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बड़े गुनाह की सज़ा

Posted On February - 13 - 2020

नरक बने आश्रय गृह
शासन-प्रशासन, समाज-मीडिया के आंख मूंद लेने के बाद टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की विंग के सोशल ऑडिट में मुजफ्फरपुर आश्रय गृह का जो भयावह सच सामने आया था, उसे सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद किसी हद तक अंजाम तक पहुंचाया जा सका। एक एनजीओ सेवा संकल्प और विकास समिति तथा सत्ताधीशों के अपवित्र गठबंधन से चल रहे काले कारनामों का असली सच अभी सामने आना बाकी है, मगर दिल्ली की साकेत कोर्ट स्थित पॉस्को अदालत ने चालीस लड़कियों के यौन शोषण के मामले में मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर समेत बारह को उम्रकैद की सजा सुनाई है। ब्रजेश ठाकुर को अंतिम सांस तक जेल में रहना होगा। इस कांड के फरवरी, 2018 में उजागर होने पर पूरा देश स्तब्ध रह गया था। हालांकि, बिहार के मुजफ्फरपुर में इस मामले में मई, 2018 के आखिरी दिन प्राथमिकी दर्ज की गई थी। बिहार सरकार से हर साल एक करोड़ रुपये की ग्रांट हासिल करने वाले ब्रजेश ठाकुर का रुतबा ऐसा था कि जिस दिन मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई, उसी दिन उसे एक बड़ा टेंडर सरकार की तरफ से मिला। विडंबना ही है कि सरकार से जो ग्रांट बेसहारा व किस्मत की मारी लड़कियों के संरक्षण के लिये मिल रही थी, वहां उनका शारीरिक शोषण हो रहा था। अदालत ने ब्रजेश समेत बारह लोगों को  उम्रकैद की सज़ा सुनाई और 32 लाख का जुर्माना भी लगाया है। इस भयावह सच के उजागर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले को बिहार से दिल्ली स्थानांतरित करवाने के निर्देश दिये थे, अन्यथा इस मामले में शायद ही कभी दोषियों को सज़ा हो पाती। मीडिया में घुसपैठ बनाकर ब्रजेश ठाकुर इतनी बड़ी ताकत बन गया था कि बड़े राजनेता तक उसके सामने नतमस्तक थे। तभी आश्रय गृह में लगातार यौन शोषण व लड़कियों के गायब होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इस मामले के उजागर होने के बाद गवाहों पर दबाव बनाने से लेकर तथ्यों से छेड़छाड़ के इतने बड़े पैमाने पर प्रयास हुए कि बिहार के कई महिला संगठनों को अदालत की शरण में जाना पड़ा। बीच में मामले की जांच का नेतृत्व कर रहे सीबीआई के डीएसपी का तबादला हुआ। कई पीड़ित बच्चियों ने ग्यारह लड़कियों के लापता होने के बयान दिये थे। पटना में प्रेस कानफ्रेंस करके सीबीआई ने ग्यारह लड़कियों की हत्या होने की बात कही थी। बाकायदा खुदाई भी हुई और हड्डियां भी बरामद हुईं। मगर बाद की सीबीआई रिपोर्ट में हत्याओं का कोई जिक्र नहीं हुआ। किसी अपराधी को मृत्युदंड नहीं मिला। दरअसल, इस मामले में बिहार सरकार की उदासीनता को लेकर भी सवाल उठे। इस वीभत्स कांड में राजनेताओं की भूमिका की जांच नहीं हुई। यह संभव नहीं था कि राजनीतिक संरक्षण के बिना ब्रजेश ठाकुर यह खेल, खेल रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में बिहार के सभी आश्रय गृहों की जांच के आदेश दिये थे। जांच में सत्रह में से तेरह आश्रय गृहों में यौन शोषण और प्रताड़ना के मामले दर्ज किये गये। कुल 54 एनजीओ को काली सूची में डाला गया। सीबीआई ने बिहार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर 25 जिला मजिस्ट्रेटों समेत 71 अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने की सिफारिश की थी। ये आने वाला वक्त बतायेगा कि राज्य सरकार कितनी तत्परता और ईमानदारी से कार्रवाई करती है। विडंबना यह है कि मुजफ्फरपुर आश्रय गृह समेत सभी आश्रय गृहों की नियमित जांच का प्रावधान होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, जिसमें एक न्यायिक अधिकारी, समाज कल्याण विभाग के अधिकारी व सरकारी चिकित्सकों की नियमित जांच शामिल होती है, मगर किसी भी अधिकारी को इन आश्रय गृहों में कोई खामी नजर नहीं आई। कमोबेश यही स्थिति देश के विभिन्न राज्यों में स्थित आश्रय गृहों की भी हो सकती है।


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