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घातक होता कोरोना

Posted On March - 22 - 2020

मुकुल व्यास
चीन के वुहान शहर से निकला कोरोना वायरस अब 170 देशों तक पहुंच चुका है। चीन वायरस के कहर को थामने में सफल हो गया है लेकिन इटली और ईरान की स्थिति बहुत खराब है। स्पेन और फ्रांस सहित कई यूरोपीय देशों और अमेरिका में इसका प्रकोप बढ़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 को ‘पैंडेमिक’ (विश्व महामारी) घोषित किया है। भारत में, खास कर महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या लगातार बढ़ने के बाद खौफ और भय का वातावरण व्याप्त है। कर्नाटक में ‘लॉकडाउन’ हो गया है। महाराष्ट्र में भी बंदी की स्थिति बन रही है। एक और चिंता की बात यह है कि देश के बाहर 276 भारतीय कोरोना की चपेट में हैं, जिनमें 255 ईरान में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायरस के संक्रमण को रोकने के भारत के उपायों को अपर्याप्त बताया है। उसका कहना है कि कहीं-कहीं से किसी व्यक्ति के सैंपल (रेंडम सैंपलिंग) से पूरे समुदाय में फैलने वाले संक्रमण का पता नहीं लगेगा। दूसरी तरफ, स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि वायरस से सामुदायिक संक्रमण का मामला सामने नहीं आया है।
साफ नहीं प्रकोप की तस्वीर
इस वायरस के बारे में बहुत सी चीजें अभी अज्ञात हैं। कोई नहीं जानता कि वायरस के कारण कितने लोगों को बहुत ही हल्की किस्म के इंफेक्शन हुए हैं और क्या वे वायरस को आगे फैला सकते हैं। वायरस के प्रकोप की संपूर्ण तस्वीर अभी साफ नहीं है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस ज्यादा आक्रामक किस्म में तबदील हो रहा है। 103 मामलों के अध्ययन के अनुसार दुनिया में नए कोरोना वायरस की दो किस्में फैल रही हैं लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि इस वायरस में कोई परिवर्तन हो रहा है अथवा उसमें म्यूटेशन हो रहा है।
कोरोना की कितनी किस्में
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के इयन जोंस का कहना है कि किसी व्यक्ति को संक्रमित करने के बाद कोरोना वायरस उसकी सांस की नली में खुद को दोहराने लगता है अथवा रेप्लिकेट करने लगता है। हर रेप्लिकेशन पर उसमें करीब आधा दर्जन आनुवंशिक परिवर्तन होते हैं। पेइचिंग स्थित पेकिंग यूनिवर्सिटी के शियालू तंग और उनके सहयोगियों ने 103 मामलों से लिए गए जीन समूहों का अध्ययन किया। उन्होंने पता लगाया कि जीनोम में दो स्थानों पर एक समान परिवर्तन हुए हैं। इन दो स्थानों पर हुए परिवर्तनों के आधार पर उन्होंने वायरस की दो किस्मों की पहचान की। 72 को एल टाइप और 29 को एस टाइप माना गया। एक अलग अध्ययन से पता चला कि एल टाइप वायरस उस प्रारंभिक एस टाइप से निकला है जो जानवरों से मनुष्य में पहुंचा था। चीनी रिसर्चरों का कहना है कि ये दोनों किस्में विश्व में फैली बीमारी में शामिल हैं। मामलों में एल टाइप के अधिक होने से स्पष्ट है कि यह एस टाइप से ज्यादा आक्रामक है। यह जानना बहुत जरूरी है कि दुनिया में कोरोना की कितनी किस्में मौजूद हैं। दुनिया भर में रिसर्चरों के कई दल वायरस की वैक्सीन खोजने में जुटे हुए हैं। किसी भी वैक्सीन को प्रभावी होने के लिए उसे वायरस के उन फीचर्स को लक्षित करना पड़ेगा जो सभी किस्मों में एक जैसे हों।
महिलाओं पर कम असर
हैरानी की बात यह है कि यह बीमारी सभी लोगों पर एक जैसा असर नहीं डाल रही है। आश्चर्यजनक रूप से इसने आम तौर पर बच्चों को बख्श दिया है। यह वायरस महिलाओं के बजाय पुरुषों को ज्यादा प्रभावित कर रहा है। चीन के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र ने कोरोना वायरस के मामलों का एक विस्तृत विश्लेषण जारी किया है। रिसर्चरों ने पता लगाया है कि पुरुष और महिलाएं लगभग बराबर की संख्या में इस रोग से बीमार हुए हैं लेकिन पुरुषों में मृत्यु दर 2.8 प्रतिशत और महिलाओं में 1.7 प्रतिशत है। इससे पहले सार्स (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम) और मेर्स (मिडलइस्ट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम) ने भी पुरुषों को अधिक प्रभावित किया था। ये दोनों बीमारियां दूसरे किस्म के कोरोना वायरसों की वजह से हुई थीं। एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 2003 में हांगकांग में सार्स से पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा संक्रमित हुई थीं लेकिन पुरुषों में मृत्यु दर 50 प्रतिशत अधिक थी। मेर्स से संक्रमित होने वाले 32 प्रतिशत पुरुषों की मृत्यु हो गई थी जबकि महिलाओं की मृत्यु दर 25.8 प्रतिशत थी। 1918 में इन्फ्लूएंजा महामारी के दौरान भी मरने वालों में युवा पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक थी। वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस के वर्तमान प्रकोप में कई कारक पुरुषों के विरुद्ध काम कर रहे हैं। इनमें कुछ जैविक हैं और कुछ का संबंध जीवनशैली से है। संक्रमण का प्रतिरोध करने में पुरुष महिलाओं से थोड़ा कमजोर पड़ते हैं।
वायरस के कारण ऑटइम्यून बीमारियां
अमेरिका स्थित हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की वैज्ञानिक साबरा क्लाइन का कहना है कि सांस की नली के वायरल इंफेक्शन के मामलों में लगभग यही पैटर्न रहता है। क्लाइन वायरल इंफेक्शनों और वैक्सीनों के प्रभावों में लैंगिक अंतर का अध्ययन करती हैं। उन्होंने कहा कि हमने दूसरे वायरसों के मामलों में भी महिलाओं को ज्यादा मजबूत पाया है। महिलाएं वैक्सिनेशन के बाद अधिक मजबूती के साथ प्रतिरोध उत्पन्न करती हैं। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ से संबद्ध डॉ. जैनाइन क्लेटन ने कहा कि महिलाओं की प्रतिरोध प्रणाली अद्भुत है लेकिन उन्हें कभी-कभी इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है। उन्हें रियुमेटॉयड आर्थराइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियों के शिकार होने के खतरा रहता है। इन बीमारियों में प्रतिरोधी प्रणाली अत्यधिक सक्रिय होकर शरीर के अंगों और टिशुओं पर हमला करने लगती है। ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित होने वालों में 80 प्रतिशत महिलाएं होती हैं। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि महिलाओं के तगड़े प्रतिरोध के कारण क्या हैं। इस विषय पर अभी रिसर्च चल रही है। एक थ्यूरी यह है कि महिलाओं की मजबूत प्रतिरोध प्रणाली उनकी संतानों को शिशु अवस्था में रोगों से लड़ने में मदद करती है। स्तनपान के जरिए माताओं के शरीर से प्रतिरोधी तत्व शिशु के शरीर में पहुंच कर उसे रोगों से लड़ने में मदद करते हैं।
लाइफस्टाइल भी ज़िम्मेदार
महिलाओं की मजबूत प्रतिरोध प्रणाली के पीछे कुछ जैविक कारण भी हो सकते हैं। इनमें मादा सेक्स हार्मोन एस्ट्रोजन शामिल है। शायद प्रतिरोधी प्रणाली में इस हार्मोन की भी कोई भूमिका होती है। एक दूसरी बात यह है कि महिलाओं के पास दो एक्स क्रोमोसोम होते हैं, जिनमें प्रतिरोधी प्रणाली से संबंधित जीन होते हैं। पुरुषों के पास सिर्फ एक एक्स क्रोमोसोम होता है। प्रयोगों के दौरान चूहों का सार्स कोरोना वायरस के साथ संपर्क कराने के बाद रिसर्चरों ने देखा कि नर चूहे मादाओं की तुलना में ज्यादा संक्रमित होते हैं। यह असमानता उम्र के साथ बढ़ती जाती है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. पर्लमैन ने कहा कि नर चूहों में फेफड़ों की क्षति अधिक हुई और उनकी मृत्यु दर भी ज्यादा थी। संक्रमण के प्रभाव लोगों की जीवनशैली से भी तय होते हैं। दुनिया में धूम्रपान करने वालों में चीनी पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा है। चीनी पुरुषों में डाइबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की दर भी महिलाओं की तुलना में बहुत ज्यादा है। ये तमाम चीजें कोरोना वायरस इंफेक्शन के बाद कंप्लिकेशन को बढ़ाती हैं।
चीनी पुरुषों में फेफड़े के क्रोनिक रोग की दर महिलाओं से दुगनी है। चीनी रिसर्चरों ने अप्रकाशित अध्ययनों में कहा है कि जिन मरीजों के निदान में विलंब हुआ या जो निदान के वक्त तीव्र निमोनिया से पीड़ित थे, उनकी मृत्यु की संभावना अधिक होती है। कोरोना वायरस से पीड़ित 4000 मरीजों के एक अध्ययन में शीघ्र निदान की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेकिन पुरुष बीमारी के बहुत बढ़ने के बाद अस्पताल पहुंच रहे हैं। चीन में कोरोना के मुख्य केंद्र हुबेई प्रांत से बाहर पैटर्न कुछ और दिख रहा है। वहां मृत्यु दर बहुत कम है। हालांकि वहां महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा संक्रमित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लैंगिक आधार पर नए वायरस के प्रभावों के बारे में डेटा एकत्र करना और उसका विश्लेषण करना वैज्ञानिकों और आम जनता दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। बीमारी फैलने के बाद से ही जन स्वास्थ्य अधिकारी इंफेक्शन को रोकने के लिए अच्छी तरह से बार-बार हाथ धोने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। लेकिन अनेक अध्ययनों से पता चला है कि पुरुष महिलाओं की तुलना में बहुत कम हाथ धोते हैं या बहुत कम बार साबुन का इस्तेमाल करते हैं। इनमें स्वास्थ्य कर्मचारी भी शामिल हैं।
कई दिन हवा में रह सकता है कोरोना
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया लॉस एंजिलिस और सेंटर्स फॉर डिजीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के रिसर्चरों ने पता लगाया है कि कोविड-19 रोग उत्पन्न करने वाला कोरोना वायरस कई घंटे या कई दिनों तक हवा में स्थिर रह सकता है। यह वायरस तांबे की सतह पर चार घंटे, कार्डबोर्ड पर 24 घंटे और प्लास्टिक तथा स्टेनलेस स्टील की सतह पर दो से तीन दिन तक स्थिर रह सकता है। इस अध्ययन से पता चलता है कि लोग हवा से या प्रदूषित सतहों को छू कर भी इस वायरस की चपेट में आ सकते हैं। अध्ययन से एक बात और सामने आई कि लोग लक्षणों को पहचाने बगैर या इन्हें पहचानने से पहले ही यह वायरस फैला रहे होंगे। इन परिस्थितियों में रोग को नियंत्रित करना और भी मुश्किल हो जाता है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में दावा किया गया है कि कोविड-19 उन लोगों से भी फैल सकता है, जिनमें बीमारी के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं या बहुत हल्के लक्षण होते हैं। एक चीनी अध्ययन के अनुसार कोरोना के प्रत्येक पुष्टि वाले के साथ कम्युनिटी में पांच-दस लोग ऐसे थे, जिनके लक्षण डिटेक्ट नहीं हुए या उनमें हल्के लक्षण थे। चीन में 23 जनवरी को लॉकडाउन होने से पहले 79 प्रतिशत इंफेक्शन के स्रोत ऐसे लोग थे, जिनका निदान नहीं हुआ था।
सोशल मीडिया पर दावे भ्रामक
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस को लेकर किए जा रहे तरह-तरह के दावों से सावधान रहने को कहा है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि लोग दस सेकेंड तक अपनी सांस रोक कर यह टेस्ट कर सकते हैं कि उनमें कोरोना वायरस का संक्रमण है या नहीं। यदि वे बिना खांसी किए अपनी सांस रोक सकते हैं तो समझो कि उनमें वायरस नहीं है। स्टेनफर्ड हॉस्पिटल बोर्ड के एक सदस्य के हवाले से यह पोस्ट ट्विटर, फेसबुक और ईमेल के जरिए बहुत प्रसारित हुई। स्टेनफर्ड हेल्थ केयर की एक प्रवक्ता लीसा किम ने कहा कि इस खतरनाक पोस्ट का स्टेनफर्ड से कोई संबंध नहीं है।
अमेरिका में टैक्सास स्थित बेलोर कॉलेज ऑफ मेडिसन के संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. रॉबर्ट लेगारे एटमर ने वायरस को लेकर चल रहे बहुत से दावों को खारिज किया है।

  • दावा : पानी पीने से आप कोरोना वायरस से बच जाएंगे। हर 15 मिनट बाद पानी पीने से वायरस गले से होकर आंतों में पहुंच जाएगा और अमाशय के अम्ल उसे नष्ट कर देंगे। यदि समुचित मात्रा में पानी नहीं पिएंगे तो वायरस सांस की नली से होकर फेफड़ों में पहुंच जाएगा।
  • सच : डॉ, एटमर ने कहा कि सांस की नली को प्रभावित करने वाले किसी भी वायरस से अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है।
  • दावा : नमक मिले गुनगुने पानी से गरारे करने से कोरोना वायरस को रोका जा सकता है।
  • सच : एटमर ने कहा कि रेस्पिरेट्री वायरसों के बारे में अब तक के डेटा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नमकीन पानी इस मामले में कारगर नहीं हो सकता।
  • दावा : यदि आप की नाक बह रही है तो यह मामूली सर्दी-जुकाम है।
  • सच : नाक का बहना फ्लू, एलर्जी और दूसरी बीमारी का लक्षण भी हो सकता है।
  • दावा : यदि आपको कोरोना वायरस है तो निमोनिया भी ज़रूर होगा।
  • सच: यह बात पूरी तरह से सही नहीं है। कोरोना वायरस के लक्षण हर मरीज में अलग-अलग हो सकते हैं। हर मरीज को गले में खराश नहीं होगी । गले में खराश वाले हर मरीज में कोरोना वायरस नहीं हो सकता और कोरोना के सभी मरीजों को निमोनिया नहीं होगा।
  • दावा : कोरोना वायरस के मरीज को डूबने जैसी अनुभूति होती है।
  • सच : डॉ. एटमर ने कहा कि यह बात सही नहीं है।
  • दावा : कोरोना वायरस के मरीज के अस्पताल में दाखिल होने तक उसके फेफड़ों में फाइब्रोसिस हो जाता है। फाइब्रोसिस में फेफड़ों के टिशू विक्षत होने लगते हैं।
  • सच : एटमर ने कहा यह सूचना मिथ्यापूर्ण है। फाइब्रोसिस बहुत कम मरीजों में होता है। 80 प्रतिशत मरीजों में बीमारी के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं। अतः यह सूचना सही नहीं है।

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