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महाशिवरात्रि : 117 साल बाद दुर्लभ संयोग

Posted On February - 16 - 2020

मदन गुप्ता सपाटू
इस बार महाशिवरात्रि पर 117 साल बाद ग्रहों का दुर्लभ संयोग बनेगा। शनि अपनी स्वराशि मकर में, शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में, गुरु स्वराशि धनु में और राहु अपनी मूल त्रिकोण राशि मिथुन में विराजमान रहेंगे। ऐसा कम ही होता है जब अधिकांश ग्रह अपनी उच्चावस्था में हों। इस दिन जन्म लेने वाले शिशुओं का जीवन भी उच्चकोटि का रहेगा। जिन लोगों की कुंडली में शनि, शुक्र, गुरु या राहु खराब हैं या जिनके जन्मांग में पूर्ण या आंशिक कालसर्प दोष हो, वे शिवरात्रि पर विशेष आराधना, पूजा, स्तुति, उपाय आदि करके शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं। नवीन कार्य, व्यवसाय आरंभ करने के लिए भी इस बार का यह महापर्व विशेष मुहूर्त लेकर आया है। महाशिवरात्रि पर 21 फरवरी को सुबह 9:13 बजे से 22 की सुबह 11:19 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। इसलिए इस दिन आप रुके हुए कार्य बिना किसी अड़चन के पूरे कर सकते हैं।
चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ ही हैं। इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि के तौर पर मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में इस तिथि को अत्यंत शुभ बताया गया है। गणित ज्योतिष के आकलन के हिसाब से महाशिवरात्रि के समय सूर्य उत्तरायण हो चुके होते हैं और ऋतु परिवर्तन भी चल रहा होता है। ज्योतिष के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी कमजोर स्थिति में आ जाते हैं। चंद्रमा को शिवजी ने मस्तक पर धारण किया हुआ है, अतः शिवजी के पूजन से व्यक्ति का चंद्र सबल होता है, जो मन का कारक है। दूसरे शब्दों में कहें तो शिव की आराधना इच्छा-शक्ति को मजबूत करती है और अन्तःकरण में अदम्य साहस व दृढ़ता का संचार करती है। एक मान्यता के अनुसार यह भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का महापर्व है। ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्द्धरात्रि के समय करोड़ों सूर्य के तेज के समान ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। माना जाता है कि इस दिन व्रत से साधकों को इच्छित फल, धन, वैभव, सौभाग्य, सुख, आरोग्य, संतान की प्राप्ति होती है।
बेल पत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं। बेल पत्र अर्पित करते हुए ध्यान रखें कि इसके तीनों पत्ते पूरे हों, खंडित न हों। इसका चिकना भाग शिवलिंग से स्पर्श करना चाहिए। नीलकमल भगवान शिव का प्रिय पुष्प माना गया है। अन्य फूलों मे कनेर, आक, धतूरा, अपराजिता, चमेली, नागकेसर, गूलर आदि चढ़ाए जा सकते हैं। कदंब, केवड़ा, केतकी के फूल शिव को अर्पित नहीं किये जाते। भगवान शिव की पूजा करते समय शंख से जल अर्पित नहीं करना चाहिए। भगवान शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित माना गया है। शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर, शिव प्रतिमा पर नारियल चढ़ा सकते हैं, लेकिन नारियल का पानी नहीं। हल्दी और कुमकुम उत्पत्ति के प्रतीक हैं, इसलिए पूजन में इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। पूजा में साबुत चावल ही इस्तेमाल करें, टूटे हुए नहीं। फूल बासी एवं मुरझाए हुए न हों।
कालसर्प या राहु योग के निवारण के लिए महाशिवरात्रि को खास अवसर माना जाता है। इसके लिए चांदी के नाग-नागिन का जोड़ा, हलवा, सरसों का तेल, काला-सफेद कंबल शिवलिंग पर अर्पित करें। महामृत्युंजय मंत्र की कम से कम एक माला अवश्य जपें।


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