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मोर के पंख

Posted On February - 16 - 2020

बाल कविता

सब पक्षियों का राजा मोर
कुदरत ने सुंदर बनाया।
पंख हैं इसके खूब सजीले,
सिर पर ताज सजाया।
जंगल, बागानों में रहता,
ऊंची न उड़ान भरे।
मस्ती में जब पंख फैलाता,
खुशी का इज़हार करे।
पढ़ने से जो जी चुराते,
किताबों में मोर पंख रखते।
मन में यही भ्रम हैं पालें,
फेल नहीं हो सकते।
बच्चों छोड़ो अंधविश्वास,
बस इतना रखो ध्यान।
मेहनत से ही मिलेगी मंजिल,
सिर पर हैं इम्तिहान।
हरिन्दर सिंह गोगना

भागी सर्दी
दुम दुबकाकर भागी सर्दी,
कुछ खिसियाकर भागी सर्दी।
पंखों वाली,कूलर वाली
गरमी लाकर भागी सर्दी।
चार माह तक सब पर अपनी
धाक जमाकर भागी सर्दी।
ऊनी पोशाकों की गठरी
संग उठाकर भागी सर्दी।
मौसम चाहे जैसा आए
धैर्य बंधाकर भागी सर्दी।
बहुत ख़ा चुके,थोड़ा खाओ
यह समझाकर भागी सर्दी।
निकट परीक्षाएँ बच्चों की
हैं बुलवाकर भागी सर्दी।
श्रम से बुरा चुराना हो जी
पाठ पढ़ाकर भागी सर्दी।
फिर आऊंगी बरखा जाते
क़समें खाकर भागी सर्दी।
घमंडीलाल अग्रवाल


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