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सामाजिक सरोकार का सिनेमा

Posted On February - 15 - 2020

दीप्ति अंगरीश

हमारे समाज में सिनेमा का अटूट प्रभाव पड़ता है। यूं कहें कि सिनेमा से ही समाज की मानसिकता बनती व बिगड़ती है। यही नहीं, बहुतेरे दर्शक अपने पसंदीदा अभिनेता-अभिनेत्री और उनके अविस्मरणीय किरदारों से प्रभावित रहते हैं। उनके जैसे कपड़े, उनके जैसा हेयर स्टाइल, उनके जैसा किरदार और उनकी जैसी सोच असल जिंदगी में अपनाते हैं। कितनी कमाल की बात है कि हम इतने कम समय में काल्पनिक पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। कई निर्देशकों ने लीक से हटकर फिल्में बनाई हैं। उनका लक्ष्य फिल्म से मनोरंजन नहीं, बल्कि मजबूत समाजिक संदेश देना भी है। बात करते हैं जिम्मेदार सिनेमा की कुछ बेहतरीन सामाजिक संदेश देती फिल्मों की।
ओएमजी! ओह माई गाॅड
हमारे समाज में धर्म के प्रति विविध प्रकार के अाडंबर और अंधविश्वास अटे पड़े हैं। आलम तो यह है कि लोग धर्म गुरुओं और कथा वाचक को ही भगवान समझते हैं। ऐसे जीवंत भगवान के प्रति अंधविश्वास इतना है कि वे अपना पैसा व इज्जत सब दांव पर लगा देते हैं। ऐसे अंधविश्वास को लोगों के आगे प्रस्तुत किया है ओएमजी में। कमाल की बात है कि इस तीखी बात पर करारा प्रहार निर्देशक उमेश शुक्ला ने काॅमेडी वाले अंदाज में किया है। इस फिल्म में विश्वास और अंधविश्वास के बीच सूक्ष्म अंतर को बारीकी से दिखाया गया है।
टॉयलेट-एक प्रेम कथा
श्री नारायण सिंह द्वारा निर्देशित साल 2017 में आई टॉयलेट-एक प्रेम कथा हिंदी भाषा की कॉमेडी-ड्रामा फिल्म है। यह फिल्म भारत में स्वच्छता की स्थिति में सुधार करने के लिए सरकारी अभियानों के समर्थन में एक व्यंग्यपूर्ण कॉमेडी है, जिसमें खुले में शौच के उन्मूलन पर जोर दिया गया है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। फिल्म भारत की शौचालय समस्या पर प्रकाश डालती है। आज भी भारत में बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय नहीं हैं। यदि है भी तो साझे, जहां गली, मोहल्ले के सभी लोग जाते हैं। और तो और, शर्म के कारण महिलाएं इसे इस्तेमाल नहीं करतीं। उनके लिए शौचालय है दूरदराज के खेत या जंगल या कंटीला या सुनसान इलाका। कई बार यही यौन उत्पीड़न का कारण बनता है। यह एक बुनियादी जरूरत है, जिसका इस फिल्म ने संदेश दिया है।
तारे ज़मीं पर
साल 2007 में आई फिल्म ‘तारे ज़मीं पर’ ईशान के जीवन और कल्पना की खोज करती है, जो एक 8 वर्षीय डिस्लेक्सिक बच्चा है। वह कला में उत्कृष्ट है, उसके खराब शैक्षणिक प्रदर्शन से उसके माता-पिता उसे एक बोर्डिंग स्कूल में भेजते हैं। ईशान के आर्ट टीचर को पूरा विश्वास है कि ईशान डिस्लेक्सिक है और वो इसे दूर करने में उसकी मदद कर सकते हैं। दर्शील सफरी 8 वर्षीय ईशान के रूप में, और आमिर खान ने कला शिक्षक की भूमिका निभाई। फिल्म स्पेशल चाइल्ड की जरूरतों के बारे में है।
दामिनी
राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित साल 1993 में रिलीज यह फिल्म अपराध ड्रामा है। इस फिल्म में दिखाया है कि कैसे एक महिला न्याय के लिए समाज से लड़ती है। यह फिल्म बॉलीवुड में अब तक बनी महिला केंद्रित फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ है।
मर्दानी
फिल्म मर्दानी की कहानी शिवानी शिवाजी रॉय के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक पुलिसकर्मी है। रानी मुखर्जी द्वारा अभिनीत शिवानी किशोर लड़की के अपहरण के केस की परतें खोलती है, जहां उसे भारतीय माफिया द्वारा मानव तस्करी के रहस्यों का पता चलता है। यह फिल्म महिला की बहादुरी को दर्शाती है और मानव तस्करी पर कड़ा प्रहार करती है।
पीपली लाइव
आए दिन किसान आत्महत्या कर रहा है। कारण कर्जा या सूखी ज़मीन या गरीबी। यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। और तो और किसानों की बदहाली की कोई सुध नहीं लेता। नेता, मंत्री आश्वासन देते हैं, पर सटीक उपाय नहीं देते। साल 2010 में रिलीज फिल्म पीपली लाइव ने भारत के इस सबसे बड़े सामाजिक मुद्दे यानी किसानों की आत्महत्या की बात की है।
मातृभूमिः ए नेशन विदआउट वुमन
सामाजिक मुद्दे यानी कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित यह फिल्म देश के भविष्य को दिखाती है। यदि लड़कियों को मारते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब देश ही नहीं रहेगा। आज भी भारत में कई जगहों पर लड़कियों को जन्म के समय ही मार दिया जाता हैै। यह फिल्म एक लड़की की कहानी के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी शादी पांच भाइयों से होती है। फिल्म क्रूर समाज की झलक दिखाती है और एक बच्ची को बचाने का संदेश देती है।
जॉली एलएलबी
जॉली एलएलबी साल 2013 में रिलीज लीगल कॉमेडी फिल्म है। इसे सुभाष कपूर ने लिखा और निर्देशित किया है। फिल्म में अरशद वारसी, बोमन ईरानी और अमृता राव मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म वकील जगदीश त्यागी के जीवन के आसपास घूमती है। इसकी कहानी साल 1999 के संजीव नंदा के हिट-एंड-रन मामले और प्रियदर्शनी मट्टू मामले के एक संदर्भ से प्रेरित है।
पिंक
फिल्म पिंक के शीर्षक का लड़कियों के पसंदीदा रंग पिंक से कोई संबंध नहीं है। यह फिल्म यह संदेश देती है कि महिलाओं को खुलकर बोलने और रात में स्वतंत्रत चलने की आज़ादी होनी चाहिए। साथ ही देश में महिलाओं की सुरक्षा हेतु सोचने को विवश करती है।
अ वेडनेसडे
फिल्म अ वेडनेसडे (2008) ने आम आदमी की ताकत के बारे में बताया है। यह फिल्म अब तक की बेस्ट थ्रिलर फिल्मों में गिनी जाती है और आम आदमी से जुड़ी ऐसी बात आज तक किसी फिल्म में देखने को नहीं मिली है। नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर की इस फिल्म में दिखाया गया है कि जब एक आम आदमी का दिमाग सटक जाता है तो वो किस हद तक जा सकता है। ऐसे सब्जेक्ट पर बनी फिल्म पहले देखने को नहीं मिली। नीरज पांडे द्वारा निर्देशित ये फिल्म भले ही छोटे बजट पर बनी थी, लेकिन इस फिल्म ने ऑडिएंस को ऐसा झकझोरा कि ये बॉक्स ऑफिस पर अच्छी-खासी कमाई कर गई।
बजरंगी भाईजान
साल 2015 में रिलीज फिल्म बजरंगी भाईजान में अभिनेता सलमान खान ने भगवान हनुमान के एक भक्त बजरंगी की भूमिका निभाई है, जो छह साल की पाकिस्तानी मुस्लिम लड़की को उसके माता-पिता से मिलवाता है। बच्ची भारत में अलग होती है और बजरंगी उसे माता-पिता से मिलवाने पाकिस्तान की यात्रा करता है। इस फिल्म में दिया गया प्यार, करुणा और सहानुभूति का संदेश सभी के दिलों को छू गया।
पैड मैन
अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म पैडमैन तमिलनाडु के उद्यमी अरुणाचलम मुरुगनाथम की कहानी से प्रेरित है, जिन्होंने अपने गांव की महिलाओं के लिए सस्ते सैनिटरी नैपकिन बनाए। पद्मश्री (2016) प्राप्त मुरुगनाथम ने बड़ी मात्रा में सैनिटरी पैड बनाने के लिए कम लागत वाले सैनिटरी पैड बनाने की मशीन का आविष्कार किया है।
आर्टिकल 15
एक अपराध जांच के माध्यम से, यह फिल्म आर्टिकल 15 (2019) निचली जाति की दुर्दशा और जाति व्यवस्था की बुराइयों को उजागर करती है। यह समस्या काल्पनिक नहीं है। यह हमारे समाज में व्याप्त है।
हिंदी मीडियम
साल 2017 में आई फिल्म हिंदी मीडियम ने हमारे देश की शिक्षा प्रणाली की खामियों पर प्रकाश डाला है। साथ ही इस फिल्म ने बच्चों की शिक्षा के लिए माता-पिता के सामने आने वाली परेशानियों के बारे में बताया।
डोर
फिल्म डोर (2006) नारेबाजी किए बिना एक मजबूत नारीवादी बयान देती है। यह दर्शाती है कि आधुनिक भारत में आज भी विधवा महिलाओं के साथ कैसा सुलूक किया जाता है। साथ ही इस फिल्म में क्षमा की शक्ति का संदेश भी है।
छपाक
फिल्म छपाक (2020) मेघना गुलजार द्वारा निर्देशित और फॉक्स स्टार स्टूडियोज के सहयोग द्वारा निर्मित है। यह फिल्म लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर आधारित है। लक्ष्मी एसिड अटैक सर्वाइवर है। यह फिल्म दीपिका पादुकोण और विक्रांत मैसी द्वारा अभिनीत है। यह फिल्म तेजाब पीड़ितों की व्यथा को बयां करती है।


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