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अवसाद से लड़ें मनोवैज्ञानिक युद्ध

Posted On March - 25 - 2020

खौफ के बीच

सिम्मी वड़ैच

आज जब कोराना वायरस वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है, ऐसे में हमारे सामने ऐसी स्थिति बन आई है जो इससे पहले इतिहास में कभी नहीं रही थी। फिलहाल कोविड-19 से होने वाले संक्रमण में भले ही मृत्यु दर केवल 1-2 प्रतिशत है, परंतु यह वायरस जिस तेजी से बढ़ रहा है, उससे आशंका है कि कम लगने वाला यह आंकड़ा आगे चलकर विकराल न हो जाए। दुनिया के देशों ने अपने नागरिकों को सुरक्षित सामाजिक दूरी बनाने और एक जगह ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगा दिए हैं ताकि वायरस का फैलाव होने से रोक जा सके।
हालांकि, ज्यादातर लोगों में संक्रमण का अपेक्षाकृत हल्के स्तर का असर रहने का अनुमान है, लेकिन यदि गंभीर मामलों की तादाद बढ़ गई तो जनसंख्या के हिसाब से यह संख्या भी बहुत बड़ी बन जाएगी और इन्हें संभालना अत्यंत मुश्किल हो जाएगा।
जैसे कि रोकथाम संबंधी चेतावनी दी गई है कि इन निर्देशों से नोवेल कोरोना वायरस को लेकर मन में बहुत ज्यादा भय व्याप्त होना लाजिमी है और जो लोग पहले से ही ऑबसेसिव कम्पलसिव सिंड्रोम (ओसीडी) यानी किसी वहम विशेष से ग्रसित हैं उनके लिए स्थिति और विकट बन जाएगी। ओसीडी से ग्रस्त व्यक्तियों की एक किस्म उनकी होती है, जिन्हें संक्रमण और साफ-सफाई को लेकर बहुत ज्यादा चिंता हर वक्त सताती रहती है। अब जब कोरोना वायरस के चलते स्वास्थ्य विभाग कहता है कि हाथों पर साबुन कम से कम 20 सेकंड लगाकर रखा जाना चाहिए, ऐसे में यह कदम ओसीडी वालों में डर की नई कड़ी जोड़ देंगे कि क्या हाथ सही ढंग से धुले हैं या नहीं या फिर यह शक बना रहना कि कहीं धुलाई का वक्त 20 सेकंड से कम तो नहीं रह गया, और वे और ज्यादा मर्तबा हाथ धोने लगेंगे। कुछ लोग खुद को तसल्ली देने के लिए इंटरनेट पर कोरोना को लेकर क्या करना है और क्या नहीं, इसके बारे में लगातार सर्च करते हैं। चूंकि इंटरनेट पर बहुत ज्यादा ऐसी जानकारियां होती हैं जो भ्रामक होती हैं, ऐसे में सच्चाई और अफवाहों में भेद करना मुश्किल है। लिहाजा इनको पढ़ने के बाद उसके अंदर और ज्यादा डर पैठ कर जाता है।
इसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी व्यग्रता, जिसे हाइपोकोंड्रियासिस कहते हैं, यह ओसीडी से संबंधित अन्य लक्षण है, जो व्यक्ति के अंदर इस कदर व्याप्त हो सकती है, जिससे उसके अंदर यह डर पैदा हो सकता है कि मानो कोरोना वायरस ने ‘डस’ ही लिया है, भले ही वह किसी संक्रमण वाली स्थिति या व्यक्ति के संपर्क में आया भी न हो।
जिन लोगों में इस बात को लेकर व्यग्रता भरा डर व्याप्त होता है कि कुछ न कुछ बुरा होकर रहेगा, ऐसा उनके लिंबिक सिस्टम में गड़बड़ होने की वजह से होता है, इसमें एमिग्डाला ग्रंथि या तो अति सक्रिय होती है या बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाती है। यह आगे एड्रिनल और नॉन-एड्रिनल नामक रसायन बनाती है, जिसकी वजह से उसके शरीर में व्यग्रता भरे शारीरिक लक्षण पैदा होने लगते हैं मसलन दिल की धड़कनों का अचानक बढ़ना, बहुत ज्यादा पसीना आना, मुंह सूखना, सिर भारी रहना इत्यादि।
व्यग्रता अनजाने भय का परिणाम है, इसलिए इंटरनेट का इस्तेमाल करना कम कीजिए। व्हाट्सएप मैसेज और सोशल मीडिया साइट्स से दूर रहें क्योंकि इन पर बहुत ज्यादा गलत जानकारी होती है। केवल विश्वसनीय साइट्स जैसे कि डब्ल्यूएचओ और सरकारी वेबसाइट्स पर जाएं। जरूरी हो तो इसका प्रयोग दिन में 30 मिनट से ज्यादा न करें।
तीन स्वस्थ आदतों को याद रखें : यथेष्ट नींद अच्छा पोषण। दैनिक खुराक में 50-70 ग्राम प्रोटीन, विटामिन, फाइबर और यथेष्ट मात्रा में पानी लें। नियमित व्यायाम, जिसमें 45 मिनट पैदल चलना, योग, ऐरोबिक इत्यादि शामिल हो सकता है। गहरे श्वास वाले व्यायाम जैसे कि प्राणायाम, अनुलोम-विलोम और भ्रामरी इत्यादि करना फायदेमंद होता है, नित्य शवासन मुद्रा में योग-निद्रा लें।
ऐसा करते वक्त ध्यान अपने शरीर पर केंद्रित करना आसान क्रिया है क्योंकि आपको अपने शरीर के प्रति जागरूक होना चाहिए कि आप कैसे बैठते हैं, जमीन पर चलते समय कदम कैसे रखते हैं, अपनी पीठ, भुजाओं, गर्दन की मुद्रा के बारे में ख्याल करें। एक सतत प्रक्रियाबद्ध लय में नाक से सांस अंदर खींचने से लेकर छोड़ने तक के अंतराल में उसके अंदरूनी सफर पर ध्यान दें। इस तरह दस बार श्वास अभ्यास करें। अगर, आपका ध्यान भटकता है तो उसे सहजता से वापस केंद्रित करें। कल्पना करें कि आपकी व्यग्रता और डर बुलबुला बनकर बाहर निकल रहे हैं।
कुछ सरल गतिविधियां अपनाएं मसलन बगीचे पर ध्यान करना, कुछ व्यंजन बनाना, धीमा नृत्य, चित्रों में रंग भरने वाली पुस्तिकाएं मंगवाएं और उन्हें भरें। ऐसे व्यक्ति से बात करें जो आपकी जिंदगी में महत्वपूर्ण है और जिससे आप बहुत वक्त से बात तो करना चाहते थे लेकिन इसके लिए समय नहीं था। ऐसी वस्तुओं को हटा दें जो सालों से आप इकट्ठा किए बैठे हैं लेकिन किसी काम की नहीं हैं। कम से कम वस्तुओं या भौतिक चीजों से गुजारा करना सीखें। जो वस्तुएं किसी अन्य के काम की हैं उन्हें दे डालें।
विगत में विकट स्थितियों से आप कैसे निकलें, इसे कलमबद्ध करें और फिर से खुद को याद दिलवाएं कि एक बार में एक कदम उठाया जाए।
अपनी अंदरूनी सामर्थ्य और जीवन में मिली जिन नियामतों को लेकर आप शुक्रगुजार हैं उसको लेकर खुद को पत्र लिखें। जो विचार सहायक नहीं हैं वह भी लिखें और उन्हें यथार्थवादी विचारों में कैसे बदला जा सकता है, यह सीखें।
खुद को सोशल मीडिया इस्तेमाल की इजाजत तभी दें जब आप अपना रोजाना 45 मिनट का व्यायाम और गहरी श्वास क्रिया कर चुके हों।
अपने सबसे बुरे डर के बारे में लिखना और उसको ऊंची आवाज में रोज पढ़ना। ऐसा करना इस किस्म के विचारों के अवसान में सहायक होता है।


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