षष्ठम‍्-कात्यायनी !    इस बार गायब है आमों की मलिका ‘नूरजहां’ !    हालात से चिंतित जर्मन राज्य के वित्त मंत्री ने की आत्महत्या !    भारतीय मूल के लोग आये आगे !    दिल्ली से पैदल मुरैना जा रहे व्यक्ति की आगरा में मौत !    राज्यों और जिलों की सीमाएं सील !    लॉकडाउन से बिजली की मांग में भारी कमी !    अजिंक्य रहाणे ने 10 लाख रुपये किये दान !    दान का सिलसिला जारी, पीएम ने राष्ट्रपति का किया धन्यवाद !    ईरान से लाये 275 लोगों को जोधपुर में रखा गया अलग !    

नहीं चलेगी मनमानी कहानी

Posted On March - 14 - 2020

असीम चक्रवर्ती

भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ बरसों से कई एक्सपेरिमेंट होने लगे हैं। पारंपरिक सिनेमा से अलग भी कुछ ऐसे विषय दर्शकों के लिये परोसे जाने लगे हैं जो उन्हें कभी पसंद आ जाते हैं तो कभी वे उन्हें सिरे से नकार भी देते हैं। मुद्दे की बात यह है कि फिल्म निर्माता-निर्देशक इसे बनाने में भले ही करोड़ों रुपये खर्च कर डालते हों लेकिन स्टोरी सस्ती ही खरीदना चाहते हैं। कुछ तो खुद ही पटकथा लेखन में भी जुट जाते हैं। हालिया रिलीज़ आयुष्मान खुराना की ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ को बॉक्स ऑफिस पर मिली नाकामी से इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।
दरअसल इस फिल्म के पहले पार्ट शुभ मंगल सावधान को दर्शकों का प्यार इसलिए मिल सका, क्योंकि फिल्म पांरपरिक सेक्सुअल डिस्ऑर्डर पर आधारित थी, जबकि इसके दूसरे पार्ट ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ को दर्शक नहीं मिले, क्योंकि यह एक गैर पारंपरिक विषय होमोसेक्सुआलिटी पर बेस्ड थी। ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसे विषयों पर हिन्दी सिनेमा ने फिल्में नहीं बनायी। लेकिन उनमें से कामयाबी का पैमाना देखें तो वह काफी नीचे ही रहा। 1996 में आई दीपा मेहता की ‘फायर’ ने तो होमोसेक्सुएलिटी की बात कर सिनेमा में आग लगाने का काम किया था। तमाम आलोचनाओं के बीच फिल्म ठंडे बस्ते में डालकर दर्शक इसे भूल भी गये।
फिल्में जो हो गईं आई-गई
याद कीजिये 2010 में आई फिल्म ‘आय एम’ भी समलैंगिक संबंधों पर बनी थी, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। सच्ची घटना पर आधारित मनोज बाजपेयी की 2016 में रिलीज़ फिल्म ‘अलीगढ़’ भी ऐसे ही विषय पर बनी थी। स्टार किड्स के गॉ़डफादर करण जौहर भी ‘कपूर एंड सन्स’ नाम से एक फैमिली ड्रामा इसी विषय पर बना चुके हैं। इस फिल्म में फवाद खान परिवार के सबसे बड़े बेटे हैं जो गे की भूमिका में है। हालांकि ऐसी फिल्मों में रूढ़िवाद न दिखाते हुए निर्माताओं ने जीवन की सच्चाई को दिखाने की कोशिश की है। लेकिन हिन्दी के पारंपरिक दर्शक अभी तक ऐसे विषयों पर बन रहे सिनेमा को परिवार और पत्नी या गर्लफ्रेंड के साथ देखने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। देखा जाये तो ट्रांसजेंडर के दर्द पर बनी फिल्में भी दर्शकों द्वारा बहुत कम पसंद की गई हैं। इसके अलावा भी ऐसे बहुत से विषयों पर बनी फिल्में हैं, जिन्हें निर्माता तमाम जतनों से, मेहनत से इस उम्मीद के साथ सिनेमाघरों में लेकर आते हैं कि शायद यह विषय उन्हें आकर्षित कर पाये लेकिन दर्शक ही नहीं बल्कि समीक्षक भी इन फिल्मों को झटक देते हैं। कारण यह है कि उन्हें निर्माताओं का टेस्ट पसंद नहीं आता।
‘भूत’, ‘ शिकारा ‘ को क्यों नकारा
ताज़ा फिल्म ‘भूत’ की असफलता ने विकी कौशल को तगड़ा झटका दिया है। दूसरी तरफ फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा अपनी फिल्म ‘शिकारा’ में कश्मीरी विस्थापितों का दर्द इस उम्मीद के साथ लेकर आये थे कि शायद दर्शक इसे समझ पाएंगे। लेकिन दर्शकों ने इसे पसंद नहीं किया। फिल्म की नाकामी के बाद विधु दर्शकों पर ही बिफर पड़े। उनका तर्क है कि दर्शकों को अच्छी फिल्म देखने की तमीज़ नहीं है। वैसे इन दिनों इस तरह की शिकायत हर फिल्मकार करने लगा है। देखा जाये तो वर्षों पहले की अपनी फिल्म ‘परिंदा’ के बाद से ही विधु लगातार अपनी फिल्मों के ज़रिये दर्शकों पर अपनी सोच थोपने की कोशिश कर रहे हैं। जिस वजह से उनका प्रोडक्शन और उनके द्वारा बनाई जा रही फिल्में बेहद नीरस होने लगी हैं।
वहम में हैं निर्माता!
हाल फिलहाल की ‘लव आजकल-2’, ‘स्ट्रीट डांसर’, ‘शिमला मिर्ची’ जैसी दर्जनों फिल्में हैं, जिन्हें कई सजग समीक्षकों ने कचरा तक कहा है। उनका तर्क है कि हर दौर में मनोरंजन प्रेमी दर्शकों ने ऐसी फिल्मों को बाहर का रास्ता दिखाया है। लेकिन कुछ फिल्मकार जो एक अरसे से दर्शकों को अपना पसंदीदा सब्जेक्ट परोसते रहे हैं, वे इस सोच को सिरे से खारिज़ करते हैं। ट्रेड विश्लेषक आमोद मेहरा किसी भी तरह से दर्शकों पर कोई दोष नहीं मढ़ते। मेहरा बताते हैं,’अच्छी फिल्मों के नाम पर जो फिल्में लोगों को बोर करती हैं, मैं उन्हें बेकार फिल्में ही कहूंगा। इस वजह से एकाध हिट फिल्म बनाने वाले विधु, इम्तियाज़ अली, अनुराग, हंसल मेहता जैसे दर्जनों निर्देशकों को दर्शकों के बारे में कोई वहम नहीं पालना चाहिए।’
अच्छी फिल्में-खराब फिल्में
बॉलीवुड में बहुत से ऐसे निर्माता-निर्दशक हैं जो दर्शकों की नब्ज़ नहीं पकड़ पाते हैं। ये लोग अच्छी फिल्मों की एक नई परिभाषा गढ़ते हैं। इनके बारे में आमोद मेहरा कहते हैं,’ ऐसे कई निर्माता-निर्देशक हैं, जिनके लिए दर्शकों की पसंद कोई मायने नहीं रखती। वरना शुभ मंगल सावधान की हिट फ्रेंचाइची में ज़्यादा शब्द जोड़कर इसी नाम की फिल्म? फिर उसमें काॅमेडी के नाम पर समलैंगिक रिश्ते को हाइप करने की क्या ज़रूरत थी। सभी जानते हैं कि अब भी लेस्बियन रिलेशनशिप में बहुत कम लोगों की दिलचस्पी है। आज भी देश में ऐसा एक छोटा-सा वर्ग है, जो ऐसे रिश्तों को मानता है। लिहाज़ा यह तो पहले से ही तय हो जाता है, ऐसे कठिन विषय पर बेस्ड फिल्म को तो दर्शक कम ही मिलेंगे। जब बड़े सितारों वाली फिल्म ‘एक लड़की को देखा’ को दर्शक पहले दिन ही खारिज़ कर देते हैं तो ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ को भला क्यों बर्दाश्त करते?
अनुराग एंड कंपनी
अनुराग कश्यप की फिल्मों में ही नहीं उनके बयानों में भी बहुत कुछ बगावती दिखता है। अनुराग की पसंद सोशल मीडिया को तो खूब भाती है लेकिन सिनेमा में पारंपरिक दर्शक उनकी फिल्मों से दूर भागते हैं। उनके सहयोगी निर्देशकों की कंपनी में विधु, जोया, हंसल जैसे ढेरों डायरेक्टर हैं जो आॅफबीट फिल्मों के नाम पर दर्शकों को लगातार बोर कर रहे हैं। आमोद कहते हैं, ‘इनकी मुश्किल यह है कि वे अपनी इन फिल्मों को अच्छी फिल्मों की संज्ञा देते हैं। जिसके चलते राजकुमार हिरानी, इंद्र कुमार, अनीस बज़्मी, रोहित शेट्टी जैसे कमर्शियल फिल्मों के डायरेक्टर को वह बहुत पराया समझते हैं। जबकि बहुत पहले ही इन अच्छी फिल्मों के डायरेक्टर को दर्शकों ने एकदम दरकिनार कर दिया है क्योंकि उन्हें पता चल गया कि ये अपनी फिल्मों के ज़रिए दर्शकों पर केवल अपना एजेंडा फिट करना चाहते हैं।
गली-बॉय का जोड़-तोड़
60 करोड़ की फिल्म गली बॉय देश में मात्र 103 करोड़ की कमाई कर पाई। इसके बजट के हिसाब से उसका यह मुनाफा बहुत अच्छा नहीं था। दर्शकों की दृष्टि से देखें तो यह एक आम फिल्म है। मगर पिछले साल और इस साल कुछ पिटे हुए फिल्ममेकर्स ने इसे खूब हाइप किया। इतना कि ऑस्कर के लिये नॉमिनेट तक किया गया। फिल्म के रैप और गानों में जिस अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ है, उसे आज के पढ़े-लिखे नौजवानों का एक बड़ा तबका भी पसंद नहीं करता। आमोद मेहरा कहते हैं,’यह एक साधारण-सी फिल्म है, जिसे मीडिया ने कुछ ज्यादा हाइप कर दिया है। वह इसे ऐसे प्रचारित कर रहा है, जैसे कि यह कोई क्लासिक फिल्म हो। मैं इसे बुरी फिल्म भी नहीं कहूंगा, पर यह कोई उम्दा फिल्म भी नहीं है।’
सितारों के भरोसे कब तक
इस प्रसंग में विख्यात लेखक राही मासूम रजा की एक बात शिद्दत से याद आती है-अपनी फिल्म में सितारों पर करोड़ों खर्च करने वाले हमारे प्रोड्यूसर फिल्म की स्टोरी पर कुछेक लाख भी खर्च करना पसंद नहीं करते। उन्हें लगता है कि सितारे सब कुछ संभाल लेंगे। और हमारे स्टार्स की लेखकीय समझ की तो दाद देनी पड़ेगी। उनकी समझ अच्छी होती तो हर साल इतनी सड़ी-गली फिल्में नहीं आतीं। इस दौरान कई ऐसी फिल्में आईं, जिन्हें लेकर दर्शकों के बीच एक उत्सुकता थी। क्योंकि इनमें से कई फिल्मों में काफी बड़े और नामचीन सितारे मौजूद थे। जाहिर है कुछ कंटेंट, लीक से हटकर सब्जेक्ट, कुछ पारंपरिक लव स्टोरीज़ और कुछ सितारों की चमक -दमक, इन सभी को लेकर दर्शकों का अपना क्रेज देखने को मिलता है। काबिल, जॉली एलएलबी, बद्रीनाथ की दुल्हनिया, नाम शबाना, हिंदी मीडियम, मॉम, मुबारकां, टॉयलेट-एक प्रेमकथा, बरेली की बर्फी, शुभ मंगल सावधान, पोस्टर बॉयज, जुड़वा-2, सीक्रेट सुपरस्टार, गोलमाल अगेन, इत्तेफाक, टाइगर ज़िंदा है जैसी कई फिल्में हैं, जिनमें दर्शकों पर सितारों का जादू चला। लेकिन ट्रेड विश्लेषक कोमल नाहटा के मुताबिक सिर्फ सितारों के सहारे हिट फिल्मों की पूर्ति संभव नहीं है। वह कहते हैं, ‘बधाई हो, पंगा जैसी कई बेहतर फिल्में बेहतर टीम वर्क का नतीजा होती हैं, इसे हमारे ज्यादातर फिल्मकारों ने नजरअंदाज़ किया है। वे घटिया और अच्छी फिल्मों के अंतर को समझने में अक्सर चूक कर जाते हैं। जिसके चलते हर साल कई असफल फिल्में इंडस्ट्री को दुखी करती रहती हैं।’


Comments Off on नहीं चलेगी मनमानी कहानी
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Manav Mangal Smart School
Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.