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पहले जैसी नहीं रहेगी वैश्विक व्यवस्था

Posted On March - 26 - 2020

श्याम सरन

निस्संदेह आने वाले समय में कोरोना महामारी का अवसान हो जाएगा, लेकिन यह अपने पीछे एक परिवर्तित दुनिया छोड़ जाएगा। एक जीवाणु से उत्पन्न इस अभूतपूर्व संकट से उपजी चुनौतियों से निपटने में जो उपाय किए जाएंगे, उससे मानव जीवन, कामकाज और यहां तक कि खेलकूद पर भी बहुत असर पड़ेगा। स्थितियां पहले जैसी शायद ही वापस बन पाएं। आज विश्व एक नई व्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, जिसमें समाज, देशों और दुनिया पर अनजाने विकल्प हावी हो जाएंगे।
मौजूदा मुख्य संकट हाशिये पर आते मुल्कों में न होकर वैश्विक राजनीति और आर्थिकी का केंद्र कही जाने वाली व्यवस्थाओं में हो गुजरा है। वर्ष 2001 में हमने अमेरिका में 9/11 का आतंकी हमला देखा, उसके बाद दुनियाभर के देशों में नागरिकों की निजता में सरकारों का दखल बढ़ गया। तकनीकी उन्नति ने सरकारों को अपने नागरिकों की निगरानी करने में और ज्यादा सक्षम बना दिया है। नागरिकों ने भी आसन्न भय के मद्देनजर अपनी निजता का होता हनन ज्यादातर चुपचाप स्वीकार कर लिया है। वर्ष 2008 का वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट भी दुनिया की एकमात्र महाशक्ति अमेरिका और अन्य बड़ी आर्थिकियों से शुरू हुआ था और इसका असर पूरे विश्व में हुआ था। इस महामंदी के बाद अर्थव्यवस्था में भी सरकारों को अपनी दखलअंदाजी और ज्यादा बढ़ाने का मौका मिला। यह स्थिति लगभग वैसी थी जैसी कि 1980 के दशक में रोनाल्ड रीगन और मार्ग्रेट थैचर द्वारा पुराने समय से चली आ रही आर्थिक नीतियों की पैरवी करने से बनी थी, लेकिन बाद में यह धीरे-धीरे खत्म होने की ओर अग्रसर थी।
कोरोना संकट विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिकी वाले देश चीन से शुरू हुआ है, जिसका व्यापारिक राब्ता अपने पड़ोसी मुल्कों और दुनिया के बहुत से देशों के साथ काफी सघन है। वायरस चीन से आने वाले लोगों के माध्यम से आगे बहु-मानवसंपर्क संक्रमण के जरिए दुनियाभर में फैल गया है। इस विकटतम चुनौती का सामना करने में एक निजाम को किस तरह से प्रभावशाली और त्वरित प्रतिक्रिया करनी चाहिए, उसमें भी फिलहाल चीन का ही उदाहरण दिखाई दे रहा है। चीन ने यह भी दिखा दिया है कि संकट को सुलझाने में सख्त रवैया ज्यादा कारगर रहता है।
मौजूदा समय में हमारे सामने अनेकानेक संकट खड़े हैं। आर्थिक मंदी पहले ही थी अब स्वास्थ्य संकट भी पैदा हो गया है। पहले ही मांग-आपूर्ति के अनुपात के बीच फर्क से बना आर्थिक संकट अपने आप में विलक्षण था तिस पर कोरोना का कहर टूट पड़ा है। प्रत्येक मामले में हर नए पैदा होते संकट ने निदान करने के सिलसिले में सरकारों को असाधारण शक्तियां देने का काम किया है। लेकिन संकट टल जाने के बाद भी वे शक्तियां कायम रहती हैं। इसलिए कोरोना के बाद सरकारों द्वारा और ज्यादा शक्ति अपने हाथ में केंद्रित करने और नागरिकों की निजता में दखलअंदाजी का चलन बना रहेगा, जिसके नतीजे में उनके अधिकारों का ह्रास होगा।
वैश्वीकरण व्यवस्था में विरोधाभासी चाल-चलन देखने को मिलेगा। दूसरे देशों के सस्ते मानवश्रम आधारित उद्योगों में बना माल, जिसका फायदा चीन को बहुत हुआ है, उसकी आपूर्ति पर टिके व्यापार की सप्लाई लाइन किस कदर नाजुक है, इसका पता मौजूदा संकट में चल गया है। इसलिए भविष्य में कोरोना त्रासदी उत्पादन और आवंटन के तौर-तरीकों को बदलने का सबब बनेगी। विदेशों से आने वाले माल या उत्पाद की आपूर्ति में आया विघ्न जितना ज्यादा लंबा खिंचेगा, उस पर बनी निर्भरता उतनी कम होती जाएगी और ध्यान घरेलू उत्पादों के ज्यादा बनने पर लगेगा। वैश्वीकरण के सिद्धांत के चलते कई देशों के उद्योग-धंधे कलपुर्जों और उत्पादन में काम आने वाली संबंधित सामग्री के लिए चीन पर बेतरह निर्भर हो चुके हैं। अब आगे सोच-समझकर आपूर्ति का स्रोत केवल एक जगह से बनाने की बजाय अलग-अलग मुल्कों से करने का चलन जोर पकड़ेगा और इसके बाद उत्पाद के विक्रय में भी यही नीति अपनाई जाएगी। चीनी आर्थिकी को जिन तुलनात्मक अवयवों का फायदा मिल रहा था उसमें कमी हो जाएगी। हालांकि सस्ते निर्यात के दम पर वह फिर भी अपनी धाक कायम रखने की कोशिश करेगा।
मौजूदा हालातों से बनने वाले बदलावों में हमें डिजिटल क्षेत्र का वैश्वीकरण और सुदृढ़ होता देखने को मिल सकता है। कोरोना से निपटने वाले काल में हुई तालाबंदी और कर्फ्यू के चलते काम-धंधे, शैक्षणिक गतिविधियां, सामान्य सेवाएं, डिजिटल संचार, ऑनलाइन सेवाएं और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग इंटरनेट पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं। डिजिटल उपकरणों के जरिए पहले के मुकाबले ज्यादा लोग घरों से काम कर पा रहे हैं। उम्मीद है वैश्विक महामारी के खात्मे के बाद भी नई बनी यह डिजिटल संपर्क सघनता कायम रहेगी। वास्तविक मेलमिलाप की एवज पर डिजिटल मेलजोल ज्यादा बनेगा। यह उन देशों के लिए फायदेमंद रहेगा जहां इंटरनेट तंत्र विस्तृत है और स्मार्टफोन काफी संख्या में हैं। इससे नए व्यापारिक तौर-तरीके सोचने वाले व्यवसायियों की पौध पनपेगी। चीन भी खुद को होने वाले घाटे की आशंका के मद्देनजर अपने कुछ उत्पादन केंद्र दूसरे देशों में स्थापित कर आपूर्ति शृंखला अबाध रखने की दिशा में काम करने पर सोचेगा, क्योंकि उसके पास वस्तु निर्यात में सफल समांतर गतिशील डिजिटल तंत्र पहले से ही मौजूद है।
आज की स्थितियों से पैदा होने वाले बदलावों का फायदा भारत को तीन कारणों से उठाना चाहिए ः हमारे पास आधार योजना के अंतर्गत विश्व का सबसे वृहद नागरिक डाटा है, स्मार्टफोन की मांग तेजी से बढ़ रही है जो लोगों के लिए डिजिटल लेनदेन की तमाम गतिविधियों के लिए एक सशक्त साधन मुहैया करवाते हैं। इसके अलावा हमारे देश में डाटा डाउनलोडिंग विश्वभर में सबसे सस्ती है।
महामंदी से सबक मिला था कि वृहद सहमति पर आधारित समन्वयक प्रयास दुष्प्रभावों को कम करने में कारगर उपाय रहे थे, जबकि एक अकेले देश के लिए अपने बूते पर ऐसा कर पाना आसान नहीं होता। दुर्भाग्यवश मौजूदा वैश्विक त्रासदी में वैसी दूरंदेशी दिखाई नहीं पड़ रही है। वजह यह भी कि ताकतवर देश खुद अपने राष्ट्रवाद वाले एजेंडे पर ज्यादा टिके हुए हैं। उन्हें अपनी सार्वभौमिकता की एवज पर सीमित छूट देना भी गवारा नहीं है।
मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के केंद्र में जो विरोधाभासी खामियां हैं, वे ज्यादा तीव्र हो गई हैं और इससे भविष्य में और ज्यादा वैश्विक संकट पैदा होंगे। मौजूदा सदी में सबसे बड़ी चुनौतियां अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हैं और इनसे पार पाने के लिए भी जरूरत उसी स्तर की पड़ेगी, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों और बहुस्तरीय प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करते हुए वैश्विक स्तर पर सामूहिक प्रयास किए जाएं। लेकिन यह बात तानाशाही व्यवस्था वाले राष्ट्रों की लीक के विपरीत बन जाती है। अगर कोरोना का संकट लंबा खिंच गया और इसके आर्थिक नतीजे दूरगामी और काफी समय तक बने रहे तो कोई उम्मीद कर सकता है कि अपरिहार्य मजबूरी के चलते विश्व की व्यवस्था एकजुटता की उस दिशा में मुड़ जाए, जो तार्किक विकल्प के रूप में पहले से ही मौजूद थी।

लेखक पूर्व विदेश सचिव और नीति अनुसंधान केंद्र के सीनियर फैलो हैं।


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