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रेशमी रूमाल पर प्यार की धार

Posted On February - 13 - 2020

तिरछी नज़र

शमीम शर्मा
वह समय गया जब आंखें चार होते ही जीने-मरने की कसमें जिंदगी बन जाया करती थी। अब यह भी नामुमकिन-सा लगता है कि आंखों ही आंखों में इशारा हो गया और बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया। प्यार अन्धा होता है नामक मुहावरा भी अब मोहब्बत पर फिट नहीं बैठता। कुल सार यही है कि आंख मींच कर प्यार में डूबने वाला समय अब नहीं रहा। लैला-मजनुंओं के हौसलों की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने न कभी शारीरिक खूबसूरती देखी, न जाति, न धर्म और बैंक बैलेंस भी कभी नहीं। अब तो प्रेमी-प्रेमिका की आंखें ही चार हो गयी हैं और वे हर चीज़ को खूब तोलकर देखते-निहारते हैं।
लैला अब चतुर सुजान हो गयी है। वह किसी बेरोजगार का हाथ नहीं थामती। पहले कद-काठी देखती है, खानदान देखती है, फिर रोज़गार देखती है, प्रोमोशन के चांसेज गिनती है और आखिर में सैलरी पैकेज के ब्योरे पर निगाह रखती है। तब कहीं जाकर वह किसी के प्यार में गिरती है। यह गिरना नहीं बल्कि उठना है। क्योंकि नौकरी लगे जीव का पल्लू पकड़ कर उसे अपनी जीवन नौका खेना सुगम लगता है।
मजनूं भी समझदार हो चले हैं। वे आमतौर से उसी लड़की के प्रेम में पड़ने की सोचते हैं जो या तो उसी के प्रोफेशन की हो, या नौकरी लग सकने की समर्थता रखती हो। इतना ही नहीं, अब वे लड़की का हेयर स्टाइल, ड्रैस, मोबाइल, एजुकेशन और घराने की बैकग्राउंड देखकर प्यार की पींग बढ़ाते हैं। वह ज़माना गया जब पनघट जाती, गाय चराती या किसी काम से गली में आती-जाती लड़की को मजनूं पहले ही दर्शनों में दिल दे बैठते थे और उस अनजान लड़की में राजकुमारी का दीदार करते थे।
न केवल लैला-मजनूं की सोच में फर्क आया है बल्कि उन जगहों की भी अहमियत खत्म होने के कगार पर है जहां वे मिला करते थे। आमतौर से मजनूं का टीला जैसे स्पॉट हर गांव-शहर में हुआ करते। पर अब वे इन टीलों के मोहताज़ नहीं हैं और जहां चाहे मिलते हैं, दिनदहाड़े मिलते हैं। प्यार करना अब आसान हो गया है। जिस प्यार को कभी ‘तलवार की धार पे धावनो है’ कहा गया था अब वह रेशमी रूमाल जैसा मुलायम हो गया है।

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एक बर की बात है अक बजार मैं एक रेहड़ी पै हरी-हरी मेथी देखकै नत्थू तै रामप्यारी बोल्ली—चार गुच्छी ले ल्यूं के? नत्थू बोल्या—ले ले, जितणी लेणी है ले ले। रामप्यारी बोल्ली—मैं तेरी राय कोनीं पूछ री, न्यूं बता इतणी चूट लेगा के?


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