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शिक्षा ही बना सकती है चरित्रवान

Posted On February - 13 - 2020

नयी पीढ़ी का भटकाव

लक्ष्मीकांता चावला
भारतीय समाज को यह सवाल व्यथित कर रहा है कि युवा पीढ़ी क्यों नशे और अपराध की दलदल में धंस रही है। क्यों यौन अपराधों में युवाओं की भूमिका बढ़ रही है।  इस पर भाषणबाजी तो पूरे देश में हो जाती है, कभी-कभी मीडिया की सुर्खियां बनने पर किसी घटना के खिलाफ दिल्ली तथा अन्य शहरों में भी मोमबत्तियां जलाकर प्रदर्शन करते युवा नजर आते हैं। नि:संदेह इस विरोध के जरिये वे अपना दु:ख व्यक्त करते हैं। इसके जरिये वे सत्ताधीशों तक अपनी आवाज पहुंचाते हैं। प्रश्न उनसे है जो हमें दिन-रात उपदेश देते हैं। नि:संदेह हमारा समाज वह रास्ता भी चाहता है, जिस पर चलकर हमारी बेटियां सुरक्षित रहें। अत्यंत दुख का विषय तो यह है कि घरों की चारदीवारी में भी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं।
आस्था व स्वर्ग के तर्कों के बीच इसका रास्ता एक ही है, अच्छे इनसान बनो, दूसरों के काम आओ, मेहनत से कमाओ और बांट कर खाओ। यही तो भवसागर से पार होने का रास्ता ऋषि-मुनियों ने बताया है, लेकिन इस संसार में सुरक्षित जीने का रास्ता बहुत कठिन है। जरूरत इस बात की है कि हम पहले धरती की चिंता करें। ऐसे समाज का गठन करें, जिसमें बेटियां घर से स्कूल-काॅलेज और दफ्तरों तक तो सुरक्षित पहुंच सकें। हमारे बेटे कामुक न बनें। समाज में नशा व अन्य अपराध न फैले। उनके समक्ष उन महापुरुषों का आदर्श रखें जो हमारे प्रेरणा के स्रोत हैं।
पिछले एक वर्ष में लगभग तीस स्कूलों के विद्यार्थियों से संवाद हुआ। बहुत दुख होता है तब जब उन्हें पता नहीं होता कि जलियांवाला बाग में क्यों निर्दोष भारतीयों का नरसंहार हुआ और किसने किया था। अमृतसर के बच्चों के लिए शहीद मदनलाल ढींगरा और शहीद ऊधम सिंह अपरिचित जैसे हैं। नि:संदेह भटक रहे बच्चों से ज्यादा दोषी वे हैं जो अपनी नई पीढ़ी को सही रास्ता नहीं दिखाते। शिक्षा शास्त्री भी इस दोष से बच नहीं सकते। आज महंगे स्कूलों और मैकाॅले का अनुसरण करने वाली शिक्षा पद्धति से वह शिक्षा का ढंग ज्यादा अच्छा था, जो रास्ता स्वामी दयानंद ने दिखाया और स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल पद्धति प्रारंभ की। हरिद्वार में आधुनिक युग की शैक्षिक सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए एवं चरित्र निर्माण को ध्यान में रखकर प्रारंभ किया गया गुरुकुल अवश्य ही आधुनिक शिक्षा की कमी को पूरा करेगा।
सरकारें जवाब दें कि किसकी कमी से हमारे देश के छोटे-छोटे बच्चे अपराधों की ओर बढ़ रहे हैं। किशोरावस्था में ही शराब, जुआ और हुक्के जैसे व्यसनों का शिकार होने वाले बच्चे और उसके बाद सामाजिक अपराध के रास्ते में जा रहे बच्चों का दोषी कौन है। शराब के कारण उजड़ते परिवार, हत्याएं, सड़क दुर्घटनाएं प्रतिदिन अनेक घर उजाड़ रही हैं। क्या सरकार को यह सुनाई-दिखाई नहीं देता कि एक 16 वर्षीय लड़का मां को इसलिए मार देता है क्योंकि मां ने शराब पीने के लिए उसे रुपये नहीं दिए। बच्चा जीवन भर के लिए सलाखों के पीछे। इसका दोषी भी तो हमारा तंत्र है, जिसको धन कमाने के लिए शराब बेचने के अलावा कोई आसान रास्ता नहीं मिलता। इसी सप्ताह पंजाब का एक परिवार उजड़ गया। शराबी पति ने पत्नी को मारा और नशा उतरने पर खुदकुशी कर ली। इसका समाधान अच्छी शिक्षा और शिक्षा के संपूर्ण आधुनिकीकरण के साथ भविष्य की चुनौतियों को संभालने वाली शिक्षा पद्धति लागू करने में है। सरकार को विश्वविद्यालयों में एक शोध केंद्र इसलिए स्थापित करना चाहिए जो बताये कि जब गुरुकुल व्यवस्था देश में थी तब युवा पीढ़ी का चरित्र कैसा था। क्या वहां भ्रष्टाचार था? बलात्कार थे? माता-पिता वृद्धाश्रमों में भेजे जाते थे? क्या 10 से 17 वर्ष की आयु के करोड़ों बच्चे मदिरापान करते थे। पुराने जीवन की कुछ ऐसी विशेषताएं, जिनके कारण यह कहा गया था कि उस समाज में स्त्री-पुरुष सभी शिक्षित थे। वर्ण-आश्रम-धर्म का पालन करते थे। मेहनत करके बांट कर खाते थे। निश्चित ही इसी कारण विश्व गुरु के पद पर भारत आसीन रहा। क्या आज हम अपनी नई पीढ़ी को संभालकर वैसी ही शिक्षा नहीं दे सकते, जैसी हमारे पूर्वजों ने दी। गुरुकुलों ने शस्त्र-शास्त्र में ही पारंगत बनाकर विद्यार्थियों को कर्म क्षेत्र में भेजा। आज हम क्यों चूक गए? क्यों हमारे बच्चे अपनी शाम उस शराब, हुक्के और जुए में खराब कर रहे हैं और क्यों सरकारें टीवी विज्ञापनों में वासना, अश्लीलता-नग्नता परोस रही हैं।
बहुत से विज्ञापनों, इंटरनेट तथा अन्य संचार साधनों में नारी आज भी भोग्या के रूप में ही दिखाई जा रही है। दृश्य देखकर किसी भी व्यक्ति के मन में अनुचित भाव पैदा हो सकते हैं। वही जब किशोर देखते हैं तो उनकी जिज्ञासा क्या अपराध की दुनिया से शांत नहीं होगी? वे नशों से ग्रस्त हैं। भटकाव में विदेशों की ओर भाग रहे हैं। अच्छा हो अब भी सरकार संभले। शिक्षण संस्थाओं को शिक्षा व्यापारियों के नोट कमाने का अड्डा न बनने दें।


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