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सृष्टि के विकास का सार अर्धनारीश्वर

Posted On February - 16 - 2020

प्रमोद भार्गव
पुराणों में भगवान शिव की कल्पना एक ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के रूप में की गई है, जिसका आधा शरीर स्त्री का और आधा पुरुष का है। शिव का यह स्त्री व पुरुष मिश्रित शरीर अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण के अनुसार शिव को इस रूप-विधान में परम पुरुष ब्रह्मात्मक मानकर, ब्रह्म से भिन्न उसकी शक्ति माया को स्त्री के आधे रूप में चित्रित किया गया है। शिव का रूप अग्नि एवं सोम अर्थात सूर्य एवं चंद्रमा के सम्मिलन का भी स्वरूप है। यानी पुरुष का अर्धांश सूर्य और स्त्री का अर्धांश चंद्रमा का प्रतीक है। यह भी पुराण सम्मत मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिव और शक्तिरूपा पार्वती हुए थे। कथा में यह भी है कि इसी दिन शिव अत्यंत क्रोधित हुए और संपूर्ण ब्रह्मांड के विनाश के लिए विश्व प्रसिद्ध तांडव नृत्य करने लगे। शिव स्वयं यह मानते हैं कि स्त्री-पुरुष समेत प्रत्येक प्राणी की ब्रह्मांड में स्वतंत्र सत्ता स्थापित है। इसे ही वैयक्तिक रूप में ब्रह्मात्मक या आत्मपरक माना गया है।
अर्धनारीश्वर के संदर्भ में यह प्रमुख कथा प्रचलन में है, कि जब ब्रह्मा ने सृष्टि के विधान को आगे बढ़ाने की बात सोची और इसे साकार करना चाहा, तो उन्हें इसे, अकेले पुरुष रूप में आगे बढ़ाना संभव नहीं लगा। तब उन्होंने शिव के सामने अपना मंतव्य प्रकट किया। शिव ने ब्रह्मा के मूल भाव को समझते हुए उन्हें अर्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिए। अर्थात स्त्री और पुरुष के सम्मिलन से सृष्टि के विकास की परिकल्पना दी। इस सूत्र के हाथ लगने के बाद ही ब्रह्मा सृष्टि के क्रम को निरंतर गतिशील बनाए रखने का विधान रच पाए। सच्चाई भी यही है कि स्त्री व पुरुष का समन्वय ही सृष्टि का वास्तविक विधान है। इसीलिए स्त्री को प्रकृति का प्रतीक भी माना गया है। अर्थात प्रकृति में जिस तरह से सृजन का क्रम जारी रहता है, मनुष्य-योनी में उसी सृजन प्रक्रिया को स्त्री गतिशील बनाए हुए है। अर्धनारीश्वर यानी आधे-आधे रूपों में स्त्री और पुरुष की देहों का आत्मसात हो जाना, शिव-गौरी का वह महासम्मिलन है, जो सृष्टि के बीज को स्त्री की कोख, अर्थात प्रकृति की उर्वरा भूमि में रोपता है। सृष्टि के इस आदिभूत मातृत्व व पितृत्व को पुराणों की प्रतीकात्मक भाषा में पार्वती-परमेश्वर या शिव-पार्वती कहा गया है। अर्थात शिव, शक्ति के साथ संयुक्त होकर अर्धनारीश्वर बन जाते हैं। इसलिए कहा गया है कि शक्ति यानी स्त्री को स्वीकार किए बिना पुरुष अपूर्ण है। उसे शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। स्त्री के सहयोग के बिना कोई कल्पना फलित नहीं हो सकती।
शिव-लिंग का रहस्य जाने बिना, शिव-महिमा का बखान अधूरा है। इसलिए लिंग के प्रकृति से जुड़े महत्व और इसकी पूजा के कारण भी जानना जरूरी हैं। वैसे आम प्रचलन में तो यही मान्यता है कि शिव और शक्ति दोनों का संयोगात्मक प्रतीक ही शिव-लिंग है। और यही इनकी माया है। लेकिन, स्कंदपुराण में इसका अर्थ प्रकृति की चेतना से संबंधित है, अर्थात‍् आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। यह आकाश इसलिए लिंग कहलाता है, क्योंकि इसी में समस्त देवताओं का निवास है और इसी में वे गतिशील रहते हैं। आकाश को पुराणकारों ने इसलिए भी लिंग माना है, क्योंकि इसका स्वरूप शिव-लिंग जैसा अर्ध-वृत्ताकार है। दूसरे वह पृथ्वी रूपी पीठिका पर स्थित या अधिरोपित होने जैसा दिखाई देता है। प्रकृतिमय इसी लिंग के आकार का वर्णन लिंग पुराण में है। इसके अनुसार सभी लोकों का स्वरूप लिंग के आकार का है। इसी लिंग में ब्रह्मा समेत सभी चर-अचर जीव, बीज स्वरूप लघु रूपों में प्रतिष्ठित हैं। शिवपुराण में शिव-लिंग को चैतन्यमय और लिंगपीठ को अंबामय बताया गया है। किंतु लिंग पुराण में लिंग को शिव और उसके आधार को शिव-पत्नी बताया गया है। यहीं से यह मान्यता लोक प्रचलन में आई कि शिव-लिंग उमा-महेश के प्रतीक स्वरूप हैं।
इस प्रसंग में शिव के वाहन नंदी यानी वृषभ का वर्णन जरूरी है। नंदी शिव के वाहन के रूप में इसलिए उपयुक्त हैं, क्योंकि वृषभ लोकव्यापी प्राणी होने के साथ खेती-किसानी का भी प्रमुख आधार है। यांत्रिकीकरण होने से पहले बिना बैल के खेती संभव ही नहीं थी। फिर शिव ने लोक-कल्याण की दृष्टि से सर्वहारा वर्ग के ज्यादा हित साधे हैं, उन्हीं के बीच उन्होंने अधिकतम समय बिताया है। इसलिए ऐसे उदार नायक का वाहन बैल ही सर्वोचित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के रहस्यों की गवेषणा की आरंभिक अवस्था में ही समझ लिया था कि प्रकृति के अन्य जीव-जगत के साथ ही मनुष्य का सह-अस्तित्व संभव व सुरक्षित है। इसी कारण सभ्यता और संस्कृति का विकास क्रम जैसे-जैसे आगे बढ़ा, वैसे-वैसे अलौकिक शक्तियों में प्रकृति के रूपों को प्रक्षेपित करने के साथ, पशु-पक्षियों को भी देवत्व से जोड़ते गये। पुराणों में वृषभ को धर्म-रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनके चार पैरों को सत्य, ज्ञान, तप और दान का प्रतीक माना गया है। यह भी माना जाता है कि शिव-लिंग की उत्पत्ति विद्युत तरंगों से हुई। इसके आकार को ब्रह्मांड का रूप माना गया है। इस कारण शिव को विद्युताग्नि और नंदी को बादलों का प्रतीक माना गया है। बादल के प्रतीक होने के कारण ही शिव के नंदी शुभ्र-श्वेत हैं।


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