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फ्लैशबैक

Posted On February - 15 - 2020

हिंदी फीचर फिल्म हीर रांझा
शारा
हीर रांझा सेल्युलाइड पर चेतन आनंद द्वारा लिखी गयी एक कविता है, जिसे हिमालय फिल्म्ज के बैनर तले उनके बेटे केतन आनंद ने प्रोड्यूस किया था। वर्ष 1970 में रिलीज यह फिल्म बॉलीवुड की पहली और शायद आखिरी फिल्म है, जिसके किरदार शायरी में बात करते हैं। यानी सारे के सारे संवाद कविता में। गीत तो होते ही कविता हैं। यह एक ऐसा प्रयोग था, जिसे कालांतर में बड़े-बड़े लेखकों/कवियों ने अपनाने से गुरेज किया ताकि फिल्म न पिट जाये लेकिन इन्हीं काव्यमय संवादों ने फिल्म को हिट बनाया। इसको कलात्मकता बख्शी। जी हां, पाठक ठीक समझे, फिल्म के डायलॉग लिखे थे कैफी आज़मी ने। ये प्रयोग सिर्फ कैफी ही कर सकते थे। जब सातवें दशक के इर्दगिर्द यह फिल्म बनी थी तो तब बॉलीवुड की फिल्मों में हिंदुस्तानी बोली एंट्री मार चुकी थी, इससे पूर्व विशुद्ध हिंदी में फिल्में बनती थीं। कैफी आज़मी को यह श्रेय जाता है कि वे इंडियन मोशन पिक्चर्स में उर्दू साहित्य को ले लाये। उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में पैदा हुए कैफी आज़मी ने 11 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया था। उनकी लकड़पन में लिखी ग़ज़ल तत्कालीन ग़ज़ल गायक साम्राज्ञी बेगम अख्तर ने गायी थी। कैफी प्रगतिशील कवि थे और उनका लेखन इनसानी जज्बों के काफी करीब था। पद्मश्री से सम्मानित कैफी आज़मी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया। उन्हें नेहरू, लोट्स अवार्ड सरीखे ढेरों पुरस्कार मिले। सरकार ने उनके नाम से ‘कैफियत’ ट्रेन भी चलाई। जानी-मानी अदाकारा शबाना आज़मी तथा सिनेमैट्रोग्राफी बाबा आज़मी उन्हीं के ही बच्चे हैं। उनकी शादी थियेटर कलाकार शौकत आज़मी से हुई थी। बहरहाल, हम फिल्म की तरफ लौटते हैं। ‘हकीकत’ फिल्म की तरह यह फिल्म भी चेतन आनंद की शाहकार थी, जिसे 1966 में वारिश शाह द्वारा द्वारा लिखे महाकाव्य को आधार बनाकर लिखा था। चेतन आनंद पटकथा की बारीकियों से खूब परिचित थे। इसलिए उन्होंने यह लेखन खुद संभाला। संवाद लेखन कैफी आज़मी को सौंपा था। हीर के किरदार को अमर किया था प्रिया राजवंश ने। चेतन आनंद और प्रिया राजवंश का उन दिनों खूब इश्क चल रहा था। बताया जाता है कि प्रिया राजवंश को वे अपनी फिल्मों की नायिका के रूप में शिमला से ढूंढ़ कर लाये थे और धीरे-धीरे उसके प्यार में गिरफ्तार हो गये। उन दिनों उनकी अपनी पत्नी से खटपट चल रही थी। तब तलाक वगैरह का रिवाज नहीं था। लिहाजा दोनों ताउम्र साथ ही रहे लेकिन गैर-कानूनी रूप से। केतन आनंद उनकी पहली पत्नी से पुत्र हैं, जिन पर प्रिया राजवंश की हत्या का आरोप लगा था और जिसके लिए वह जेल भी काटकर आये थे। इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी जल मिस्त्री ने की थी, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। मिस्त्री ही चेतन आनंद की सारी फिल्मों की फोटोग्राफी करते थे। इस फिल्म के सुपरहिट होने के पीछे एक अन्य कारण था, मदनमोहन का संगीत। उनके संगीत ने कैफी आज़मी के गीतों को अमर कर दिया। रही-सही कसर धुनों को सुरों में पिरोकर गायकों ने पूरी कर दी। मोहम्मद रफी का ‘यह दुनिया यह महफिल मेरे काम की नहीं’ या लता मंगेशकर की ‘मिलो न तुम तो हम घबराए’ आज भी हर उम्र का संगीत प्रेमी सुनता है। जब सुरों को पंजाबी टच देना था तो मदन मोहन ने ‘डोली चढ़देयां हीर मारे कूकां’ जगजीत कौर और शमशाद बेगम से गवाया। अब रही बात रांझा के किरदार की। राजकुमार के शुरुआती दिनों की फिल्मों में से एक थी यह फिल्म। चेहरे पर ताजगी और बांकपन उनका इस फिल्म में नजर आया। पाकीजा को छोड़ दें तो यह कम ही फिल्मों में नजर आया और जिनमें नजर आया उनमें किरदार कम महत्वपूर्ण थे। विशुद्ध पंजाबी वेशभूषा में वह बेहद खूबसूरत दिखे। लगता है वारिश शाह का रांझा ऐसा ही रहा होगा। उन्होंने प्रिया राजवंश के किरदार को टक्कर खूब दी है। यह फिल्म प्राण के रोल के लिए भी जानी जाती है। छोटे चौधरी के किरदार को जो प्राण ने धारदार बनाया है, वह देखते ही बनता है। बहुत कम लोगों को पता है कि हीर के रोल के लिए चेतन आनंद ने पहले जीनत अमान को पसंद किया था लेकिन उसका उर्दू में हाथ तंग था, इसलिए प्रिया को लेना पड़ा। जीनत अमान को देवानंद उन दिनों ताजा-ताजा ढूंढ़ कर लाये थे। कहानी चेतन आनंद की आवाज से शुरू होती है। वह शायरी में ही अविभाजित पंजाब के तख्त हजारा जगह की बात करते हैं। हीरा रांझा दो मुस्लिम परिवारों के बच्चों की लव स्टोरी है। हीर (प्रिया राजवंश) बेहद खूबसूरत लड़की है और खाते-पीते घर से ताल्लुक रखती है। रांझा चार भाइयों में सबसे छोटा है और भाभियों के चिढ़ाने से वह घर छोड़ देता है। वह हीर के गांव आ पहुंचता है। उसी गांव में एक दोस्त की शादी में जब वह शरीक होता है तो उसकी भेंट हीर से होती है। वह हीर को पहली नजर में दिल दे बैठता है। हीर उसके लिए अपने घर में नौकरी जुटा देती है—पशुओं की देखभाल करने की। पशु चराते वक्त रांझा की बांसुरी की धुन पर हीर मर-मिटती है। दोनों के बीच प्यार का अंकुर फूटता है, दोनों मिलने लगते हैं लेकिन चोरी-चोरी, क्योंकि दोनों के परिवारों के दरमियान पुश्तैनी दुश्मनी है। बेटी की भावनाओं का ख्याल रखते हुए हीर के पिता दोनों की शादी को राजी हो जाते हैं लेकिन चाचा कैदो चौधरी की साजिश के चलते उसकी शादी किसी और से कर दी जाती है। दिल के टूटने से रांझा जोगी बन जाता है और शहर-दर-शहर घूमता है। अलख निरंजन करता रांझा हीर की ससुराल पहुंच जाता है, जहां से हीर को भगाकर ले जाता है लेकिन महाराजा के लोगों द्वारा दोनों पकड़ लिये जाते हैं। जब महाराजा को पता चलता है कि मुल्ला ने रिश्वत खाकर हीर की जबरन शादी करवायी थी, दोनों को आज़ाद कर दिया जाता है। हीर के पिता उसकी शादी रांझा के साथ करने को राजी हो जाते हैं। बारात आती है, हीर विदा भी होती है लेकिन एक रिवायत के तहत दुल्हन को चाचा द्वारा शरबत में ज़हर दिये जाने के कारण उसकी डोली में ही मौत हो जाती है। हीर को मृत पाकर रांझा भी दम तोड़ देता है।
गीत
दो दिल टूटे दो दिल हारे : लता मंगेशकर
मिलो न तुम तो : लता मंगेशकर
नाचे अंग वे : जगजीत कौर, शमशाद बेगम
डोली चढदेयां मारे हीर कूकां : लता मंगेशकर
मेरी दुनिया में तुम आये : मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर
तेरे कूचे में तेरा दीवाना : मोहम्मद रफी
ये दुनिया ये महफिल : मोहम्मद रफी

टीम
प्रोड्यूसर व निर्देशक : चेतन आनंद
मूल कथाकार : वारिस शाह
पटकथा लेखक : चेतन आनंद
गीतकार : कैफी आज़मी
संगीतकार : मदन मोहन
सिनेमैटोग्राफी : जल मिस्त्री
सितारे : राजकुमार, प्रिया राजवंश, प्राण, पृथ्वीराज कपूर, इंद्राणी मुखर्जी।


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