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ॐ आकार के द्वीप पर विराजमान ओंकारेश्वर

Posted On February - 16 - 2020

सुमन बाजपेयी
इंदौर से 77 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के तट पर स्थित है भगवान शिव का ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग। यह संपूर्ण भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस स्थान पर नर्मदा नदी दो भागों में बंट कर मान्धाता द्वीप का निर्माण करती है, जिसका आकार ॐ के समान है।
ओंकारेश्वर ही एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जिसके तट को छूकर कोई नदी जाती है। मान्यता है कि मां नर्मदा शिव के पसीने की बूंद से ही निकली हैं, इसलिए उनकी मानस पुत्री मानी गई हैं। वही एकमात्र ऐसी नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और जिसमें जितने कंकर हैं, उन सबको शिवलिंग माना जाता है। इसके ऊपरी शिखर पर भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यह पर्वत ही ओंकाररूप है। यहां पहुंचने के लिए एक झूला पुल पार करना होता है, जिसके एक तरफ फूल और प्रसाद बेचने वालों की कतारें लगी रहती हैं।
ओंकारेश्वर मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग है। माना जाता है कि यहां शिवलिंग में बह्मा, विष्णु और महेश वास करते हैं। जो अखंड दीप यहां जलता है, उसमें प्राचीन समय में तीन बत्तियां जलती थीं। ओंकारेश्वर शिवलिंग के ऊपर निरंतर जल अर्पित होता रहता है। दिन में तीन बार दूध, दही और नर्मदा के जल से अभिषेक किया जाता है। यहां की शयन आरती प्रसिद्ध है। शिवलिंग के सम्मुख शिव व पार्वती के लिए एक बिछौना लगाया जाता है। शयन पूर्व चौपड़ का खेल खेला जाता है। माना जाता है कि इस स्थान पर शिव, मां पार्वती के साथ विश्राम करते हैं, इसलिए यहां शयन आरती की जाती है। मंदिर का मंडप बेहद आकर्षक है। लगभग 60 ठोस पत्थर के स्तंभों पर आकृतियां बनी हुई हैं। मंदिर के चारों ओर भित्तियों पर देवी-देवताओं के चित्रों की नक्काशी देखी जा सकती है। मंदिर की पांच मंजिलें हैं, जहां अलग-अलग देवता स्थापित हैं- श्री ओंकारेश्वर, श्री महाकालेश्वर, श्री सिद्धनाथ, श्री गुप्तेश्वर एवं ध्वजाधारी शिखर देवता। मुख्य मंदिर के चारों तरफ कई छोटे मंदिर हैं, जैसे पंचमुखी हनुमान मंदिर, शनि मंदिर एवं द्वारकाधीश को समर्पित मंदिर।
विंध्य की तपस्या से प्रसन्न होकर दिये थे दर्शन
एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार नारद ऋषि विंध्य पर्वत से मिलने पहुंचे। अहंकार से भर पर्वत ने नारद का अपमान करते हुए कहा, मैं तो सर्वगुण संपन्न हूं, मेरे पास हर प्रकार की संपदा है और मुझ में कोई कमी भी नहीं है। नारद बोले, माना तुम्हारे पास सब कुछ है, पर मेरू पर्वत जितने तुम ऊंचे नहीं हो। नारदजी की बात सुनकर विंध्य पर्वत दुखी हो गया और मेरु पर्वत की ऊंचाई से उसे ईर्ष्या हुई। उसने तय किया कि वह भगवान शंकर जी की शरण में जाएगा और उनकी तपस्या वहां करेगा, जहां साक्षात ओंकार विद्यमान हैं। उसने मिट्टी का शिवलिंग बनाया और भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगा। कई वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव उस पर प्रसन्न हुए और अपने दिव्य स्वरूप के दुर्लभ दर्शन दिए। भगवान शिव ने उसे हर कार्य सिद्ध करने वाली अभीष्ट बुद्धि प्रदान करते हुए वरदान दिया। उसी क्षण देवतागण और कुछ ऋषि-मुनि भी वहां पहुंचे। उन्होंने शिवजी की विधिवत पूजा की और अनुरोध किया कि भोलेनाथ आप हमेशा के लिए यहां स्थापित होकर निवास करें। शिवजी ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। वहां स्थित ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। एक शिवलिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर एवं अमलेश्वरज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ।
परिक्रमा का भी महत्व : ओंकारेश्वर द्वीप के चारों ओर 7 किलोमीटर लंबा परिक्रमा पथ है। बोट के जरिये भी यह परिक्रमा की जा सकती है। नर्मदा के बीच से गुजरते हुए परिक्रमा के दौरान विभिन्न मंदिरों को देखना भी किसी अभूतपूर्व अनुभव से कम नहीं है। इसी परिक्रमा के दौरान उस जगह पहुंचते हैं जहां नर्मदा व कावेरी नदी का संगम होता है।
ममलेश्वर : यह मंदिर ओंकारेश्वर के ज्योतिर्लिंग का आधा भाग है। यह ओंकारेश्वर मंदिर के पास ही नर्मदा के दक्षिण तट पर, गोमती घाट के समीप, मुख्य भूमि पर स्थापित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन बिना ओंकारेश्वर की तीर्थ यात्रा पूरी नहीं होती। बाहर से ही उसका वास्तुशिल्प व शैली एक अद्भुत अनुभूति से भर देती है। एक परिसर के भीतर निर्मित, इसमें 7 विभिन्न मंदिर हैं। मंदिर परिसर के चारों ओर भ्रमण करने पर तराशी हुई विशाल पाषाणभित्तियां, गुजरे समय में खींच कर ले जाती हैं। ममलेश्वर मंदिर 10वीं सदी में बनाया गया था। यह मंदिरों का एक छोटा सा समूह है और एक संरक्षित प्राचीन स्मारक है। यहां भगवान शिव, शिवलिंग रूप में पवित्र स्थान के केंद्र में मौजूद हैं। पार्वती माता की मूर्ति दीवार पर मौजूद है।


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