहीं अकाल तो कहीं बाढ़ बनकर तबाही मचा सकता हूं। लेकिन मैं इतना भी गया गुजरा नहीं हूं कि किसी के आंसुओं से अपना घर साफ करूं। मैं पानी हूं, पानी! जो मेरा सम्मान करेगा, मैं उसका सम्मान करूंगा। मैं एक हाथ दे दूसरे हाथ ले वाली नीति में विश्वास करता हूं। जो मेरी रक्षा करेगा, मैं उसकी रक्षा करूंगा। मैं जहां हूं वहीं हरियाली है। मैं जहां नहीं हूं वहां रेगिस्तान, सूखा, भुखमरी, विलाप, विषाद और जीवन का मृत्यु तांडव है। अब निर्णय आपको करना है कि आपको क्या चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी ने 1999 में एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया था कि 50 देशों में 200 से भी अधिक वैज्ञानिकों ने मेरी कमी को नई शताब्दी की दो सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बताया था। दूसरी समस्या धरती का बढ़ता तापमान थी। आप अपने पास उपलब्ध मेरी मात्रा का 70 प्रतिशत खेती-बाड़ी में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन विश्व जल परिषद का मानना है कि स‍न‍् 2020 तक पूरी दुनिया को खाना खिलाने के लिए आपको अभी विद्यमान मेरी मात्रा नाकाफी है। इसके लिए अतिरिक्त 17 प्रतिशत की आवश्यकता पड़ेगी। यदि आप इसी ढर्रे पर चलते रहे तो आने वाले दिनों में आज के मुकाबले एेसे लाखों लोग ज्यादा होंगे जो हर रात सोते वक्त भूखे-प्यासे होंगे। आज पूरी दुनिया में हर पांच में से एक आदमी को पीने के पानी की सुविधा नहीं है। हर दो में से एक को साफ-सुथरे शौचालय की सुविधा नहीं है। मेरा शुद्ध रूप अच्छी सेहत और खुराक का मूलमंत्र है।
आप सभी जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में घोषित किया है। यह मुझ पर कोई अहसान नहीं है। सबसे पहले तो यह एक दिन का गाना-बजाना, बड़ी-बड़ी हांकना, देख-दिखावा, नाटक और नौटंकी बंद करें। मैं आपकी मीठी-मीठी चिकनी-चुपड़ी बातों में नहीं आने वाला। दूसरी बात, जो मुझे बचाने के लिए आए दिन जल को अब बचाना है जैसे नारे लगाते रहते हैं, उसे बंद करें। इन नारों की पोटली बांधकर कूड़े में फेंक दें। मुझे बचाने के लिए कथनी की नहीं, करनी की ज़रूरत है।
अपने लिए मुझे बचाना है तो आप छोटे-छोटे काम जैसे- मंजन करते या मुंह धोते समय नल खुला छोड़ देना, कपड़े धोने के लिए मुझे निरंतर बहने देना, मात्रा से अधिक इस्तेमाल करना, वाहनों की धुलाई के लिए मेरी बर्बादी करना रोक दें, तो कइयों को जीवनदान दे सकते हैं। भलाई इसी में है कि बरसात के दिनों में मुझे सहेजिए। इसके लिए कुएं, तालाब व बावडि़यां बनवाने के लिए आगे आएं, क्योंकि ये काफी मात्रा में न केवल मेरा संग्रह करते हैं, बल्कि बारहों महीने मेरी आपूर्ति भी करते हैं। अगर आप आज नहीं जागेंगे तो आपकी भावी पीढ़ी आपको कभी माफ नहीं करेगी। रहीम के शब्दों में कहा जाए तो- रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।


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