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सामग्री की क्षति के लिए डाक विभाग ज़िम्मेदार

Posted On February - 16 - 2020

उपभोक्ता अधिकार

पुष्पा गिरिमाजी
मैंने अपनी नातिन के जन्मदिन पर उसके लिए स्पीड पोस्ट के जरिये कुछ कीमती वस्त्र भेजे। जब वह पैकेट मेरी बेटी के पास पहुंचा तो वह खुला था और उसमें मेरे द्वारा भेजी गई तीन में से सिर्फ एक ही पोशाक थी। पोस्ट ऑफिस ने गुम हुए दो ड्रेस की कीमत लौटाने से इनकार कर दिया। क्या मैं उपभोक्ता अदालत के जरिये मुआवजा ले सकता हूं?
डाक विभाग हमेशा भारतीय डाक कार्यालय के पुराने अधिनियम, 1898 की धारा 6 का हवाला देकर स्पीड पोस्ट के माध्यम से भेजी गई वस्तुओं के नुकसान, गलत वितरण, देरी से वितरण या क्षति के लिए देयता से प्रतिरक्षा का दावा करता है। विभाग भारतीय डाक कार्यालय के उन नियमों का भी हवाला देता है, जिनमें कहा गया है कि वस्तु के खोने, नुकसान होने पर स्पीड पोस्ट चार्ज को दोगुना या 1000 रुपये, दोनों में से जो कम हो, को दिया जाएगा। हालांकि, शीर्ष उपभोक्ता अदालत का हालिया निर्णय आपको मुआवजा दिलाने में मदद करेगा। मुझे उम्मीद है कि आपके पास स्पीड पोस्ट की रसीद होगी, जिसमें भेजी गई पोशाकों की संख्या और तोड़े-मोड़े गए पैकेट की तस्वीरें और आपकी बेटी द्वारा पोस्ट ऑफिस को की गयी शिकायत की प्रति होगी।
क्या आप इस हालिया केस का विवरण दे सकते हैं?
इस फैसले के महत्व को समझने के लिए, आपको यह जानने की जरूरत है कि अदालतें पूर्व में ऐसी ही शिकायतों से कैसे निपटती रही हैं। लंबे समय तक, उपभोक्ता न्यायाधिकरणों ने इस आधार पर डिफाल्ट- स्पीड पोस्ट द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के खिलाफ कोई राहत नहीं दी, भारतीय डाकघर अधिनियम की धारा 6 के तहत प्रदान की गई प्रतिरक्षा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। उदाहरण के तौर पर भारत संघ बनाम पूरन चंद्र जोशी (30 मार्च, 2006 में 2005 के आरपी नंबर 114) के मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कहा कि स्पीड पोस्ट के देरी से वितरण के लिए वैधानिक रूप से तय चार्ज से ज्यादा मुआवजा नहीं दिया जा सकता।
हालांकि प्रधान पोस्ट मास्टर, दिल्ली, जीपीओ बनाम राम अवतार गुप्ता (1 जून, 2006 के 2000 के आरपी नंबर 1659) में शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने धारा 6 में प्रदान किए गए अपवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि अगर सेवा में कमी, धोखाधड़ी, डाक कर्मचारियों की ओर से हुई चूक या उनके दुराग्रह के कारण होती है, तो वैधानिक सीमा लागू नहीं होगी। यहां स्पीड पोस्ट से भेजे गए हवाई टिकट शिकायतकर्ता तक नहीं पहुंचे। उनका बेटा जब उन्हें लेने के लिए पोस्ट ऑफिस गया तो कर्मचारी ने वह देने से इसलिए इनकार कर दिया कि उसने पैकेट के बदले 1000 या 500 रुपये देने की उसकी मांग नहीं मानी। इसे हठधर्मिता मानते हुए राष्ट्रीय आयोग ने टिकटों की कीमत, मुआवजा और मुकदमे के खर्च का जुर्माना लगाया।
उसके बाद साल 2011 में पोस्ट मास्टर जनरल, केरल बनाम किरन रशीद (2010 के आरपी नंबर 781) में राष्ट्रीय आयोग ने राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के उस विचार से इत्तेफाक जताया कि 100 साल पहले का कानून (भारतीय डाक विभाग अधिनियम, 1898) को आज के आधुनिक तरीकों जैसे कि स्पीड पोस्ट, ईमेल, मनी ट्रांसफर आदि जैसे मामलों में लागू नहीं किया जा सकता। अब 10 जनवरी को पोस्ट मास्टर, पोस्ट ऑफिस मनीमाजरा बनाम रिपन कुमार (2016 के आरपी नंबर 2508) में आयोग ने कहा कि धारा 6 डाक विभाग को निर्विवाद प्रतिरक्षा प्रदान नहीं करता है और धारा 6 का संरक्षण किसी विशेष मामले में इस्तेमाल किया जा सकता है।
दूसरे शब्दों में, डाक विभाग को यह साबित करना होगा कि स्पीड पोस्ट द्वारा भेजे गए माल की देरी से डिलीवरी, गलत जगह पर वितरण, नुकसान या क्षति, किसी धोखाधड़ी या डाक विभाग के कर्मचारी के दुराग्रह या हठधर्मिता या गलती के कारण नहीं हुई थी। इस मामले में आयोग ने इंगित किया कि विभाग ने उसके द्वारा की गई जांच के माध्यम से कोई सबूत नहीं दिखाया था कि उसकी ओर से कोई धोखाधड़ी या दुराग्रह के कारण कोई गलती नहीं हुई।
यहां स्पीड पोस्ट द्वारा भेजी गई 29 हजार से अधिक की दवाओं के साथ छेड़छाड़ की गई और कुछ दवाएं गायब थीं, जबकि कुछ क्षतिग्रस्त थीं। ‘इस तरह के रवैये की निंदा करते हुए और तकनीकी रूप से धारा 6 के तहत संरक्षण का नियम पालना’ को इंगित करते हुए आयोग ने निचली उपभोक्ता अदालत के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें विभाग को दवा की कीमत और मुकदमा खर्च एवं मुआवजे के तौर पर अतिरिक्त 20 हजार रुपये देने का आदेश दिया गया था।
आयोग ने संशोधन याचिका दायर करने जो ‘साफतौर पर गलत विचार से डाली गयी और पूरी तरह से योग्यता रहित’ थी, जिससे जनता का पैसा बर्बाद हो रहा था, के लिए विभाग को निर्देश दिया कि वह जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम के उपभोक्ता कानूनी सहायता खाते में एक लाख रुपये दे।


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